भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

प्रारंभिक भूमिका व विस्तृत प्रस्तावना

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महाकविश्रीविशाखदत्तप्रणीतम्

मुद्राराक्षस-नाटकम्

(सरल संस्कृत-व्याख्या, हिन्दी अनुवाद, टिप्पणी, सर्वाङ्गपूर्ण भूमिका आदि से संवलित)

व्याख्याकार
तारिणीश झा
व्याकरणवेदान्ताचार्य

भूमिका-लेखक
डॉ० सुरेन्द्रदेव शास्त्री
एम० ए० (संस्कृत, हिन्दी), पी-एच० डी०
अध्यक्ष, संस्कृत-विभाग
टाउन डिग्री कालेज, बलिया

प्रकाशक

रामनारायणलाल बेनीप्रसाद

प्रकाशक तथा पुस्तक विक्रेता
इलाहाबाद - 211002

तृतीय संस्करण] \qquad\qquad\qquad\qquad १९८३ \qquad\qquad\qquad\qquad [मूल्य ६.०० रुपये

प्रकाशक
रामनारायणलाल बेनीप्रसाद
प्रकाशक तथा पुस्तक-विक्रेता
इलाहाबाद-२११००२

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५११७१

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मुद्रक
रामबाबू अग्रवाल
ज्ञानोदय प्रेस,
२७३, कटरा इलाहाबाद

विषयानुक्रमणिका

विषयपृष्ठ
( क ) भूमिका
१—काव्य के दो प्रधान रूप...
२—नाटक का लक्षण तथा परिभाषा...
३—कथावस्तु अथवा इतिवृत्त और उसके प्रकार...
४—नाटकों का उद्भव...१३
५—संस्कृत नाटकों के विकास का क्रमिक इतिहास...१६
६—नाटककार विशाखदत्त का काल-निर्धारण...२३
७—जीवन-वृत्त...३६
८—विशाखदत्त की शैली...४२
९—ग्रन्थ का नामकरण...४६
१०—कथानक का मूल आधार...५०
११—नाटक के पूर्व की कथा...५१
१२—अंकानुसार संक्षिप्त कथावस्तु...५५
१३—मुद्राराक्षस का नायक...७०
१४—प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण...७३
१५—रस...८१
१६—मुद्राराक्षस का वैशिष्ट्य...८३
१७—मुद्राराक्षस में सुभाषितों का प्रयोग...८८
१८—अकारादिक्रम से श्लोकों की सूची...१००
( ख ) मूल ग्रन्थ और व्याख्या आदि
१—प्रथमोऽङ्कः...
२—द्वितीयोऽङ्कः...६५
३—तृतीयोऽङ्कः...१६३
४—चतुर्थोऽङ्कः...२४१
५—पञ्चमोऽङ्कः...२७७
६—षष्ठोऽङ्कः...३३६
७—सप्तमोऽङ्कः...३८६
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पात्रों का परिचय

( क्रमप्रविष्ट )<br>पुरुष पात्र( क्रमप्रविष्ट )<br>पुरुष पात्र
१. सूत्रधारः — नाटक का प्रारंभ-कर्त्ता, रंगमंच का अध्यक्ष ।९. जाजलिः — मलयकेतु का कंचुकी ।
२. चाणक्यः — नायक, विष्णुगुप्त, चन्द्रगुप्त का गुरु ।१०. प्रियंवदकः — राक्षस का अनुचर ।
३. शार्ङ्गरवः — चाणक्य का शिष्य ।११. शकटदासः — राक्षस का निजी सचिव और मित्र ।
४. चरः — यमपट धारण करने वाला चाणक्य का गुप्तचर ।१२. वैहीनरिः — चन्द्रगुप्त का कंचुकी ।
५. सिद्धार्थकः — चाणक्य का गुप्तचर, राक्षस का कृत्रिम सेवक ।१३. चन्द्रगुप्तः — मौर्य वंश का प्रथम सम्राट्, चाणक्य का महाभक्त ।
६. चन्दनदासः — राक्षस का प्रिय मित्र ।१४. प्रथमवैतालिकः — चन्द्रगुप्त का अपना चारण ।
७. विराघगुप्तः — सँपेरे का वेश धारण करने वाला राक्षस का गुप्तचर ।१५. द्वितीयवैतालिकः — राक्षस द्वारा नियुक्त चारण-व्यञ्जन गुप्तचर, स्तनकलश ।
८. राक्षसः — प्रतिनायक, नन्दों का महामात्य ।१६. करभकः — राक्षस का पथिक-वेशधारी गुप्तचर ।
१७. दौवारिकः — राक्षस का द्वारपाल ।

