भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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५२ मुद्राराक्षसम्

चर—सुणादु अज्जो। पढम दाव अज्जस्स रिपुपक्खे वद्धपक्सवादो खवणओ जीवसिद्धी। (शृणोत्वार्य। प्रथम तावदार्यस्य रिपुपक्षे वृद्धपक्षपात क्षपणको जीवसिद्धिः।)

चाणक्य—[सहर्षमात्मगतम्] अस्मद्रिपुपक्षे वृद्धपक्षपात क्षपणक !

चर—जीवसिद्धी णाम सो जेण सा अमच्चरक्खसप्पउत्ता विसकण्णा देवे पव्वदीसरे समावेसिदा। (जीवसिद्धिर्नाम स येन सा अमात्यराक्षसप्रयुक्ता विषकन्या देवे पर्वतेश्वरे समावेशिता।)

चाणक्य—[स्वगतम्] जीवसिद्धिरेष तावदस्मत्प्रणिधिः। [प्रकाशम्] भद्र, अथापरः कः?

चर—अज्ज, अवरो वि अमच्चरक्खसस्स पिअवअस्सो काअत्थो सअडदामो णाम। (आर्य, अपरोऽपि अमात्यराक्षसस्य प्रियवयस्य कायस्थ शकटदामो नाम।)

चाणक्य—[विहस्यात्मगतम्] कायस्थ इति लघ्वी मात्रा तथापि न युक्तं प्राकृतमपि रिपुमवज्ञातुम्। तस्मिन्मया सुहृच्छद्मना सिद्धार्थको विनिक्षिप्तः। [प्रकाशम्] भद्र, तृतीयं श्रोतुमिच्छामि।

चर—तिदीओ वि अमच्चरक्खसस्स दुदीअ विअ हिअअं पुप्फउरणिवासी मणिआरसेट्ठी चन्दनदासो णाम। जस्स गेहे कलत्तं ण्णासीकदुअ अमच्चरक्खसो णअरादो अवक्कन्तो। (तृतीयोऽपि अमात्यराक्षसस्य द्वितीयमिव हृदय पुष्पपुरनिवासी मणिकारश्रेष्ठी चन्दनदामो नाम। यस्य गेहे कलत्रं न्यासीकृत्य अमात्यराक्षसो नगरादपक्रान्तः।)

हिन्दी अनुवादगुप्तचर—आर्य सुनें। पहला तो आपके शत्रु-पक्ष का बहुत बड़ा पक्षपाती क्षपणक जीवसिद्धि है।

चाणक्य—[हर्ष के साथ मन में] हमारे शत्रु पक्ष का पक्षपाती क्षपणक !

गुप्तचर—जीवसिद्धि नाम का वह (व्यक्ति) है, जिसने अमात्य