भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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प्रतिपादन बिना रस के किया जाना संभव नहीं है। इसी प्रकार जब मुख्य कथा-वस्तु ही नहीं होगी तो रस की अनुभूति किसके आधार पर की जा सकेगी। अतः नाटक में वस्तु तथा रस दोनों ही तत्वों की उपयोगिता समान रूप में है।

कथावस्तु के दो पक्ष और रस

कथावस्तु के दो पक्ष होते हैं—प्रथम पक्ष है व्यवहार पक्ष अर्थात् वास्तव जगत् में यह घटना जिस भाँति घटती है, तथा द्वितीय पक्ष है शास्त्र पक्ष अर्थात् नाटक के द्वारा उसी घटना का चित्रण नाटककार द्वारा जिस किसी रूप में प्रस्तुत किया गया है। इनमें प्रथम पक्ष लौकिक है तथा द्वितीय अलौकिक। प्रथम पक्ष में रस की अनुभूति नहीं हुआ करती है। यह वह अवस्था होती है जिसमें केवल भाव का उदय-मात्र ही हुआ करता है। रसानुभूति तो द्वितीय पक्ष में हुआ करती है, अर्थात् जब वही घटना कवि की प्रतिभा के बल पर शब्दों के माध्यम द्वारा काव्य अथवा नाटक का चोला पहनकर आती है, तब वह एक अलौकिक वस्तु होती है और तभी वह रस की अनुभूति कराने में समर्थ हुआ करती है। आनन्द की प्राप्ति भी तभी होती है।

इस भौतिक जगत् में रति आदि स्थायी भाव के जो कारण, कार्य और सहकारी हुआ करते हैं वे यदि नाटक अथवा काव्य में प्रयुक्त होते हैं तो वे ही क्रमशः विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव नाम से कहे जाते हैं। इन विभावादि के द्वारा व्यक्त (रति आदि) स्थायी भाव ही 'रस' कहलाता है।

रस-विभाग—भरतमुनि आदि नाट्यशास्त्रकारों ने नाट्य में केवल आठ रसों की ही स्थिति को स्वीकार किया है और वे हैं—(१) शृंगार, (२) हास्य, (३) करुण, (४) रौद्र, (५) वीर, (६) भयानक, (७) वीभत्स तथा (८) अद्भुत।

अंगी (प्रधान) रस

नाटक में अंगी अथवा प्रधान रस एक ही हुआ करता है। यह या तो शृङ्गार रस हो सकता है अथवा वीर। अन्य सभी रसों का प्रयोग अंग (गौण) रूप में किया जा सकता है। इतना अवश्य है कि निर्वहण-संधि में अद्भुत रस का उपनिबन्धन किया जाना नाट्य-सौंदर्य का द्योतक हुआ करता है। अतः उसका वर्णन उक्त संधि के अन्तर्गत किया जाना आवश्यक तथा उचित भी है :—

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“एक एव भवेदङ्गी शृङ्गारो वीर एव वा ।
अङ्गमन्ये रसाः सर्वे कार्यों निर्वहणेऽद्भुतः ॥ सा० द० ६।१०॥

नाटकों का उद्भव

"नाटकों अथवारूपकों का उद्भव कब तथा कैसे हुआ ?" यह एक विवादग्रस्त विषय है। इस विषय में नाट्यशास्त्र-प्रणेता भरतमुनि ने लिखा है कि एक बार सम्पूर्ण देवगण एकत्रित होकर ब्रह्मा के समीप गये तथा उनसे प्रार्थना की कि आप हमको एक ऐसा मनोरंजन का साधन प्रदान कीजिये कि जो श्रव्य तथा दृश्य दोनों ही हो तथा जिसे सभी वर्णों के लोग समान रूप से अपना सके। इनकी इस प्रार्थना को ध्यान में रखते हुये ब्रह्मा ने चारों वेदों से आवश्यक भागो को लेकर पंचम वेद "नाट्य-वेद" की रचना की। इसके निमित्त उन्होने ऋग्वेद से पाठ्य (संवाद, कथोपकथन इत्यादि), सामवेद से संगीत, यजुर्वेद से अभिनय तथा अथर्ववेद से रस के तत्वों को प्राप्त कर इसकी रचना की :-

“एव संकल्प्य भगवान् सर्ववेदाननुस्मरन् ।
नाट्यवेदं ततश्चक्रे चतुर्वेदाङ्गसम्भवम् ॥
जग्राह पाठ्यमृग्वेदात् सामभ्यो गीतमेव च ।
यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥” ना० शा० १।१६-१७।।

नाटक के निमित्त प्रधान रूप से चार प्रकार के साधनो की आवश्यकता हुआ करती है—(१) सवाद, (२) संगीत, (३) अभिनय तथा (४) रस । ये चारों प्रकार के साधन वेदों में विद्यमान है। अतः उक्त आधार पर वेदों द्वारा नाटकों का उद्भव मानना उचित ही प्रतीत होता है।

ऋग्वेद मे अनेक संवाद-सूक्तों का उल्लेख प्राप्त होता है :- यम-यमी सूक्त-१०।१०।।, पुरूरवा-उर्वशी संवाद-सूक्त-१०।६५।।, इन्द्र-मरुत्-संवाद-१।१६५ तथा १७० ।।, इन्द्र-इन्द्राणी-वृषा-कपि-संवाद-१०।८६।। इत्यादि। इन सूक्तों में नाटकोपयोगी 'संवाद' नामक साधन उपलब्ध होता है। उषस्, मरुत्, इन्द्र, अग्नि आदि देवताओं से सम्बन्धित सूक्तों के अन्तर्गत भी उक्त साधन-सम्बन्धी विषय उपलब्ध होता है। सामवेद में तो संगीत की प्रधानता को सभी ने स्वीकार किया है। यजुर्वेद में वर्णित विभिन्न प्रकार के यज्ञों के

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क्रिया-कलाप मे अभिनय-सम्बन्धी अंश विद्यमान है ही। अथर्ववेद मे भी प्रायः सभी प्रकार के रसो का वर्णन प्राप्त होता है।

उपर्युक्त अति सूक्ष्म विवरण के आधार पर यह मान लेना कि वेदो मे ही नाटकों का उद्भव हुआ है, उचित ही प्रतीत होता है।

किन्तु कुछ पाश्चात्य विद्वानो एव आलोचको ने इस विषय मे जो अनुसंधान किया है उसके आधार पर अनेक विचारधारायें प्रस्तुत करते हुये उनके द्वारा अनेक वादो की स्थापना की गई है। इन वादो मे से कुछ का सम्बन्ध धार्मिक भावनाओ से है तथा कुछ का लौकिक लीलाओ अथवा रीति-रिवाजो से। इन सभी वादो का विभाजन तीन भागो में किया जा सकता है —