। २ ।

(क्रमप्रविष्ट)<br>पुरुष पात्र(क्रमप्रविष्ट)<br>पुरुष पात्र
१८ छिन्नहस्तपुरुष। — मलयकेतु के आगमन की सूचना देने वाला पुरुष।२३ सुसिद्धार्थक — सिद्धार्थक का मित्र, चण्डाल के वेश में वेणुवेत्रक।
१९ मलयकेतु। — पर्वतेश्वर का पुत्र, राक्षस का सहायक।२४. पुरुष. — चाणक्य का गुप्तचर, आत्महत्या का स्वांग करने वाला।
२० भागुरायण। — चाणक्य का गुप्तचर, मलयकेतु का कृत्रिम मित्र।२५ वज्रलोमक — प्रथम चण्डाल के वेश में सिद्धार्थक।
२१ जीवसिद्धिः — चाणक्य का क्षपणकवेशधारी गुप्तचर, राक्षस का कृत्रिम मित्र।२६ वेणुवेत्रक — द्वितीय चण्डाल के वेश में सुसिद्धार्थक।
२२ भासुरक — मलयकेतु का अनुचर।२७ पुत्र — चन्दनदास का बालक।<br>२८ पुरुष। — सन्देशवाहक।
<br>
स्त्री पात्रस्त्री पात्र
१ नटी — सूत्रधार की स्त्री।३ विजया — मलयकेतु की प्रतिहारी।
२ शोणोत्तरा — चन्द्रगुप्त की प्रतिहारी४ कुटुम्बिनी — चन्दनदास की पत्नी।

भूमिका

काव्य के दो प्रधान रूप

शास्त्रकारों ने मूलरूप से काव्य के दो रूपों को स्वीकार किया है— (१) श्रव्य-काव्य, (२) दृश्य-काव्य । श्रव्य-काव्यों का अध्ययन स्वयं किया जा सकता है अथवा किसी दूसरे व्यक्ति के मुख द्वारा उसका श्रवण किया जा सकता है । इन श्रव्य-काव्यों में शब्दों द्वारा पाठको अथवा श्रोताओ के अन्तस्तल में रसानुभूति का संचार किया जाता है । दृश्य-काव्यों में शब्दों के अतिरिक्त पात्रों की वेश-भूषा, उनकी आकृति तथा भाव-भंगी और क्रियाओ के अनुकरण तथा भावों के अभिनय द्वारा दर्शकों के हृदयों को भाव-मग्न किया जाया करता है । यद्यपि इन दृश्य-काव्यों का अध्ययन (पठन) तथा श्रवण भी किया जा सकता है किन्तु फिर भी उनके पूर्ण आनन्द का अनुभव पाठक अथवा श्रोता को उस समय तक होना संभव नहीं है कि जब तक उनका अभिनय रंगमंच पर प्रस्तुत न कर दिया जाय । इस भाँति श्रव्य-काव्य श्रवण के माध्यम द्वारा तथा दृश्य-काव्य नेत्रों के माध्यम द्वारा मानव के हृदय में रसानन्द की अनुभूति कराया करते है । माध्यम की उपर्युक्त भिन्नता के आधार पर ही काव्य के उपर्युक्त दो मूलरूपों का वर्णन शास्त्रकारों ने किया है ।

मानव-मात्र की दृष्टि में कानों द्वारा सुने गये विषयों की अपेक्षा नेत्रों द्वारा प्रत्यक्ष देखे गये विषयों के वर्णन अधिक रोचक तथा चित्ताकर्षक हुआ करते हैं । अतः श्रव्य-काव्य की अपेक्षा दृश्य-काव्य का अधिक रोचक, अधिक मनोहर तथा अधिक आकर्षक होना स्वतः ही सिद्ध है। दृश्य-काव्य के अन्तर्गत विद्यमान दुष्यन्त आदि के स्वरूप का नट इत्यादि में आरोप किये जाने के कारण दृश्य-काव्य को ही शास्त्रकारो ने 'रूपक' शब्द द्वारा कहा है :—

,,तद्रूपारोपात्तु रूपकम् ॥'' साहित्यदर्पण—६।१। चतुर्थचरण ॥

( २ )

सभी प्रकार के काव्यों में संस्कृत-रूपकों का स्थान

भारतीय आलोचकों ने सब प्रकार के काव्यों में रूपक अथवा नाटक को ही सर्वश्रेष्ठ स्वीकार किया है ।

“काव्येषु नाटक रम्यम्”

इसका मुख्य कारण यही हो सकता है कि अहृदयों को सहृदय बनाने की पूर्ण सामर्थ्य नाटकों अथवा रूपकों में ही हुआ करती है । उदाहरण के लिए मुद्राराक्षस की प्रारम्भिक घटना को ही ले लीजिये —

इस नाटक के प्रारम्भ में प्रस्तावना की समाप्ति पर जब सूत्रधार अभिनय में भाग लेने के निमित्त अपनी पत्नी को बुलाने के लिये घर जाता है तब उसे उसकी पत्नी चन्द्रग्रहण के उपलक्ष में ब्रह्मभोज का आयोजन करती हुई दृष्टिगोचर होती है । सूत्रधार उसे समझाता है कि आज तो चन्द्रग्रहण किसी भी अवस्था में नहीं हो सकता है क्योंकि —

“क्रूरग्रह सकेतुश्चन्द्रमसम्पूर्णमण्डलमिदानीम् ।
अभिभवितुमिच्छति बलात्---”

वह इतना ही कह पाता है कि चाणक्य चन्द्रगुप्त के नाम सादृश्य से “चन्द्रस्यग्रहणम् (चन्द्रगुप्त का पकड़ लिया जाना)” समझकर कहने लगता है —

