भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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( १३ )

“एक एव भवेदङ्गी शृङ्गारो वीर एव वा ।
अङ्गमन्ये रसाः सर्वे कार्यों निर्वहणेऽद्भुतः ॥ सा० द० ६।१०॥

नाटकों का उद्भव

"नाटकों अथवारूपकों का उद्भव कब तथा कैसे हुआ ?" यह एक विवादग्रस्त विषय है। इस विषय में नाट्यशास्त्र-प्रणेता भरतमुनि ने लिखा है कि एक बार सम्पूर्ण देवगण एकत्रित होकर ब्रह्मा के समीप गये तथा उनसे प्रार्थना की कि आप हमको एक ऐसा मनोरंजन का साधन प्रदान कीजिये कि जो श्रव्य तथा दृश्य दोनों ही हो तथा जिसे सभी वर्णों के लोग समान रूप से अपना सके। इनकी इस प्रार्थना को ध्यान में रखते हुये ब्रह्मा ने चारों वेदों से आवश्यक भागो को लेकर पंचम वेद "नाट्य-वेद" की रचना की। इसके निमित्त उन्होने ऋग्वेद से पाठ्य (संवाद, कथोपकथन इत्यादि), सामवेद से संगीत, यजुर्वेद से अभिनय तथा अथर्ववेद से रस के तत्वों को प्राप्त कर इसकी रचना की :-

“एव संकल्प्य भगवान् सर्ववेदाननुस्मरन् ।
नाट्यवेदं ततश्चक्रे चतुर्वेदाङ्गसम्भवम् ॥
जग्राह पाठ्यमृग्वेदात् सामभ्यो गीतमेव च ।
यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥” ना० शा० १।१६-१७।।

नाटक के निमित्त प्रधान रूप से चार प्रकार के साधनो की आवश्यकता हुआ करती है—(१) सवाद, (२) संगीत, (३) अभिनय तथा (४) रस । ये चारों प्रकार के साधन वेदों में विद्यमान है। अतः उक्त आधार पर वेदों द्वारा नाटकों का उद्भव मानना उचित ही प्रतीत होता है।

ऋग्वेद मे अनेक संवाद-सूक्तों का उल्लेख प्राप्त होता है :- यम-यमी सूक्त-१०।१०।।, पुरूरवा-उर्वशी संवाद-सूक्त-१०।६५।।, इन्द्र-मरुत्-संवाद-१।१६५ तथा १७० ।।, इन्द्र-इन्द्राणी-वृषा-कपि-संवाद-१०।८६।। इत्यादि। इन सूक्तों में नाटकोपयोगी 'संवाद' नामक साधन उपलब्ध होता है। उषस्, मरुत्, इन्द्र, अग्नि आदि देवताओं से सम्बन्धित सूक्तों के अन्तर्गत भी उक्त साधन-सम्बन्धी विषय उपलब्ध होता है। सामवेद में तो संगीत की प्रधानता को सभी ने स्वीकार किया है। यजुर्वेद में वर्णित विभिन्न प्रकार के यज्ञों के