(१) परम्परागतवाद, (२) धार्मिक भावनावाद, (३) लौकिक लीलावाद।

(१) परम्परागतवाद

**(१) द्युलोकवाद—**धर्मप्रधान भारतीयो का यह विश्वास है कि नाट्य विज्ञान का प्रादुर्भाव द्युलोक से हुआ है। इसके प्रकटीकरण का काल त्रेता युग में माना गया है। सत्ययुग मे तो सभी प्राणी प्रसन्न व सुखी थे। त्रेता युग के आने पर दुःखों का आविर्भाव हुआ, इसी कारण मनोरजन अथवा मनोविनोद की भी आवश्यकता प्रतीत हुई। अतः देव तथा दानव मिलकर ब्रह्मा के समीप गये और उनसे कहा कि कुछ समय के लिये ही दुःखों से छुटकारा प्राप्त करने के हेतु कोई मनोविनोद का साधन हमे प्रदान कीजिये कि जिससे हम लोग कुछ समय के लिए कष्टो को भूल जाया करें। उन्होंने ध्यानावस्थित होकर संसार के प्राणियो के हितार्थ नाट्यवेद नामक पंचम वेद का सृजन किया (जिसका सूक्ष्म वर्णन अभी किया जा चुका है)। उक्त नाट्य-कला की रचना में शिवजी ने ताण्डवनृत्य, पार्वती जी ने लास्यनृत्य तथा विष्णु जी ने चार प्रकार की वृत्तियों का समावेश पूर्ण कर पूर्ण कलात्मकता को ही उत्पन्न कर दिया। इतना ही नहीं, देवलोक के निर्माण-कार्य-विज्ञ विश्वकर्मा ने एक मनोहर रंगमंच का निर्माण किया तथा उस पर रूपको (नाटको) का अभिनय भी सम्पन्न होने लगा। प्राचीनतम नाटक थे—"त्रिपुरदाह" और "समुद्रमन्थन", जिनका अभिनय इन्द्रध्वज-पर्व के अवसर पर किया गया था तथा जिसमे पुरुषों का अभिनय पुरुषो द्वारा और स्त्रियों का अभिनय स्त्रियो द्वारा प्रस्तुत

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किया गया था । इस कला को पृथ्वी-लोक में पहुँचाने का कार्य भरतमुनि द्वारा सम्पन्न किया गया । इस प्रकार उक्त कला का आगमन देवलोक अथवा द्युलोक से इस मर्त्यलोक पर हुआ ।

उपर्युक्त वर्णन में वास्तविकता कितनी है, यह कहा नही जा सकता । किन्तु इतना अवश्य है कि इसके द्वारा नाट्यकला-सम्बन्धी निम्नलिखित बातो का ज्ञान तो प्राप्त हो ही जाता है :—

(१) नाट्य-कला के निर्माण मे चारो वेदों का किसी न किसी अंश मे योग अवश्य है ।

(२) पुरातन समय में स्त्री तथा पुरुष दोनो ही अपना-अपना अभिनय किया करते थे ।

(३) तत्कालीन सभी नाटक धर्मप्रधान हुआ करते थे जिनका अभिनय धार्मिक पर्वों पर ही हुआ करता था ।

(४) वैदिक काल में किसी भी नाटक की रचना नहीं हो सकी थी । इसी कारण देव तथा दानवों को मिलकर ब्रह्मा से प्रार्थना करनी पड़ी होगी ।

(२) धार्मिक भावनावाद

(२) मृतक पूजावाद — डा० रिजवे का कथन है कि संसार में नाटकों की उत्पत्ति मृत आत्माओं को प्रसन्न करने तथा उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने की दृष्टि से हुई । भारत, यूनान आदि प्राचीन देशों में प्राचीन काल से ही इस भाँति की श्रद्धा प्रकट करने की प्रथा चली आती है । यह श्रद्धा ही सभी धर्मों का मूल है । इस भाँति नाटको का अभिनय मृत आत्माओं को प्रसन्न करने के निमित्त हुआ करता था । रामलीला एवं कृष्णलीला आदि लीलाये इसी भावना की प्रतीक कही जा सकती हैं । इस मृतक पूजा के आधार पर ही शनैः-शनैः नृत्य, गान तथा अभिनय होने लगे । इस भाँति नाटकों की रचना का प्रादुर्भाव हुआ ।

किन्तु उपर्युक्त मत को विद्वानों द्वारा मान्यता प्राप्त न हो सकी, क्योंकि

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राम, कृष्ण आदि की लीलायें करने का उद्देश्य श्रद्धा प्रकट करना नहीं है वरन् उनके चरित्र का स्मरण तथा श्रवण कर तदनुकूल अपने जीवन का निर्माण करना ही है। साथ ही राम एवं कृष्ण की स्मृति को स्थायित्व प्रदान करना भी है।

(३) मे पोलवाद— उपर्युक्त वाद में पाश्चात्य विद्वानों को भी विश्वास न हो सका अतः उन्होंने नाटकों का उद्भव मे-पोल-नृत्य से स्वीकार किया। पाश्चात्य देशों में मई मास महान् उल्लास एवं हर्ष का मास माना जाता है। इसमे लोग अत्यन्त प्रसन्नता एवं उल्लास के साथ उत्सव मनाते हैं, नृत्य करते हैं तथा पूर्ण आनन्द का अनुभव किया करते हैं। इतना ही नहीं, वे लोग एक लम्बा बाँस गाड़कर उसके नीचे एकत्रित होते तथा सभी स्त्री-पुरुष मिलकर नृत्य किया करते हैं। इस देश में भी 'इन्द्रध्वज' नामक पर्व लगभग इसी रूप में मनाया जाया करता था!

प्राय सभी देशों में वसन्त ऋतु का उत्सव अत्यन्त हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। मे-पोल का उत्सव भी इसी ऋतु में हुआ करता है किन्तु 'इन्द्रध्वज' सम्बन्धी उत्सव तो भारत में वर्षा ऋतु में मनाया जाता है। अतः मे-पोल उत्सव के साथ इसका सम्बन्ध जोड़ना पूर्णतया अनुचित ही प्रतीत होता है।

(४) कृष्णोपासनावाद— इस वाद के अनुसार नाटकों का उद्भव केवल कृष्ण की उपासना से ही माना गया है। इसमें सन्देह नहीं कि कृष्णो-पासना से सम्बन्धित रथयात्रायें, नृत्य, वाद्य, गीत तथा लीलायें आदि कृष्णो-पासना के अंगो (साधनों) का नाटकों के अभिनय इत्यादि से घनिष्ठ सम्बन्ध है तथा ये इस प्रकार के साधन हैं कि जो सम्पूर्ण नाटकों के निर्माण में सहायक भी सिद्ध हुये हैं। अतः इसी आधार पर सम्पूर्ण नाटकों का विकास कृष्णोपासना से माना गया है।

किन्तु इस वाद में सबसे बड़ा दोष यह है कि कृष्ण-सम्बन्धी नाटक ही सर्वाधिक प्राचीन हों, इसका कोई पुष्ट प्रमाण नहीं मिलता है। इसके अतिरिक्त यह भी सम्भव हो सकता है कि राम, शिव आदि देवों की उपासनाओं द्वारा भी भारतीय नाटकों के विकास में सहयोग प्राप्त हुआ हो, किन्तु इस बात की उपर्युक्त बातों में पूर्णतया उपेक्षा की गई।

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( ३ ) लौकिक लीलावाद

(५) लोकप्रिय स्वांगवाद—प्रो० हिलेब्रांट तथा प्रो० स्टेनकोनो के मतानुसार नाटको का उद्भव लोकप्रिय स्वांगों द्वारा हुआ। भारत में प्राचीन काल में लोकप्रिय स्वांगों का प्रचलन अधिक था। इन स्वांगों के साथ रामायण तथा महाभारत के आख्यानो का सम्मिश्रण कर नाटकों के कथानक तैयार किये जाते रहे होगे।

