भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः ३६

ऐसी जनश्रुति लोक में फैला दी गई है। (दूसरा यह है कि) लोगों के विश्वास के लिए इसी बात को स्पष्ट करने के लिए (हमारे गुप्तचर) भागुरायण ने 'तुम्हारे पिता को चाणक्य ने मरवाया है' ऐसा एकान्त में भय दिलाकर पर्वतक के पुत्र मलयकेतु को भगा दिया है। यह (मलयकेतु) राक्षस की बुद्धि के अनुसार चलकर युद्ध के लिए प्रयत्नशील होता हुआ भी (मेरी) बुद्धि के द्वारा वश में किया जा सकता है। फिर मैं इस (मलयकेतु) को कैद कर पर्वतक की हत्या से उत्पन्न होकर फैलते हुए राक्षस के कलंक को धोना नही चाहता हूँ।

टिप्पणी—'मयापि न शयानेन स्थीयते'—यहाँ से लेकर 'तेनेदानीं महत्प्रयोजनमनुष्ठेयं भविष्यति' तक समाधान नामक मुखसन्ध्यङ्ग है। विषकन्यया—विषाक्त कन्या के द्वारा। प्राचीन काल में शत्रु को मरवाने के लिए विषकन्या का उपयोग किया जाता था—'लावण्यभूषणा कान्ता योषितं क्रमशो विषैः। युवती योजयेत् कामिरिपुभूपाप्तघातने।' किसी सुन्दरी लडकी के शरीर को बचपन से ही औषधि के प्रयोग द्वारा शनैः शनैः इतना विषयुक्त कर दिया जाता था कि कालान्तर में उससे संभोग करने वाले की मृत्यु हो जाती थी। विषतुल्या वा विषदिग्धा वा विषसिद्धा कन्या विषकन्या मध्यमपदलोपी स०, तया। करणे तृतीया। अत्यन्तोपकारि—बहुत उपकार करनेवाला। अत्यन्तम् उपकारि सुप्मुपा स०। पर्वतक ने कुसुमपुर के चारो ओर घेरा डालने में चन्द्रगुप्त की सैनिक सहायता की थी। इसी से वह उपकारी था। अभिव्यक्तये—स्पष्टता के लिए। अभि√वि-अञ्ज्+क्तिन् भावे=अभिव्यक्तिः, तस्यै। तादर्थ्ये चतुर्थी। राक्षसमतिपरिगृहीतः—राक्षस की बुद्धि पर अवलम्बित अर्थात् बिलकुल राक्षस के कथनानुसार काम करने वाला। परि समन्तात् गृहीतः इति परि√ग्रह्+क्त कर्मणि=परिगृहीतः। व्युत्तिष्ठमानः—युद्ध के लिए उठता हुआ या यत्न करता हुआ। वि-उद्√स्था+शानच् कर्तरि। अत्र 'उदोऽनूर्ध्वकर्मणि' इति सूत्रेण आत्मनेपदत्वम्। प्रमाष्टुम्—पोंछने के लिए। प्र√मृज्+तुमुन्, 'मृजेर्वृद्धिः' इति सूत्रेण वृद्धिः=प्रमाष्टुम् वा प्रमार्जितुम्।

प्रयुक्ताश्च स्वपक्षपरपक्षयोरनुरक्तापरक्तजनजिज्ञासया बहुविधदेशवेषभाषाचारसञ्चारवेदिनो नानाव्यञ्जनाः प्रणिधयः। अन्विष्यते च कुसुमपुरवासिनां नन्दामात्यसुहृदां निपुण प्रचारगतम्। तत्तत्कारणमुत्पाद्य कृतकृत्यतामापादिताश्चन्द्रगुप्तसहोत्थायिनो भद्रभटप्रभृतयः प्रधानपुरुषाः। शत्रुप्रयुक्तानां च तीक्ष्णरसदायिनां प्रतिविधानं प्रत्यप्रमा-