“कथय, क एष मयि स्थिते चन्द्रगुप्तमभिभवितुमिच्छति”

अर्थात् (अपनी खुली हुई चोटी का स्पर्श करते हुये वह कहता है) मेरे रहते हुये, ऐसा कौन व्यक्ति है कि जो चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करने की इच्छा करता है ।

यह कौन व्यक्ति है कि जो जंभाई के कारण खोले हुये सिंह के मुख से, शीघ्र ही पिये हुये हाथी के रक्त से लाल शोभा वाली और (अतएव) चन्द्रमा की सायंकालीन अरुण कांति से देदीप्यमान दाढ़ को (सिंह का तिरस्कार करके) उखाड़ लेने की इच्छा करता है ? (श्लोक स० १।८) ।

वध के योग्य (यह) कौन व्यक्ति है कि जो नन्दवंश के काल के लिये

( ३ )

सर्पिणी के सदृश तथा क्रोधाग्नि से निकलती हुई काली धूमरेखा के सदृश (कभी भी बँध चुकने वाली) मेरी इस शिखा (चोटी) को इस समय भी बँधती हुई नहीं देखना चाहता है? (१।६)।

रंगमंच पर स्थित चाणक्य के उपर्युक्त शब्दों के श्रवणमात्र से ही दर्शकों के हृदयों में समयोचित वीर रस का आस्वादन होने लगता है। इस स्थल पर कल्पना को दौड़ाने की कोई भी आवश्यकता प्रतीत नही होती है। रस को उद्दीप्त करने की सम्पूर्ण सामग्री उपस्थित है। परदा उठने के अनन्तर चाणक्य के शब्दों को सुनते ही रसास्वादन होना प्रारम्भ हो जाता है। इसमें तनिक भी विलम्ब नही होता है। अतः जीवन की सत्यता के अनुभव की दृष्टि से, रसा-प्लावित होने की दृष्टि से तथा रसास्वादन की क्षमता की दृष्टि से यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि काव्य के सम्पूर्ण भेदों में नाटक अथवा रूपक ही पूर्णतया चित्ताकर्षक तथा लोकरंजन का प्रमुख एवम् सर्वश्रेष्ठ साधन है। अतः महाकवि कालिदास द्वारा कथित निम्नलिखित उक्ति की सार्थकता स्पष्ट ही है :—

'नाट्यं भिन्नरुचेर्जनस्य बहुधाप्येकं समाराधनम् ।' (माल० १।४)

नाट्यशास्त्रकार भरतमुनि के अनुसार भी नाट्य के अन्तर्गत समस्त शास्त्रों तथा कलाओं का समावेश हो जाया करता है। उन्होंने लिखा है :—

"न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला ।
नासौ योगो नतत्कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते।।" भरत नाट्यशास्त्र ।।

अर्थात् कोई भी ज्ञान, शिल्प, विद्या, कला, योग अथवा कर्म ऐसा नही है कि जिसका दर्शन इस नाट्य में न होता हो।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि काव्यों में नाटकों अथवा रूपको को सर्वश्रेष्ठ स्वीकार किया जाना सर्वथा उपयुक्त ही है।

रूपकों के प्रकार

भरतमुनि तथा उत्तरवर्ती नाट्यशास्त्रकारों ने रूपक के दश भेद स्वीकार किये हैं :—

"नाटकं सप्रकरणं भाणः प्रहसनं डिमः ।
व्यायोगसमवकारौ वीथ्यङ्केहामृगा इति ।।" दशरूपक १।८॥

( ६ )

मूल की दृष्टि से कथावस्तु के पुन तीन भेद—यही कथावस्तु मूल की दृष्टि से पुन तीन प्रकार की हो जाती है। (१) प्रख्यात, (२) उत्पाद्य, (३) मिश्र —

"प्रख्यातोत्पाद्यमिश्रत्वभेदात् त्रेधाऽपि तत्रिधा॥" ॥ दशरूपक १।१५ का पूर्वार्द्ध ॥

(१) प्रख्यात नामक कथावस्तु रामायण, महाभारत, पुराण अथवा बृहत्कथा इत्यादि ऐतिहासिक ग्रन्थों के आधार पर हुआ करती है। यह कथानक प्रसिद्ध कथा के साथ सम्बद्ध रहा करता है। जैसे—अभिज्ञान शाकुन्तल, उत्तर रामचरित तथा वेणीसंहार इत्यादि नाटकों की कथावस्तुयें। (२) उत्पाद्य नामक कथावस्तु कवि द्वारा स्वयं की कल्पना प्रसूत हुआ करती है। (३) मिश्र नामक कथावस्तु की पृष्ठभूमि प्रख्यात हुआ करती है किन्तु उसमें का अधिकांश भाग कवि-कल्पित हुआ करता है। अतः इसका निर्माण प्रख्यात तथा उत्पाद्य दोनों ही प्रकार की कथावस्तुओं के मिश्रण से होता है। विभिन्न प्रकार की स्थितियों के आधार पर कथानक को पाँच अर्थप्रकृतियों, पाँच अर्थावस्थाओं तथा पञ्च-सन्धियों में विभक्त कर लिया जाया करता है।