किन्तु डा० कीथ ने इस मत का विरोध करते हुये कहा कि उपर्युक्त वाद में सबसे बडा दोष यही है कि नाटक के प्रचार से पहले स्वांगों के प्रचलित होने के बारे में कोई सुदृढ़ प्रमाण उपलब्ध नही होता है। श्री कोनो द्वारा जिन प्रमाणों का उल्लेख किया गया है वे प्रायः सभी महाभाष्य के समकालीन तथा उसके पश्चाद् के ज्ञात होते हैं। अतः उनसे स्वांगो की प्राचीनता सिद्ध नही होती है। इसकी अपेक्षा प्रो० हिलेब्राण्ट ने जो युक्तियाँ दी हैं उनसे कुछ बल अवश्य मिलता है। उन्होने नाटको में गद्य-पद्य दोनों का प्रयोग, संस्कृत भाषा के साथ प्राकृत भाषा का प्रयोग, रंगशालाओं के अन्दर आडम्बरहीनता तथा सादगी का होना तथा विदूषक जैसे लोकप्रिय पात्र के आधार पर नाटकों का उद्भव लोकप्रिय स्वांगो द्वारा माना है। इनमें से प्रथम तीन बातों का समाधान तो हो जाता है साथ ही नाटकों के विकास का सम्बन्ध भी धार्मिक संस्कारों के साथ जुड जाता है। किन्तु विदूषक जैसे पात्र का आविर्भाव महाव्रत-संस्कार में शूद्र पात्र की आवश्यकता से हुआ माना जा सकता है। महाव्रत वास्तव में एक धार्मिक संस्कार है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई इस प्रकार का प्रमाण नही मिलता कि जिसके आधार पर नाटको में विदूषक जैसे पात्र को रखने का सम्बन्ध किसी लौकिक लीला के साथ रहा हो।

(६) पुत्तलिका नृत्यवाद—जर्मन-विद्वान् डा० पिशेल के मतानुसार नाटकों का उद्भव कठपुतलियो के नृत्य से हुआ है। नाटकों में प्रयुक्त सूत्रधार तथा स्थापक आदि शब्द इस मत के पोषक हैं। कथासरित्सागर, महाभारत तथा राजशेखर कृत बाल-रामायण में इनका उल्लेख प्रायः पुत्तलिका, दारुमयी पुत्रिका इत्यादि नामों के रूप में पाया जाता है।

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किन्तु यह वाद भी भ्रान्तिपूर्ण ही प्रतीत होता है। प्रो० हिलेब्राण्ट के सिद्धान्तानुसार कठपुतलियों के नाच के इतिहास को ध्यान में रखते हुए यह मानना पड़ता है कि नाटकों का उद्भव इससे पूर्व ही हो चुका था। इसके अतिरिक्त नाना प्रकार के भावों तथा रसों से युक्त नाटक की उत्पत्ति इस साधारण से पुत्तलिका नृत्य से हुई हो ऐसा मानना पूर्णतया निराधार तथा हास्यास्पद ही प्रतीत होता है।

(७) छाया नाट्यवाद—डा० लूडर्स का मत है कि नाटकों का जन्म छाया द्वारा दिखलाये जाने वाले खेलो में हुआ। प्राचीन काल में छाया द्वारा अनेक खेलों के दिखलाये जाने की प्रथा विद्यमान थी। उनके अनुसार महाभाष्य में वर्णित शोभिक मूक-अभिनेता अथवा छाया-मूर्तियों के व्याख्याता थे।

किन्तु डा० कीथ के मतानुसार यह विचार महाभाष्य के वाक्य के किये गये अशुद्ध अर्थ पर ही आधारित है। इसके अतिरिक्त इस वाद के मानने वाले को भी नाटकों की सत्ता छाया द्वारा दिखलाये जाने वाले खेलों की उत्पत्ति से पहले ही स्वीकार करनी पड़ती है। अतः यह वाद भी निरर्थक ही हो जाता है।

(८) संवाद सूक्तवाद—ऋग्वेद के अन्तर्गत १५ से भी अधिक (जिनका उल्लेख "नाटकों का उद्भव" शीर्षक विषय के प्रारम्भ में ही किया जा चुका है।) ऐसे संवाद-सूक्त मिलते हैं जिनमें धार्मिक भावनाओं के अतिरिक्त लोक व्यवहार सम्बन्धी संवादों का भी उल्लेख उपलब्ध होता है। सन् १८६६ ई० में प्रो० मैक्समुलर का ध्यान इन सूक्तों की ओर गया और उन्होंने उन्हीं सूक्तों को नाटकों की उत्पत्ति का मूलभूत कारण बतलाया। इसके अनन्तर डा० हर्टेल, प्रो० सिल्वैन लेवी तथा प्रो० बॉन श्रोडर और कुछ अन्य विद्वानों ने भी दृढ़ता के साथ इसी मत का समर्थन किया।

नाटक के मुख्य साधन नृत्य, गीत तथा संवाद माने गये हैं। ऋग्वेदीय सम्वादों के साथ पहले नृत्य एवं गीत भी रहे हों, यह भी सम्भव है। किन्तु आज उनका कोई स्वरूप नहीं मिलता। ऋग्वेद में विवाह सूक्त के अन्तर्गत वर एवं वधू के समक्ष पुरन्ध्रियों द्वारा नृत्य किये जाने का उल्लेख मिलता है तथा गीत भी ऋग्वेद में विद्यमान हैं ही। अतः ऋग्वेदीय संवाद-सूक्तों से ही नाटकों का उद्भव मान लेना अधिक समीचीन प्रतीत होता है।

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(६) वैदिक अनुष्ठानवाद—कुछ अन्य विद्वानों ने इन संवाद-सूक्तों के अतिरिक्त वैदिक अनुष्ठानों के द्वारा भी नाटकों का उद्भव माना है। ऊपर जिन संवाद-सूक्तों का वर्णन किया जा चुका है उनको भी अनुष्ठान का एक अङ्ग ही कहा जा सकता है। इसके साथ ही साथ वैदिक युग में 'महाव्रत' नामक अनुष्ठान का प्रचलन अधिक था। इस अनुष्ठान की विधि भी एक प्रकार के नाटक के ही समान थी क्योंकि इसमें कुमारियाँ अग्नि के चारों ओर नृत्य करती थी। इसके अतिरिक्त यज्ञ-सूत्रों में यज्ञ मण्डप के नीचे स्थित यजमानों तथा याजकों के मनोरंजन के निमित्त वार्तालाप-युक्त सूक्तों से नाटकों के कथोपकथनों का संकेत उपलब्ध होता है। कुछ विद्वानों का तो यहाँ तक कहना है कि नाटकों के अन्तर्गत विद्यमान गद्यमय संवाद 'महाव्रत' में प्रयुक्त संवाद के आधार पर ही रखे गये हैं। अतः इस वाद के विवरण के आधार पर यह तो कहा ही जा सकता है कि वैदिक अनुष्ठानों में सभी नाटकीय तत्त्व किसी न किसी अंश में अवश्य विद्यमान थे।

इसके अतिरिक्त प्रो० वेबर तथा प्रो० विडिश ने भारतीय नाटकों की उत्पत्ति में यूनानी नाट्यकला के प्रभाव को सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। किन्तु प्रो० सिलवन लेवी आदि विद्वानों द्वारा इस मत का पूर्णतया विरोध किया गया है। अतः यह मत भी अमान्य हो जाता है।

