मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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वन्दीवंप यशांसि गायति मरुद् यस्यैकबाणाहत- श्रेणीभूतविशालतालविवरोद्गीर्णे स्वरै सप्तभि ॥”
इस श्लोक से यह अनुमान किया जाता है कि ‘राघवानन्द’ नामक कोई नाटक भी विशाखदत्त द्वारा लिखा गया होगा। किन्तु आज यह उपलब्ध नहीं है ।
(४) मुद्राराक्षस—यह विशाखदत्त की सर्वश्रेष्ठ तथा अन्तिम कृति है । उनकी नाट्य-प्रतिभा का यह सर्वोच्च निदर्शन है ।
विशाखदत्त की शैली
नाटककार विशाखदत्त की शैली सुस्पष्ट, प्रभावशाली तथा प्रवाह के औचित्य से पूर्ण है । वैसे तो उनके नाटक ‘मुद्राराक्षस’ में प्रसाद, माधुर्य एवं ओज तीनों ही गुणों का स्वाभाविक रूप से प्रयोग हुआ है, किन्तु फिर भी उसमें प्रसाद गुण की प्रधानता दृष्टिगोचर होती ही है । नाटक के प्रारम्भ में कुछ दूर तक देखते जाइये, श्लोकों में प्रसाद गुण के ही दर्शन होंगे ।
कुछ आलोचकों ने उनकी शैली के सम्बन्ध में यह आपत्ति की है कि विशाखदत्त के नाटकों में कालिदास एवं भवभूति के नाटकों के समान काव्यमय भावाभिव्यक्ति नहीं हो सकी है । किन्तु यदि हम गम्भीरतापूर्वक विचार करें तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचेंगे कि विशाखदत्त की वैयक्तिक विशेषताओं से प्रभावित नाट्य-रचना-शैली को कालिदास तथा भवभूति की तुलना में रखना उचित नहीं है क्योंकि न तो कालिदास और भवभूति के काव्यमय वर्णनों की कल्पना विशाखदत्त में ही दृष्टिगोचर हो सकती है और न विशाखदत्त की नाट्य कल्पना का ही दर्शन कालिदास अथवा भवभूति के नाटकों में उपलब्ध हो सकता है । वस्तुत तीनों का अपना-अपना जीवित जागृत व्यक्तित्व है तथा उसको अभिव्यक्त करने के साधन तथा शक्तियां भी अपनी-अपनी ही हैं । विशाखदत्त ने नाटकीय औचित्य की दृष्टि से या तो काव्य-कल्पनाओं को दूर ही रखा है अथवा उनको नाटक के रंग में ही रंग दिया है । उदाहरणार्थ मलयकेतु के कंचुकी की निम्नलिखित उक्ति को ही देखिये :—