पाँच अर्थप्रकृतियाँ

कथानक को प्रमुख फल की ओर अग्रसर करने वाले चमत्कारपूर्ण अंशों को "अर्थप्रकृति" कहा जाता है। कथानक का फल है—त्रिवर्ग सिद्धि अर्थात् धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति। नाटकीय अर्थ में प्रदर्शित इन उद्देश्यों की प्राप्ति के निमित्त जो उपाय किये जायें, उन्हीं को अर्थप्रकृति समझना चाहिये। इसके ५ प्रकार होते हैं—(१) बीज, (२) बिन्दु, (३) पताका, (४) प्रकरी और (५) कार्य। ये अर्थप्रकृतियाँ आधिकारिक-कथावस्तु के निर्वाह में सहायक हुआ करती हैं।

(१) बीज—बीज के द्वारा आधिकारिक कथावस्तु के उद्गम में सहायता प्राप्त हुआ करती है। प्रारम्भ में इसका कथन सूक्ष्म रूप में किया जाता है किन्तु जैसे-जैसे व्यापक शृङ्खला आगे बढ़ती जाती है वैसे ही वैसे इसका भी विस्तार होता चलता है।

(२) बिन्दु—विच्छिन्न कथावस्तु को इसके द्वारा आगे बढ़ाया जाया करता

( ७ )

है। तात्पर्य यह है कि जो बात कारण बनकर बीच की कथा को आगे बढ़ाती है तथा प्रधान कथा को भी चालू रखती है, वही बिन्दु है।

(३) पताका तथा (४) प्रकरी— इन दोनों ही अर्थप्रकृतियों के आधार पर प्रासङ्गिक कथावस्तु के द्वारा मुख्य कथानक का उपकार किया जाया करता है। इन दोनों प्रकार की प्रासङ्गिक-कथाओ के नायको की सम्पूर्ण चेष्टाये प्रधान नायक की फल की सिद्धि करने के लिये ही हुआ करती हैं।

(५) कार्य— जिस फल की प्राप्ति के निमित्त सम्पूर्ण साधनादि सामग्री एकत्रित की जाती है, उसे कार्य कहते हैं।

अर्थावस्थाये

फल-प्राप्ति के इच्छुक पात्रों द्वारा प्रारम्भ किये हुये कार्य की पाँच अवस्थाये हुआ करती हैं :—(१) आरम्भ, (२) यत्न, (३) प्राप्त्याशा, (४) नियताप्ति तथा (५) फलागम।

(१) आरम्भ— महान् फल की प्राप्ति के हेतु जहाँ मात्र उत्कण्ठा ही हुआ करती है, प्रयत्न नही होता, उसी को 'आरम्भ' कहा जाता है।

(२) यत्न— फल-प्राप्ति के लिये अत्यन्त शीघ्रता के साथ जो व्यापार किया जाता है, उसे यत्न कहते है।

(३) प्राप्त्याशा— जहाँ प्राप्ति की आशा, उपाय तथा अपाय (विघ्न) की आशंकाओं से घिरी रहती है किन्तु फिर भी प्राप्ति की संभावना रहा करती है, उसी को प्राप्त्याशा नामक अवस्था कहा जाता है।

(४) नियताप्ति— जब विघ्न समाप्त हो जाते है तथा फल की प्राप्ति निश्चित हो जाया करती है तो इसी अवस्था को नियताप्ति नाम से कहा जाता है।

(५) फलागम— अभीष्ट फल का पूर्ण रूप से मिल जाना ही फलागम कहा जाता है।

पञ्च सन्धियाँ

उपर्युक्त पाँच अर्थप्रकृतियों तथा पाँच अर्थावस्थाओं के क्रमिक संयोग से पाँच

( ८ )

सन्धियों का सृजन हुआ करता है। ये हैं—(१) मुख सन्धि, (२) प्रतिमुख सन्धि, (३) गर्भ सन्धि, (४) अवमर्श अथवा विमर्श सन्धि तथा (५) निर्वहण (उपसंहार) सन्धि।

(१) मुख सन्धि—बीज तथा आरम्भ को मिलाने वाली सन्धि का नाम ही मुख सन्धि है। इसमें रगो की कल्पना होती है।

(२) प्रतिमुख सन्धि—विन्दु तथा यत्न को मिलाने वाली सन्धि का नाम प्रतिमुख सन्धि है। इसमे मुख सन्धि मे अंकुरित बीज कभी लक्षित होता है और कभी अलक्षित।

(३) गर्भ सन्धि—जिस सन्धि मे उपाय कभी दब जाय और उसकी खोज करने के लिये बीज का और भी विकास हो, उसे गर्भ सन्धि कहते हैं। इसमे प्राप्त्याशा तथा पताका का योग होता है। इसमे पताका की सर्वत्र आवश्यकता नहीं पड़ा करती है। कही पर वह विद्यमान रहती है और कही पर नहीं। किन्तु प्राप्त्याशा का तो होना निश्चित है। इसमे फल अन्तर्निहित रहा करता है। इसी कारण इसका नाम गर्भ सन्धि है।