उपर्युक्त नाटकों का उद्भव सम्बन्धी विस्तृत विवेचन कर हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि नाटकों के उद्भव के बारे में प्राचीन नृत्य, गीत तथा संवादों का विशिष्ट भाग रहा है। प्राचीन काल में प्रायः सभी जातियों में नृत्य, गीत आदि का प्रचलन था। सभ्यता के विकास के साथ ही साथ नृत्य, गीत आदि का भी विकास हुआ तथा इनका विकसित रूप ही बाद में 'नाटक' शब्द द्वारा कहा गया जिसमें अभिनय ने और भी जीवन डाल दिया। अतः यह कहना उचित ही होगा कि भारत में ही सर्वप्रथम नाटकों का प्रादुर्भाव हुआ।

संस्कृत-नाटकों के विकास का क्रमिक इतिहास

नाटकों के प्रमुख अङ्ग हैं—संवाद, संगीत, नृत्य और अभिनय। ऋग्वेद में यम-यमी (ऋग्वेद-१०।१०), पुरूरवा एवं उर्वशी (ऋग्वेद-१०।९५),

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सरमा और पणि ( ऋग्वेद १०।१०८ ) इत्यादि संवादात्मक सूक्तो का विवरण प्राप्त होता है जिनसे नाटकीय 'संवाद' नामक तत्त्व की पुष्टि होती है । 'संगीत' नामक नाटकीय तत्त्व सामवेद मे मिलता ही है । इसके अतिरिक्त शेष प्रमुख नाटकीय तत्त्व किसी न किसी रूप मे वैदिक-काल में अवश्य विद्यमान रहे होगे । अतः यह हो सकता है कि ये ऋग्वेदीय-संवादात्मक सूक्त ही कालान्तर में परिष्कृत होकर नाटको के रूप मे परिणत हो गये हो ।

ऋग्वेदीय सूक्तों का अध्ययन करने से यह भी ज्ञात होता है—"सोम-विक्रय" के समय एक प्रकार का अभिनय हुआ करता था जिसका मुख्य प्रयोजन दर्शको का मनोविनोद ही था । अश्वमेध इत्यादि विशिष्ट यज्ञो के अवसरों के समय तथा उनके बीच-बीच में होने वाले कर्मानुष्ठानो के मध्य प्राप्त होने वाले अव-काश के समय "शुन शेप" इत्यादि के पुराने आख्यानो का कथन किया जाया करता था । उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह भी कल्पना की जा सकती है कि उपर्युक्त प्रसगो के अवसरों पर वैदिक देवताओ के चरित्र से सम्बन्धित नाटको का भी यथावसर प्रयोग होता रहा हो । हो सकता है कि ये नाटक कला की दृष्टि से पूर्ण न रहे हो किन्तु यह तो सम्भव है ही कि उनमे संस्कृत-नाट्यकला के बीज विद्यमान रहे हो ।

मैक्समूलर ने भी वेदो मे प्रयुक्त संवादात्मक सूक्तो के आधार पर वैदिक काल से ही नाट्यकला का उद्भव सिद्ध किया है (देखिए मैक्समूलर—ओरिजिन आफ दि ऋग्वेद, वाल्यूम १, पृष्ठ १७३ ) । डा० दास गुप्ता तथा एस० के० डे महोदय ने भी यही स्वीकार किया है कि उन मन्त्रो मे नाटकीय-तत्त्व अधिकांश रूप में विद्यमान हैं तथा तत्कालीन जनजीवन के धार्मिक अवसरो, संगीत समा-रोहों तथा नृत्यानुष्ठानों से नाटक का घनिष्ठ सम्बन्ध था (देखिए डा० एम० एन० दास गुप्ता तथा एम० के० डे हिस्ट्री आफ संस्कृत लिटरेचर, वाल्यूम १, पृष्ठ ४४, १९४७) ।

बाजसनेयि-माध्यन्दिन-शुक्ल-यजुर्वेद-सहिता में ( "नृत्ताय सूत गीताय शैलूषं धर्माय समाहर"—इत्यादि मन्त्र यजुर्वेद ३०।६ ) तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण में "शैलूष" शब्द आता है जिसका अर्थ होता है "नट" ( तैत्तिरीय ब्राह्मण ३।४।२।१ ) । कौषीतकि-ब्राह्मण मे नृत्य, गीति तथा संगीत मुख्य

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विधाओं में परिणत किये गये है। “महाव्रत” में वृष्टि की उत्पत्ति तथा पशुओं की समृद्धि के निमित्त अग्नि के चारों ओर कुमारियों द्वारा नृत्य किये जाने का वर्णन आता है तथा विवाह-समाप्ति से पूर्व अग्निदेव के समक्ष स्त्रियों के नृत्य करने का भी संकेत मिलता है।१ इन उल्लेखों के द्वारा यह स्पष्ट हो जाता है कि वैदिक तथा ब्राह्मण-काल में नटों तथा नाट्यकला का अस्तित्व विद्यमान था।

इसके पश्चात् रामायण तथा महाभारत-काल में भी नाट्यकला की ओर देशवासियो का ध्यान था। इन दोनों ग्रन्थों में ‘नट’, ‘नर्त्तक’ तथा ‘गायक’ आदि का उल्लेख अनेक स्थलों पर उपलब्ध होता है। वाल्मीकि-रामायण में एक स्थान पर आया है कि जिस जनपद में राजा निवास नहीं किया करता है वहाँ नट, नर्त्तक आदि हर्षित दृष्टिगोचर नहीं हुआ करते हैं।२ रामायण में ही नट तथा नर्त्तकों की गोष्ठी तथा मनोरंजन सम्बन्धी वर्णन भी उपलब्ध होता है।३ “व्यामिश्र”४ शब्द का प्रयोग इस प्रकार के नाटकों के लिये किया गया है जिनमें कई भाषाओं का मिश्रण रहा करता था।

इस काल में विद्यमान नाट्यकला पर धर्म का प्रभाव स्पष्ट रूप से दृष्टि-गोचर होता है। धार्मिक उत्सवों पर मनोविनोदार्थ राम तथा कृष्ण की लीलाओं का अभिनय भी किया जाता था। इस विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस काल तक “नाटक” जन-साधारण के लिये श्रद्धा एवं सम्मान का विषय बन गया था।

संस्कृत-व्याकरण के निर्माता पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी मे नट सम्बन्धी सूत्रो का उल्लेख मिलता है। इन सूत्रो में ‘शिलालि’५ तथा ‘कृशाश्व’५


१. बलदेव उपाध्याय—संस्कृत साहित्य का इतिहास (पंचम संस्करण) पृष्ठ ४५२, पंक्ति ६-११। “हमारी नाट्य परम्परा” (श्री कृष्णदास) पृष्ठ ३६, पंक्ति ५-८।
२. वाल्मीकि-रामायण २।६७।१५॥
३. वाल्मीकि-रामायण—अयोध्याकाण्ड ६७।१५॥
४. वाल्मीकि-रामायण—अयोध्याकाण्ड १।२७॥
५. पाराशर्य शिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः ॥ अष्टाध्यायी ४।३।११०॥
कर्मन्द कृशाश्वादिनी ॥ अष्टा० ४।३।१११॥

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नामक आचार्यों द्वारा निर्मित नट-सूत्रों का विवरण प्राप्त होता है । पाणिनि का समय ईसा से लगभग ७०० वर्ष पूर्व माना गया है। अत यह मानना उचित ही है कि ईसा से ७०० वर्ष पूर्व तक नाटकों का इतना प्रचार हो गया था कि नटों की शिक्षा के निमित्त स्वतन्त्र सूत्रों की भी रचना की जाने लगी थी ।

