मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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प्रतिपादन बिना रस के किया जाना संभव नहीं है। इसी प्रकार जब मुख्य कथा-वस्तु ही नहीं होगी तो रस की अनुभूति किसके आधार पर की जा सकेगी। अतः नाटक में वस्तु तथा रस दोनों ही तत्वों की उपयोगिता समान रूप में है।
कथावस्तु के दो पक्ष और रस
कथावस्तु के दो पक्ष होते हैं—प्रथम पक्ष है व्यवहार पक्ष अर्थात् वास्तव जगत् में यह घटना जिस भाँति घटती है, तथा द्वितीय पक्ष है शास्त्र पक्ष अर्थात् नाटक के द्वारा उसी घटना का चित्रण नाटककार द्वारा जिस किसी रूप में प्रस्तुत किया गया है। इनमें प्रथम पक्ष लौकिक है तथा द्वितीय अलौकिक। प्रथम पक्ष में रस की अनुभूति नहीं हुआ करती है। यह वह अवस्था होती है जिसमें केवल भाव का उदय-मात्र ही हुआ करता है। रसानुभूति तो द्वितीय पक्ष में हुआ करती है, अर्थात् जब वही घटना कवि की प्रतिभा के बल पर शब्दों के माध्यम द्वारा काव्य अथवा नाटक का चोला पहनकर आती है, तब वह एक अलौकिक वस्तु होती है और तभी वह रस की अनुभूति कराने में समर्थ हुआ करती है। आनन्द की प्राप्ति भी तभी होती है।
इस भौतिक जगत् में रति आदि स्थायी भाव के जो कारण, कार्य और सहकारी हुआ करते हैं वे यदि नाटक अथवा काव्य में प्रयुक्त होते हैं तो वे ही क्रमशः विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव नाम से कहे जाते हैं। इन विभावादि के द्वारा व्यक्त (रति आदि) स्थायी भाव ही 'रस' कहलाता है।
रस-विभाग—भरतमुनि आदि नाट्यशास्त्रकारों ने नाट्य में केवल आठ रसों की ही स्थिति को स्वीकार किया है और वे हैं—(१) शृंगार, (२) हास्य, (३) करुण, (४) रौद्र, (५) वीर, (६) भयानक, (७) वीभत्स तथा (८) अद्भुत।
अंगी (प्रधान) रस
नाटक में अंगी अथवा प्रधान रस एक ही हुआ करता है। यह या तो शृङ्गार रस हो सकता है अथवा वीर। अन्य सभी रसों का प्रयोग अंग (गौण) रूप में किया जा सकता है। इतना अवश्य है कि निर्वहण-संधि में अद्भुत रस का उपनिबन्धन किया जाना नाट्य-सौंदर्य का द्योतक हुआ करता है। अतः उसका वर्णन उक्त संधि के अन्तर्गत किया जाना आवश्यक तथा उचित भी है :—