(४) विमर्श सन्धि—जहाँ पर फल का उपाय तो पहुचने की अपेक्षा अधिक विकसित होता है किंतु विघ्नो के उपस्थित हो जाने से उसमे आघात पहुँचा करता है वहाँ विमर्श सन्धि हुआ करती है। इसमे फल-प्राप्ति की पर्यालोचना की जाती है। इसमे नियताप्ति तथा प्रकरी का योग होता है। किन्तु प्रकरी की स्थिति वैकल्पिक रहा करती है।

(५) निर्वहण सन्धि—जहाँ कार्य और फलागम मिलते हैं अर्थात् प्रयोजन की पूर्ण सिद्धि हो जाती है वहाँ निर्वहण सन्धि होती है।

सन्धियो के उपर्युक्त विवेचन द्वारा स्पष्ट हो जाता है कि मुख से कार्य का प्रारम्भ होता है, प्रतिमुख मे वह वृद्धि को प्राप्त करता है, गर्भ में वह उत्कर्ष को प्राप्त करता है, विमर्श में फल की ओर झुकता है तथा निर्वहण मे वह पूर्ण सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।

नेता (नायक)

सभी प्रकार के काव्यों में जो प्रधान पात्र होता है वही नेता अथवा

( ६ )

नायक कहलाता है। नेता शब्द 'नी' धातु से बनता है, जिसका अर्थ ले चलना है। जो पात्र कथानक को फल की ओर ले चलता है उसी को 'नेता' कहते हैं। फल का भोक्ता अथवा प्राप्त करने वाला भी यही होता है।

नेता के चार प्रकार— नाट्यशास्त्र की दृष्टि से नेता चार प्रकार का माना गया है—(१) धीरललित, (२) धीरशान्त (३) धीरोदात्त (४) धीरोद्धत। भरतमुनि के अनुसार देवगण धीरोद्धत की श्रेणी में आते हैं। राजा धीरललित, सेनापति एव अमात्य धीरोदात्त तथा ब्राह्मण और वैश्य धीरशान्त श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं :—

" देवा धीरोद्धता ज्ञेयाः स्युर्धीरललिता नृपाः ।
सेनापतिरमात्यश्च धीरोदात्तौ प्रकीर्तितौ ॥
धीरप्रशान्ता विज्ञेया ब्राह्मणा वणिजस्तथा ॥"

॥ नाट्यशास्त्र २४,१८-१९॥

(१) धीरललित नेता का लक्षण— धीरललित नायक राज्य-सम्बन्धी तथा अन्य प्रकार की भी चिन्ताओं से मुक्त होता है क्योंकि उसके योगक्षेम की चिन्ता उसके मन्त्री आदि के द्वारा की जाती है। इसी कारण वह संगीत, नृत्य, चित्र आदि कलाओं का प्रेमी तथा सांसारिक भोग-विलासादि में निरन्तर संलग्न और रसिकवृत्ति का होता है। उसमे शृंगार रस की प्रधानता हुआ करती है। अतः वह सुकोमल स्वभाव एव आचरण से युक्त होता है। इस प्रकार के नायक प्रायः राजा ही हुआ करते हैं :—

"निश्चिन्तो धीरललितः कलासक्त सुखी मृदुः ॥" दशरूपक २।३ ॥

कालिदास द्वारा रचित 'मालविकाग्निमित्र' नामक नाटक का नायक अग्निमित्र इसी श्रेणी का नायक है।

(२) धीरशान्त नेता का लक्षण— विनय इत्यादि सामान्य गुणों से युक्त ब्राह्मण, वैश्य अथवा मन्त्रिपुत्र आदि धीरशान्त नेता कहे जाते हैं। (भवभूति के 'मालतीमाधव' नामक रूपक का नायक 'माधव' इसी कोटि का नायक है) :—

"सामान्यगुणयुक्तस्तु धीरशान्तो द्विजादिकः ॥" दशरूपक २।४ ॥

( १० )

(३) **धीरोदात्त नेता का लक्षण—**यह नायक अतिशय शक्ति-सम्पन्न हुआ करता है । उसका अन्तःकरण क्रोध, शोक आदि विकारों में अभिभूत नहीं होता है । वह अत्यन्त गम्भीर, सहनशील, अविकत्थन (आत्मप्रशंसक न होना) स्थिरचित्त (चंचलता रहित मन वाला), स्वाभिमानी होने पर भी विनम्रता द्वारा दबे हुये अभिमान वाला, दृढ़व्रत (अर्थात् जिस बात को करने का प्रण कर लेता है उसे अन्त तक निभाने वाला) होता है । नाटक का नायक इसी प्रकृति का होना आवश्यक है —

"महासत्त्वोऽतिगम्भीर क्षमावानविकत्थन ।
स्थिरो निगूढहंकारो धीरोदात्तो दृढव्रत ॥" दशरूपक २।४-५ ॥