इसके पश्चात् हमें पतंजलि मुनि द्वारा रचित 'महाभाष्य' देखने को मिलता है । इस महाभाष्य में कुछ प्रमाण ऐसे भी मिले हैं कि जिनके आधार पर नाटकों का रंगभूमि पर प्रयोग किये जाने का प्रमाण भी मिल जाता है। महाभाष्य में आया है —

“ये तावदेते शोभनिका (सौभिका) नामैते, प्रत्यक्षं कंसं घातयन्ति, प्रत्यक्षं च बलिं बन्धयन्ति इति । अतश्च सत व्यामिश्रा हि दृश्यन्ते, केचिद् कंसभक्ता भवन्ति केचित् वासुदेवभक्ता ।” इत्यादि

महाभाष्य ३।२।१११॥

इस उद्धरण में “कंस घातयति” और “बलिं बन्धयन्ति” में प्रयुक्त वर्तमानकाल की क्रिया का समाधान करते हुये भाष्यकार ने उन नटों (शोभनिकों) का उल्लेख किया है जो प्रत्यक्ष रूप से सभी के समक्ष कंस को मारते तथा बलि को बांधते हैं । इससे स्पष्ट हो जाता है कि पतञ्जलि के समय में 'कंसवध' और 'बलिबन्ध' नामक नाटकों का अभिनय हुआ था । आगे चलकर इन नाटकों के अभिनय-प्रकार का भी सूक्ष्म वर्णन महाभाष्य में इसी प्रसंग में मिलता है :—

“वर्णान्यत्वं खलु पुष्यन्ति । केचिद्रक्तमुखा भवन्ति, केचित् कालमुखा ।” महाभाष्य ३।२।१११॥

इसमें बतलाया गया है कि 'कंसवध' नामक नाटक में कंस के भक्त तो अपना मुख काला रंगकर अभिनय किया करते थे तथा कृष्ण के भक्त अपने मुखों को लाल रंग में रंग कर ।

महाभाष्य सम्बन्धी उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि पतञ्जलि के काल तक नाटकों का अभिनय जन साधारण के मनोरञ्जन के लिये एक उत्तम तथा सर्वप्रिय साधन बन चुका था ।

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संस्कृत नाटकों के विकास सम्बन्धी उपर्युक्त विवरण मे यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृत-नाटकों का प्रारम्भ वैदिक काल में ही किसी न किसी अंश में हो गया था। धार्मिक उत्सवों से भी उसे प्रेरणा मिली। शनैः-शनैः नाटकों का विकास होता गया तथा पतञ्जलि के समय तक उसका पूर्ण विकसित स्वरूप जनता के समक्ष आ गया। हाँ, इतना अवश्य है कि महाभाष्य में वर्णित नाटक आज हमे उपलब्ध नही है।

नाटककार विशाखदत्त का काल और जीवनवृत्त

काल तथा जीवनवृत्त जानने के दो प्रमुख साधन— किसी नाटककार अथवा कवि के काल और जीवनवृत्त को जानने के दो प्रकार के प्रमुख साधन हुआ करते हैं :— (१) अन्तःसाक्ष्य— अर्थात् नाटककार अथवा कवि ने अपनी कृतियो में अपने बारे मे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से क्या लिखा है? (२) बहिःसाक्ष्य— अर्थात् कवि अथवा नाटककार के समकालीन अथवा परवर्त्ती विद्वानों आदि ने उसके सम्बन्ध में क्या-क्या लिखा है। इन दोनो प्रकार के साधनो मे अन्तःसाक्ष्य अधिक प्रामाणिक हुआ करता है। पहले हम प्रथम साधन के आधार पर विचार करेगे।

अन्तःसाक्ष्य की दृष्टि से विशाखदत्त ने भी महाकवि भास तथा कालिदास की ही भांति अपने सम्बन्ध मे कुछ भी न लिखना ही उचित समझा है। 'नाटक' महान् हुआ करता है, नाटककार नही; इस प्राचीन धारणा से विशाखदत्त पूर्णतया प्रभावित थे। नाटककार की दृष्टि से नाटक की प्रस्तावना में उन्होने मात्र यही लिखा है :—

“आज्ञापितोऽस्मि परिषदा यथा--अद्य त्वया सामन्तवटेश्वरदत्त-पौत्रस्य महाराजभास्करदत्तसूनोः कवेर्विशाखदत्तस्य कृतिराभिनवं मुद्राराक्षसं नाम नाटकं नाटयितव्यमिति।”

प्रस्तावना के उपर्युक्त अंश से केवल यही ज्ञात हो पाता है कि लेखक का नाम विशाखदत्त है! कुछ हस्तलिखित प्रतियों में 'विशाखदेव' नाम भी मिलता है। और वह सामन्त वटेश्वरदत्त के पौत्र तथा महाराज भास्करदत्त के पुत्र हैं अर्थात् इनके पिता का नाम महाराज भास्करदत्त तथा पितामह का नाम सामन्त

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वटेश्वरदत्त था। कुछ संस्करणों में “महाराजभाष्करदत्तसूनोः” के स्थान पर “महाराजपदभाक्सूनो ” पाठ भी उपलब्ध होता है जिसके अनुसार इनके पिता का नाम ‘महाराज पृथु’ होता है।

संस्कृत भाषा के नाटक-साहित्य का ऐतिहासिक काल-क्रम निर्णय करने वाले विद्वानों ने विशाखदत्त के कार्य-काल के बारे मे कुछ कल्पनायें की हैं जिनका संक्षिप्त उल्लेख देना यहाँ उचित ही होगा।

कुछ विद्वानों ने ‘विशाखदत्त’ के नाम के साथ ‘दत्त’ शब्द और साथ ही साथ सामन्त वटेश्वरदत्त और भाष्करदत्त के साथ भी ‘दत्त’ शब्द देखकर यह स्वीकार किया है कि इनका वंश ‘दत्त-वंश’ था किन्तु इस बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं होता।

प्रोफेसर विल्सन न महाराज पृथु को चौहानवंशीय रायपिथौरा अथवा पृथुराज सिद्ध करने का प्रयास किया था किन्तु वे स्वयं उनकी पदवियों तथा उनके पिताओं के नाम आदि की विभिन्नता का कोई मण्डन न कर सके। श्री तैलंग महोदय ने भी इस मत का खंडन करते हुए स्पष्ट किया है कि विशाखदत्त के पिता पृथु और अजमेर के चौहान पृथुराय दोनों ही भिन्न भिन्न व्यक्ति हैं क्योंकि नाटककार के पिता पृथु विशेषरूप से ‘महाराज’ पद से सम्बोधित किये गये हैं, जब कि अजमेर के पृथु केवल पृथुराज अथवा पृथुराय ही हैं। अब तो जर्मन विद्वान् हिले ब्राण्ट द्वारा सम्पादित मुद्राराक्षस में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि विशाखदत्त के पिता का नाम भास्करदत्त ही था। उन्होंने इसी को प्रामाणिक ठहराया है। अतः महाराज पृथु सम्बन्धी विषय स्वयं ही निरस्त हो जाता है।

