भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 488 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 135

३२ मुद्राराक्षसम्

मौर्यलक्ष्मी स्थिरपदा कृता, कोपप्रीत्यो द्वयो सारम् द्वितयम् फलम् अभियुक्तेन
मनसा द्विषति च सुहृदि च तुल्य विभक्तम् ॥१३॥

व्याख्याभुव—पृथिव्या, हृदयरोगा इव—हृदयस्य रोगा व्याधय इव, नव—एतत्संख्यका, नन्दा—सर्वार्थसिद्धे नवपुत्रा अथवा अष्टपुत्रसमेतो नन्द, समुत्खाता—समूलमुन्मूलिता, सरसि—सरोवरे, नलिनी इव—कमलिनी इव, मौर्ये—चन्द्रगुप्ते, लक्ष्मी—राज्यश्री, स्थिरपदा—निश्चलस्थिति, कृता—विहिता, कोपप्रीत्यो—कोप अवज्ञाजनित क्रोध प्रीति सेवाजनित प्रसाद तयो, द्वयो—उभयो, सारम्—न्याय्यम्, द्वितय—द्विविध, फलम्—परिणामम्, अभियुक्तेन—निविष्टेन, मनसा—चेतसा, द्विषति च—शत्रौ च, सुहृदि च मित्रे च, तुल्य—समान, विभक्तम्—विभज्य स्थापितम् ॥१३॥

हिन्दी अनुवाद—सो मैं इस समय प्रतिज्ञा के बोझ को उतार चुकने पर भी चन्द्रगुप्त के लिए शस्त्र धारण कर रहा हूँ। जिस मैंने—

पृथ्वी के हृदय-रोग के समान नौ नन्दों को उखाड़ फेंका है, सरोवर में कमलिनी की भांति चन्द्रगुप्त में राज्यलक्ष्मी को अचल कर डाला है और (इस प्रकार) क्रोध और प्रसन्नता दोनों के दो प्रकार के न्यायोचित फल (निग्रह और अनुग्रह) को पूरे मनोयोग से शत्रु (नन्द) और मित्र (चन्द्रगुप्त) में बांट दिया है ॥१३॥

टिप्पणीअवसितप्रतिज्ञाभर—प्रतिज्ञा के कष्ट से निवृत्त हो चुकने वाला। अव √सो + क्त कर्मणि = अवसित। वृषलापेक्षया—चन्द्रगुप्त के अनुरोध से। अत्र हेतौ तृतीया। शस्त्र धारयामि—शस्त्र (वेत्रयष्टि या तलवार) धारण करता हूँ। यह इसलिए कहा गया है कि चाणक्य उस समय चन्द्रगुप्त के प्रधान मन्त्री थे और युद्ध के अवसर पर प्रधान मन्त्री को सेनापतित्व का भार भी संभालना पड़ता था। हृदयरोगा—हृदय के रोग या शूल। हृदयस्य रोगा हृदयरोगा। 'वा शोकष्यञ्रोगेषु' इस सूत्र से विकल्प से हृदय को हृद् आदेश होने के कारण 'हृद्रोगा' और 'हृदयरोगा', दोनों रूप साधु हैं। द्वितयम्—दो प्रकार का। द्वौ अवयवौ अस्य इति द्वि + तयप्। इस पद्य में उत्प्रेक्षा अलङ्कार, उपमा अलङ्कार और यथासंख्य अलङ्कार की संसृष्टि है और शिखरिणी छन्द है। इसका लक्षण यह है—'रसै रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी' ॥१३॥