'अभिज्ञान शाकुन्तल' नामक नाटक का नायक 'दुष्यन्त' इसी श्रेणी के अन्तर्गत आता है ।

(४) **धीरोद्धत नेता का लक्षण—**यह नायक घमण्डी, ईर्ष्यालु, माया (अर्थात् मन्त्रबल से असत्य वस्तुओं को प्रस्त करना) और कपट में परिपूर्ण, अभिमानी, चंचल मन वाला, क्रोधी तथा आत्मप्रशंसक होता है । उसे अपने शौर्य आदि का अभिमान होता है । उसका मन अस्थिर हुआ करता है । इसके अतिरिक्त वह स्वयं ही अपनी डींग मारने वाला होता है —

"दर्पमात्सर्यभूयिष्ठो मायाछद्मपरायण ।
धीरोद्धतस्त्वहं कारी चलश्चण्डो विकत्थन ॥" दशरूपक २।५-६ ॥

परशुराम तथा भीमसेन को इसी श्रेणी का नायक कहा जा सकता है ।

इन चारों प्रकार के नायकों में से 'धीरोदात्त' नायक को ही संस्कृत नाटककारों ने सर्वाधिक स्थान प्रदान किया है (क्योंकि समाज के लिए यही आदर्श होने योग्य है) । यत्र-तत्र धीरशान्त अथवा धीरललित नायक भी दृष्टिगोचर होते हैं, किन्तु धीरोद्धत नायक का प्रयोग तो संस्कृत नाटककारों ने प्रायः प्रतिनायक के रूप में ही किया है ।

नायिका

नाटक इत्यादि रूपकों में नायिका का भी उतना ही महत्त्व है जितना नायक

( ११ )

का, विशेष रूप से शृंगार रस-प्रधान रूपकों में। नायक की पत्नी अथवा प्रेयसी को ही नायिका कहा जाता है। नायक के सामान्य गुणों का नायिका में भी होना आवश्यक है। नायिका के तीन प्रकार माने गये हैं :—(१) स्वकीया, (२) परकीया तथा (३) सामान्या। स्वकीया अपनी स्त्री, परकीया परायी स्त्री अथवा कन्या तथा सामान्या किसी की भी स्त्री नहीं हुआ करती है।

(१) स्वकीया नायिका—यह नायिका शील, लज्जा आदि गुणों से युक्त होती है। यह पतिव्रता, सच्चरित्रा, अकुटिला, लज्जायुक्त तथा पति के प्रति व्यवहार में कुशल और पति-सेवारत होती है :—

'विनयार्जवादियुक्ता गृहकर्मपरा पतिव्रता स्वीया"

॥ सा० द० ३।५७ ॥

(२) परकीया नायिका—इसके दो प्रकार होते हैं—(१) ऊढा, (२) अनूढा। किसी दूसरे की विवाहिता स्त्री ऊढा की श्रेणी में आती है तथा किसी की अविवाहित पुत्री (कन्या), अनूढा की श्रेणी में आती है :—

"परकीया द्विधा प्रोक्ता परोढा कन्यका तथा। यात्रादिनिरताऽन्योढा कुलटा गलितत्रपा ॥ कन्या त्वजातोपयमा सलज्जा नवयौवना॥" सा० द० ३।६६-६७।।

(३) सामान्या नायिका—यह साधारण स्त्री होती है। गणिका की गणना इसके अन्तर्गत आती है। धन की दृष्टि से यह केवल वाह्य प्रेम को ही प्रकट किया करती है :—

"साधारण स्त्री गणिका कलाप्रागल्भ्यधौर्ययुक् ॥"

॥ दशरूपक २।२१ ॥

रस

सामाजिकों अथवा दर्शकों के हृदय में रसोद्रेक उत्पन्न करना, दृश्य-काव्य का प्रधान उद्देश्य हुआ करता है। किन्तु रस का उतना ही परिपोष किया जाना उचित है कि जिससे कथावस्तु विच्छिन्न न होने पाये। नाटक के लिए जितना आवश्यक तत्त्व 'रस' है उतना ही आवश्यक तत्त्व वस्तु (कथानक) भी है। दोनों ही परस्पर एक दूसरे के सहायक हैं। कथावस्तु का सम्यक् एवं आकर्षक

( १२ )

प्रतिपादन बिना रस के किया जाना संभव नहीं है। इसी प्रकार जब मुख्य कथा-वस्तु ही नहीं होगी तो रस की अनुभूति किसके आधार पर की जा सकेगी। अतः नाटक में वस्तु तथा रस दोनों ही तत्वों की उपयोगिता समान रूप में है।

कथावस्तु के दो पक्ष और रस

कथावस्तु के दो पक्ष होते हैं—प्रथम पक्ष है व्यवहार पक्ष अर्थात् वास्तव जगत् में यह घटना जिस भाँति घटती है, तथा द्वितीय पक्ष है शास्त्र पक्ष अर्थात् नाटक के द्वारा उसी घटना का चित्रण नाटककार द्वारा जिस किसी रूप में प्रस्तुत किया गया है। इनमें प्रथम पक्ष लौकिक है तथा द्वितीय अलौकिक। प्रथम पक्ष में रस की अनुभूति नहीं हुआ करती है। यह वह अवस्था होती है जिसमें केवल भाव का उदय-मात्र ही हुआ करता है। रसानुभूति तो द्वितीय पक्ष में हुआ करती है, अर्थात् जब वही घटना कवि की प्रतिभा के बल पर शब्दों के माध्यम द्वारा काव्य अथवा नाटक का चोला पहनकर आती है, तब वह एक अलौकिक वस्तु होती है और तभी वह रस की अनुभूति कराने में समर्थ हुआ करती है। आनन्द की प्राप्ति भी तभी होती है।