अन्तःसाक्ष्य की दृष्टि से ही इनके स्थिति काल के सम्बन्ध मे प्रमुख एवं महत्त्वशाली स्थल जो इनकी रचना ‘मुद्राराक्षस’ में मिलता है—वह है नाटक के अन्त में आया हुआ “भरतवाक्य”। नाटककार विशाखदत्त के काल-निर्णय से सम्बन्धित सभी कल्पनायें एकमात्र इसी पर आधारित हैं। किन्तु इस भरतवाक्य के द्वारा भी निश्चित रूप से इनका काल-निर्णय नहीं हो पाता क्योंकि इस भरत वाक्य में आये हुये प्रमुखपद ‘पार्थिवश्चन्द्रगुप्त’ मे अनेक रूपता उपलब्ध होती है। मुद्राराक्षस की प्राप्य हस्तलिखित प्रतियों मे “पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः” के अतिरिक्त

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“पार्थिवोऽवन्तिवर्मा”, “पार्थिवोदन्तिवर्मा” और “पार्थिवोरन्तिवर्मा” ये तीन भिन्न-भिन्न पाठ और भी मिलते हैं। यह भरतवाक्य निम्नलिखित है :—

“वाराहीमात्मयोनेस्तनुमतनुबलामास्थितस्यानुरूपां
यस्य प्राग्दन्तकोटिं प्रलयपरिगता शिश्रिये भूतधात्री ।
म्लेच्छैरुद्विज्यमाना भुजयुगमधुना संश्रिता राजमूर्तेः
स श्रीमद्बन्धुभृत्यश्चिरमवतु महीं पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः ।। ७।१६ ।।

उपर्युक्त चारों प्रकार के पाठों में ‘पार्थिवोरन्तिवर्मा’ पाठ तो पूर्णतया अप्रामाणिक प्रतीत होता है। रन्तिवर्मा नाम के राजा के विषय में श्री तैलङ्ग तथा दास गुप्ता का यह विचार है कि भारतीय इतिहास के प्राचीन अथवा मध्ययुगीन काल में कहीं पर भी इस नाम का कोई भी राजा उपलब्ध नहीं होता। अतः उक्त पाठ अशुद्ध ही प्रतीत होता है। नकल करने वाले व्यक्ति का यह प्रमाद ही प्रतीत होता है कि वह ‘पार्थिवोऽवन्तिवर्मा’ के स्थान पर ‘पार्थिवोरन्तिवर्मा’ लिख गया होगा।

२. पार्थिवोदन्तिवर्मा पाठ—कुछ विद्वानों ने इसी पाठ को प्रामाणिक माना है तथा इसी आधार पर विशाखदत्त को पल्लवनरेश दन्तिवर्मा का समसामयिक माना है। पल्लवनरेश दन्तिवर्मा का शासनकाल ७७६-८३० ई० माना गया है। अतः विशाखदत्त का समय अष्टम शताब्दी माना जा सकता है। श्रीरामस्वामी ने तो इसी पल्लवनरेश दन्तिवर्मा के साथ, जो सप्तम शताब्दी में हुआ है, विशाखदत्त का सम्बन्ध जोड़ा है। किन्तु दन्तिवर्मा पाठ मान लेने पर विशाखदत्त का सम्बन्ध राष्ट्रकूट राजा दन्तिवर्मा के साथ, जो ६०० ई० में हुआ है, भी जोड़ा जा सकता है। लाट राजा दन्तिवर्मा, जो ८५० ई० में हुआ है, के साथ भी हो सकता है। उपर्युक्त विवरण से दन्तिवर्मा नाम के कई राजाओं का होना स्पष्ट हो जाता है। फिर किस दन्तिवर्मा के साथ विशाखदत्त का सम्बन्ध माना जाय, यह निश्चित किया जाना सम्भव नहीं है।

फिर यदि उपर्युक्त में से किसी को स्वीकार कर भी लिया जाय तो विशाखदत्त का समय सप्तम शताब्दी से लेकर नवम शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक किसी भी समय स्वीकार करना होगा। (१) किन्तु इस बीच किसी भी आक्रमणकारी म्लेच्छ का पता नहीं चलता है कि जिसके उत्पीड़न से पृथिवी की रक्षा के निमित्त प्रार्थना की

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जाय, जैसी कि इस भरतवाक्य में प्रार्थना की गई है। (२) सबसे बड़ी बात तो यह है, जैसा कि प्रा० ध्रुव ने भी स्वीकार किया है कि पल्लव-नरेश तो कट्टर शैवमता-वलम्बी थे, जब कि लेखक ने भरतवाक्य में राजा को विष्णु का अवतारस्वरूप ही कहा है।

ऐसी अवस्था में मुद्राराक्षस के भरतवाक्य का अपना गौरव ही समाप्त हो जायेगा। अतः पल्लवनरेश दन्तिवर्मा को विशाखदत्त का आश्रयदाता मानना उचित प्रतीत नहीं होता है।

(३) पार्थिवोऽवन्तिवर्मा पाठ—इस पाठ को प्रामाणिक मान लेने पर भी लेखक किसी राजा के आश्रित था, इसका उचित समाधान नहीं हो पाता है क्योंकि भारतीय इतिहास में अवन्तिवर्मा नाम के दो राजाओं का उल्लेख मिलता है। विद्वानों ने इन दोनों ही अवन्तिवर्मा नामों का उल्लेख विशाखदत्त के आश्रय-दाता के रूप में किया है। इनमें से एक हैं—कन्नौज के मौखरि राजा अवन्तिवर्मा जो सप्तम शताब्दी में हुए थे तथा जिनके पुत्र ग्रहवर्मा का विवाह हर्षवर्धन की बहिन राज्यश्री के साथ हुआ था। और दूसरे हैं कश्मीर-नरेश अवन्तिवर्मा—जिन्होंने नवम शताब्दी के मध्य ८५५ से ८६३ ई० तक राज्य किया था।

प्रो० याकोबी का अपना विचार है कि २ दिसम्बर, ८६० ई० को जो चन्द्र-ग्रहण पड़ा था, उसी का वर्णन मुद्राराक्षस के प्रथम अङ्क की प्रस्तावना रूप में हुआ है -

"क्रूरग्रहः सकेतुश्चन्द्रमसम्पूर्णमण्डलमिदानीम् ।
अभिभवितुमिच्छति बलात् रक्षत्येनं तु बुधयोगः ॥१।६॥"

इसी आधार पर उनकी यह मान्यता है कि विशाखदत्त कश्मीर के राजा अवन्तिवर्मा के समय में हुये थे। इसी उपर्युक्त ग्रहण के अवसर पर अवन्तिवर्मा के मन्त्री शूर ने इस नाटक का अभिनय कराया था। अतः विशाखदत्त का काल नवम शताब्दी का उत्तरार्द्ध ही होना चाहिये।

इस मत में प्रथम (१) आपत्ति तो यही है कि लेखक कश्मीर नरेश अवन्ति-वर्मा का सामन्त अथवा राजा नहीं हो सकता क्योंकि उसका राज्य इतना बड़ा नहीं था।

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(२) दूसरी आपत्ति यह है कि मुद्राराक्षस के लेखक विशाखदत्त ने कश्मीर-नरेश पुष्कराक्ष को 'म्लेच्छ' इस घृणित नाम से अभिहित किया है। यहाँ यह विचारणीय है कि यदि लेखक के आश्रयदाता कश्मीर-नरेश रहे होते तो क्या वह अपने आश्रयदाता को 'म्लेच्छ' शब्द द्वारा कहता ? अतः इससे स्पष्ट हो जाता है कि विशाखदत्त कश्मीर-नरेश के आश्रय में नहीं रहे।

(३) तीसरी बात यह है कि प्रस्तावना मे जिस चन्द्रग्रहण का उल्लेख आया है वह वस्तुतः सत्य न होकर चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रसङ्ग की अवतारणा के साथ ही रंगमंच पर लाने का प्रयास मात्र ही है। इसके अतिरिक्त वराहमिहिर द्वारा रचित वृहत्संहिता मे बुध के योग से पूर्ण चन्द्रग्रहण के होने मे विप्रतिपत्ति दिखलाई गई है। उन्होंने इसका प्रबल खण्डन किया है। अतः इस आधार पर विशाखदत्त का समय वराहमिहिर (लगभग ४९० ई०) से पूर्व ही होना चाहिये। इस दृष्टि से चन्द्रग्रहण के आधार पर निर्मित विचार निराधार ही हो जाता है।

(४) इसके अतिरिक्त श्रीतैलङ्ग महोदय ने कश्मीर-नरेश अवन्तिवर्मा को इस आधार पर विशाखदत्त का आश्रयदाता नहीं स्वीकार किया है कि उनको जिन स्थानो से मुद्राराक्षस की दो पाण्डुलिपियाँ प्राप्त हुयी है उन स्थानों से यह कश्मीर अधिक दूरी पर स्थित है।

अब इस पाठ के अन्तर्गत मौखरिवंशीय अवन्तिवर्मा की बात आती है। तैलङ्ग महोदय इसी को प्रामाणिक मानते हैं। उनके मतानुसार ये 'अवन्तिवर्मा' राजा हर्षवर्धन (जिनका कार्यकाल ऐतिहासिकों के मतानुसार ६०६-६४८ ई० माना गया है।) के बहनोई ग्रहवर्मा के पिता मौखरि राजा अवन्तिवर्मा थे। ये कन्नौज निवासी थे। कन्नौज के राजा के सामन्त का बिहार अथवा पश्चिमी बंगाल में भी होना संभव माना जा सकता है। प्रोफेसर श्री ध्रुव का भी इस सम्बन्ध मे यही मत है कि :—

'मिहिरकुल' तथा 'तोरमाण' द्वारा स्थापित हूण-साम्राज्य दशपुर (आजकल इसे मंदसौर कहा जाता है।) के संग्राम में महाराज यशोवर्मा के हाथों सन् ५२८ ई० में नष्ट हुआ तथा छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त हो गया; जिसके अन्तर्गत पंजाब में 'शाकल' (आधुनिक स्यालकोट) राज्य, और पश्चिमी राजपूताना

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तथा गुजरात में गुर्जर-राज्य प्रमुख थे । हूणों के ये छोटे-छोटे राज्य स्थाण्वीश्वर ( थानेश्वर ) और कान्यकुब्ज ( कन्नौज ) के राज्यों से शत्रुता रखने रहे । परिणामस्वरूप कन्नौज के मौखर या मौखरिवंशीय राजा ईशानवर्मा तथा सर्ववर्मा के इन हूणों के साथ कई बार युद्ध हुए जिनमें थानेश्वर के राजाओं की सहायता स मौखरिवंशीय राजाओ ने हूणों को हराया । शाकल के हूणवंशीय राजा तो थानेश्वर राज्य के शत्रु ही बन गये । परिणाम यह हुआ कि महाराज प्रभाकर-वर्धन और उनके सम्बन्धी कन्नोज के महाराज अवन्तिवर्मा ने मिलकर हूणों का नाश कर दिया । हूणों की विजय से प्रभावित महाकवि वाण ने प्रभाकरवर्धन की विजय-प्रशस्ति भी लिखी है तथा जिस ‘अवन्तिवर्मा’ की विजय का उल्लेख विशाखदत्त ने अपने मुद्राराक्षस के भरतवाक्य मे किया है वे महाराज प्रभाकरवर्धन क सम्बन्धी और उनके परम सहायक अवन्तिवर्मा ही हैं । इस हूण-विजय का समय सन् ५८२ ई० आंका गया है । इस भाँति मुद्राराक्षस के लेखक विशाखदत्त का कार्यकाल ईसा की छठी शताब्दी का अन्तिम उत्तरार्द्ध भाग ही होना चाहिये ।

उपर्युक्त समय का निर्धारण करते समय यह बात भी विचारणीय प्रतीत होती है कि विशाखदत्त ने एक पद्य में महाकवि भारवि का अनुकरण किया है जिसका समय लगभग छठी शताब्दी का उत्तरार्द्ध माना गया है । इससे विशाख-दत्त का भारवि का परवर्ती होना सिद्ध होता है । साथ ही वे ‘माघ’ के पूर्ववर्ती भी प्रतीत होते हैं क्योकि माघ ने परिवर्तित रूप मे मुद्राराक्षस मे यह उक्ति ली है —

“तन्त्रावापविदायोगैर्मण्डलान्वधितिष्ठता । मुनिग्रहा नरेन्द्रण फणीन्द्रा इव शत्रव ॥”

अतः यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि विशाखदत्त का समय इन दोनो कवियों के समय के मध्य मे ही होना चाहिये । यह समय छठी शताब्दी के आस-पास ही होगा ।

उपर्युक्त समय की पुष्टि डा० विण्टरनिट्स द्वारा भी की गई है । उनका कथन है कि विशाखदत्त द्वारा रचित “देवीचन्द्रगुप्त” नामक नाटक के जो अंश उपलब्ध हुये हैं उनसे ज्ञात होता है कि इसमें ध्रुव देवी (अथवा ध्रुवस्वामिनी) के चन्द्र-गुप्त द्वितीय द्वारा शत्रु के पंजे से मुक्त किये जाने की घटना वर्णित है । इस

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नाटक का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि समुद्रगुप्त के पश्चात् उनके पुत्र रामगुप्त सम्राट् बने थे। इस कायर राजा ने अपने समकालीन शक-नरेश के आक्रमण के भय से सन्धि के रूप में अपनी अति सुन्दर रानी ध्रुवदेवी को उसे दे देने का वचन दे दिया था। किन्तु उसके छोटे भाई कुमार चन्द्रगुप्त (सम्राट् चन्द्रगुप्त द्वितीय) ने रानी का वेश धारण कर एक अप्रत्याशित कूटनीतिक चाल द्वारा शक-नरेश को मार डाला। तदनन्तर चन्द्रगुप्त ने अपने बड़े भाई रामगुप्त को भी मारकर गुप्त-साम्राज्य को हथिया लिया तथा ध्रुवदेवी से, जो उनके अनुपम साहस के कारण उन पर अनुरक्त थी, विवाह कर लिया। इससे कुमार-गुप्त की उत्पत्ति हुई। यह संभव प्रतीत नहीं होता कि विशाखदत्त ने एक ऐसे नाटक की, कि जिसमें चन्द्रगुप्त ने अपने अग्रज रामगुप्त का हननकर उसकी रानी से विवाह कर लिया हो, रचना चन्द्रगुप्त अथवा कुमारगुप्त के शासनकाल में की हो। अतः 'देवीचन्द्रगुप्त' नामक नाटक की रचना राजा अवन्तिवर्मा के काल में ही विशाखदत्त द्वारा की गई होगी। इस भाँति उक्त आधार पर भी विशाखदत्त का समय छठी शताब्दी का उत्तरार्द्ध ही बनता है।