इस भौतिक जगत् में रति आदि स्थायी भाव के जो कारण, कार्य और सहकारी हुआ करते हैं वे यदि नाटक अथवा काव्य में प्रयुक्त होते हैं तो वे ही क्रमशः विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव नाम से कहे जाते हैं। इन विभावादि के द्वारा व्यक्त (रति आदि) स्थायी भाव ही 'रस' कहलाता है।

रस-विभाग—भरतमुनि आदि नाट्यशास्त्रकारों ने नाट्य में केवल आठ रसों की ही स्थिति को स्वीकार किया है और वे हैं—(१) शृंगार, (२) हास्य, (३) करुण, (४) रौद्र, (५) वीर, (६) भयानक, (७) वीभत्स तथा (८) अद्भुत।

अंगी (प्रधान) रस

नाटक में अंगी अथवा प्रधान रस एक ही हुआ करता है। यह या तो शृङ्गार रस हो सकता है अथवा वीर। अन्य सभी रसों का प्रयोग अंग (गौण) रूप में किया जा सकता है। इतना अवश्य है कि निर्वहण-संधि में अद्भुत रस का उपनिबन्धन किया जाना नाट्य-सौंदर्य का द्योतक हुआ करता है। अतः उसका वर्णन उक्त संधि के अन्तर्गत किया जाना आवश्यक तथा उचित भी है :—

( १३ )

“एक एव भवेदङ्गी शृङ्गारो वीर एव वा ।
अङ्गमन्ये रसाः सर्वे कार्यों निर्वहणेऽद्भुतः ॥ सा० द० ६।१०॥

नाटकों का उद्भव

"नाटकों अथवारूपकों का उद्भव कब तथा कैसे हुआ ?" यह एक विवादग्रस्त विषय है। इस विषय में नाट्यशास्त्र-प्रणेता भरतमुनि ने लिखा है कि एक बार सम्पूर्ण देवगण एकत्रित होकर ब्रह्मा के समीप गये तथा उनसे प्रार्थना की कि आप हमको एक ऐसा मनोरंजन का साधन प्रदान कीजिये कि जो श्रव्य तथा दृश्य दोनों ही हो तथा जिसे सभी वर्णों के लोग समान रूप से अपना सके। इनकी इस प्रार्थना को ध्यान में रखते हुये ब्रह्मा ने चारों वेदों से आवश्यक भागो को लेकर पंचम वेद "नाट्य-वेद" की रचना की। इसके निमित्त उन्होने ऋग्वेद से पाठ्य (संवाद, कथोपकथन इत्यादि), सामवेद से संगीत, यजुर्वेद से अभिनय तथा अथर्ववेद से रस के तत्वों को प्राप्त कर इसकी रचना की :-

“एव संकल्प्य भगवान् सर्ववेदाननुस्मरन् ।
नाट्यवेदं ततश्चक्रे चतुर्वेदाङ्गसम्भवम् ॥
जग्राह पाठ्यमृग्वेदात् सामभ्यो गीतमेव च ।
यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥” ना० शा० १।१६-१७।।

नाटक के निमित्त प्रधान रूप से चार प्रकार के साधनो की आवश्यकता हुआ करती है—(१) सवाद, (२) संगीत, (३) अभिनय तथा (४) रस । ये चारों प्रकार के साधन वेदों में विद्यमान है। अतः उक्त आधार पर वेदों द्वारा नाटकों का उद्भव मानना उचित ही प्रतीत होता है।

ऋग्वेद मे अनेक संवाद-सूक्तों का उल्लेख प्राप्त होता है :- यम-यमी सूक्त-१०।१०।।, पुरूरवा-उर्वशी संवाद-सूक्त-१०।६५।।, इन्द्र-मरुत्-संवाद-१।१६५ तथा १७० ।।, इन्द्र-इन्द्राणी-वृषा-कपि-संवाद-१०।८६।। इत्यादि। इन सूक्तों में नाटकोपयोगी 'संवाद' नामक साधन उपलब्ध होता है। उषस्, मरुत्, इन्द्र, अग्नि आदि देवताओं से सम्बन्धित सूक्तों के अन्तर्गत भी उक्त साधन-सम्बन्धी विषय उपलब्ध होता है। सामवेद में तो संगीत की प्रधानता को सभी ने स्वीकार किया है। यजुर्वेद में वर्णित विभिन्न प्रकार के यज्ञों के

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क्रिया-कलाप मे अभिनय-सम्बन्धी अंश विद्यमान है ही। अथर्ववेद मे भी प्रायः सभी प्रकार के रसो का वर्णन प्राप्त होता है।

उपर्युक्त अति सूक्ष्म विवरण के आधार पर यह मान लेना कि वेदो मे ही नाटकों का उद्भव हुआ है, उचित ही प्रतीत होता है।

किन्तु कुछ पाश्चात्य विद्वानो एव आलोचको ने इस विषय मे जो अनुसंधान किया है उसके आधार पर अनेक विचारधारायें प्रस्तुत करते हुये उनके द्वारा अनेक वादो की स्थापना की गई है। इन वादो मे से कुछ का सम्बन्ध धार्मिक भावनाओ से है तथा कुछ का लौकिक लीलाओ अथवा रीति-रिवाजो से। इन सभी वादो का विभाजन तीन भागो में किया जा सकता है —

(१) परम्परागतवाद, (२) धार्मिक भावनावाद, (३) लौकिक लीलावाद।

(१) परम्परागतवाद

**(१) द्युलोकवाद—**धर्मप्रधान भारतीयो का यह विश्वास है कि नाट्य विज्ञान का प्रादुर्भाव द्युलोक से हुआ है। इसके प्रकटीकरण का काल त्रेता युग में माना गया है। सत्ययुग मे तो सभी प्राणी प्रसन्न व सुखी थे। त्रेता युग के आने पर दुःखों का आविर्भाव हुआ, इसी कारण मनोरजन अथवा मनोविनोद की भी आवश्यकता प्रतीत हुई। अतः देव तथा दानव मिलकर ब्रह्मा के समीप गये और उनसे कहा कि कुछ समय के लिये ही दुःखों से छुटकारा प्राप्त करने के हेतु कोई मनोविनोद का साधन हमे प्रदान कीजिये कि जिससे हम लोग कुछ समय के लिए कष्टो को भूल जाया करें। उन्होंने ध्यानावस्थित होकर संसार के प्राणियो के हितार्थ नाट्यवेद नामक पंचम वेद का सृजन किया (जिसका सूक्ष्म वर्णन अभी किया जा चुका है)। उक्त नाट्य-कला की रचना में शिवजी ने ताण्डवनृत्य, पार्वती जी ने लास्यनृत्य तथा विष्णु जी ने चार प्रकार की वृत्तियों का समावेश पूर्ण कर पूर्ण कलात्मकता को ही उत्पन्न कर दिया। इतना ही नहीं, देवलोक के निर्माण-कार्य-विज्ञ विश्वकर्मा ने एक मनोहर रंगमंच का निर्माण किया तथा उस पर रूपको (नाटको) का अभिनय भी सम्पन्न होने लगा। प्राचीनतम नाटक थे—"त्रिपुरदाह" और "समुद्रमन्थन", जिनका अभिनय इन्द्रध्वज-पर्व के अवसर पर किया गया था तथा जिसमे पुरुषों का अभिनय पुरुषो द्वारा और स्त्रियों का अभिनय स्त्रियो द्वारा प्रस्तुत

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किया गया था । इस कला को पृथ्वी-लोक में पहुँचाने का कार्य भरतमुनि द्वारा सम्पन्न किया गया । इस प्रकार उक्त कला का आगमन देवलोक अथवा द्युलोक से इस मर्त्यलोक पर हुआ ।

उपर्युक्त वर्णन में वास्तविकता कितनी है, यह कहा नही जा सकता । किन्तु इतना अवश्य है कि इसके द्वारा नाट्यकला-सम्बन्धी निम्नलिखित बातो का ज्ञान तो प्राप्त हो ही जाता है :—

(१) नाट्य-कला के निर्माण मे चारो वेदों का किसी न किसी अंश मे योग अवश्य है ।

(२) पुरातन समय में स्त्री तथा पुरुष दोनो ही अपना-अपना अभिनय किया करते थे ।

(३) तत्कालीन सभी नाटक धर्मप्रधान हुआ करते थे जिनका अभिनय धार्मिक पर्वों पर ही हुआ करता था ।

(४) वैदिक काल में किसी भी नाटक की रचना नहीं हो सकी थी । इसी कारण देव तथा दानवों को मिलकर ब्रह्मा से प्रार्थना करनी पड़ी होगी ।

(२) धार्मिक भावनावाद

(२) मृतक पूजावाद — डा० रिजवे का कथन है कि संसार में नाटकों की उत्पत्ति मृत आत्माओं को प्रसन्न करने तथा उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने की दृष्टि से हुई । भारत, यूनान आदि प्राचीन देशों में प्राचीन काल से ही इस भाँति की श्रद्धा प्रकट करने की प्रथा चली आती है । यह श्रद्धा ही सभी धर्मों का मूल है । इस भाँति नाटको का अभिनय मृत आत्माओं को प्रसन्न करने के निमित्त हुआ करता था । रामलीला एवं कृष्णलीला आदि लीलाये इसी भावना की प्रतीक कही जा सकती हैं । इस मृतक पूजा के आधार पर ही शनैः-शनैः नृत्य, गान तथा अभिनय होने लगे । इस भाँति नाटकों की रचना का प्रादुर्भाव हुआ ।

किन्तु उपर्युक्त मत को विद्वानों द्वारा मान्यता प्राप्त न हो सकी, क्योंकि