इस 'अवन्तिवर्मा' से सम्बन्धित मत में भी अनेक आपत्तियाँ उठाई जाती हैं जो निम्नलिखित हैं :--

(१) यदि विशाखदत्त द्वारा कन्नौज के महाराज 'अवन्तिवर्मा' की प्रशस्ति अपने नाटक "मुद्राराक्षस" के 'भरतवाक्य' के द्वारा की गई और स्थाण्वीश्वर के महाराज प्रभाकरवर्धन की यशोगाथा का गान महाकवि बाण द्वारा किया गया तो यह बड़े आश्चर्य की बात है। समसामयिक होते हुये भी दोनों (बाण तथा विशाखदत्त) एक दूसरे से अपरिचित क्यों रहे ? क्योंकि दोनों में से किसी ने भी एक दूसरे के बारे में अपनी कृतियों में संकेतमात्र तक नहीं किया है।

(२) राजा अवन्तिवर्मा समग्र भारत अथवा अधिकांश भारत का एकच्छत्र सम्राट् कभी नहीं रहा कि जिसका वर्णन मुद्राराक्षस के तृतीय अङ्क के उन्नीसवें (आशैलेन्द्रात्...इत्यादि) तथा चौबीसवें श्लोक में चाणक्य के कथनों में उपलब्ध होता है।

(३) इन्होंने ऐसा कोई उल्लेखनीय कार्य भी नहीं किया है कि जिसके

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आधार पर उन्हें भगवान् विष्णु का पृथ्वी-रक्षक अवतार माना जाय (जैसा कि भरतवाक्य में वर्णित है )।

(४) मुद्राराक्षस की शैली छठी अथवा उसके बाद की शताब्दी की शैली से मेल नहीं खाती है ।

(५) इस नाटक के सप्तम अङ्क के छठे ( "दुष्कालेऽपि "इत्यादि ) श्लोक में वर्णित चन्दनदास के शील-सौजन्य को बोधिसत्वों के शील-सौजन्य से बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन किया जाना छठी अथवा उसके बाद की शताब्दी के भारत की धार्मिक भावनाओं के साथ संगत नहीं है ।

(६) मुद्राराक्षस के 'भरतवाक्य' में 'म्लेच्छ' शब्द से केवल हूणों का ही अर्थ लिया जाय, यह बात कुछ उचित प्रतीत नहीं होती है, जब कि नाटककार ने कुलूताधिपति चित्रवर्मा, मलयदेश के राजा सिंहनाद, कश्मीर-नरेश पुष्कराक्ष, सिन्धुदेश के राजा सिन्धुषेण और पारस के अधिपति मेघ को भी म्लेच्छ कहा है ( कौलूतश्चित्रवर्मा इत्यादि श्लोक १।२०।। ) । पर्वतेश्वर तथा उसका बेटा मलयकेतु भी म्लेच्छ ही थे । इसके अतिरिक्त नाटककार शक, यवन, किरात, कम्बोज दरद्वासी, परशियन तथा बाह्लीक लोगों से भी पूर्णतया परिचित है (द्वितीय अङ्क में विराघगुप्त के कथन में १३वें श्लोक से पूर्व) । ये सभी म्लेच्छ-राज पर्वतक की सेना के अङ्ग थे । ये सभी उस समय वीरता के लिये प्रसिद्ध थे । इन पर कोई साधारण राजा विजय प्राप्त नहीं कर सकता था । अतः नाटककार ने जिस राजा की महानता एव अप्रतिम शक्ति शालिता का वर्णन अपने नाटक में प्रस्तुत किया है वह राजा मौखरिवंशीय 'अवन्तिवर्मा' नहीं हो सकता है । अतः 'अवन्तिवर्मा' को विशाखदत्त का आश्रयदाता स्वीकार किया जाना संगत प्रतीत नहीं होता है ।

(४) पार्थिवश्चन्द्रगुप्त पाठ ही अधिक प्रामाणिक प्रतीत होता है, ऐसा कुछ विद्वानों तथा आलोचकों ने स्वीकार किया है । इस पाठ के स्वीकार कर लेने पर यह कठिनाई उपस्थित होती है कि भारत के अतीत में 'चन्द्रगुप्त' नामधारी तीन शासक हुये हैं—(१) मौर्य-साम्राज्य की स्थापना करने वाला 'चन्द्रगुप्त मौर्य' जो स्वयं ही नाटक का एक प्रमुख पात्र है । (२) मगध के गुप्त साम्राज्य की स्थापना से सम्बन्ध रखने वाला चन्द्रगुप्त प्रथम तथा (३) चन्द्रगुप्त

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द्वितीय जिसे अपनी असीम शक्ति के कारण 'विक्रमादित्य' नामक उपाधि से अलङ्कृत किया गया था।

इन तीनो मे से प्रथम 'चन्द्रगुप्त मौर्य' तो हो नही सकता क्योकि नाटक की प्रस्तावना में इनके पितामह को सामन्त तथा पिता को महाराज शब्दों द्वारा कहा गया है। विशाखदत्त चन्द्रगुप्त मौर्य के न तो सामन्त ही थे न महाराज ही। यह बात नाटक के पढ़ने से स्वयं ही सिद्ध हो जाती है। दूसरी बात यह है कि नाटक के अन्दर लेखक का उसके प्रति केवल आदर का भाव ही व्यक्त नही हुआ है, घृणा की भी अभिव्यक्ति हुई है।

गुप्त सम्राट् चन्द्रगुप्त प्रथम भी विशाखदत्त के आश्रयदाता नही हो सकते क्योकि इतिहास मे ऐसा कहीं नही मिलता है कि इन्होने विदेशी म्लेच्छ आक्रमण-कारियो को पराजित किया हो।

अतः अब चन्द्रगुप्त द्वितीय ही शेष रह जाते है, जिनको विशाखदत्त का आश्रयदाता समझा जा सकता है। यह एक प्रतापी राजा था। इसका राज्य प्रायः समस्त भारत में फैला हुआ था। इसी ने शको को पराजित कर 'विक्रमादित्य' की उपाधि को प्राप्त किया था। इसी के द्वारा कुषाण के वंशजों तथा बाह्लीको और अन्य म्लेच्छों को दूर भगांकर पंजाब में इन लोगों से अधि-कृत प्रदेश को अपने अधिकार मे कर लिया गया था। इन्ही की राजधानी कुसुमपुर ( आधुनिक पटना ) थी जहाँ से सम्पूर्ण भारत का संचालन किया जाता था। विशाखदत्त ने अपने नाटक मुद्राराक्षस मे प्रकारान्तर से इसी चन्द्र-गुप्त द्वितीय का वर्णन किया है। यह चन्द्रगुप्त द्वितीय विष्णुभक्त भी था। अतः उसी को पृथ्वी का उद्धारक विष्णु का अवतार कहा जाना भी युक्तिसंगत प्रतीत होता है।

इस विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि विशाखदत्त के आश्रयदाता चन्द्रगुप्त द्वितीय ही रहे होगे। चन्द्रगुप्त द्वितीय का कार्य-काल ३७५ ई० से ४१३ ई० तक माना जाता है। अतः विशाखदत्त का स्थितिकाल चतुर्थ शताब्दी का उत्तरार्द्ध अथवा पंचम शताब्दी का पूर्वार्द्ध स्वीकार किया जा सकता है।

मुद्राराक्षस में चन्दनदास के शील एवं सौजन्य का जो चित्र उपस्थित किया