भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः ५३

राक्षस द्वारा भेजी गई उस विषकन्या को महाराज पर्वतेश्वर के लिए नियुक्त किया था।

चाणक्य— [ मन में ] यह जीवसिद्धि तो हमारा गुप्तचर है। [ प्रकट ] भद्र ! और दूसरा कौन है ?

गुप्तचर—आर्य ! दूसरा भी अमात्य राक्षस का प्रिय मित्र कायस्थ शकटदास ( नामक व्यक्ति ) है।

चाणक्य— [ हँसकर मन में ] 'कायस्थ' यह छोटी मात्रा है ( अर्थात् कायस्थ की क्या हस्ती है ) । तो भी छोटे शत्रु की भी उपेक्षा करना ठीक नही है । उसके लिए तो मैने मित्र के बहाने सिद्धार्थक को नियुक्त कर रखा है। [ प्रकट ] भद्र ! तीसरे ( व्यक्ति ) को सुनना चाहता हूँ।

**गुप्तचर—**तीसरा भी अमात्य राक्षस का अभिन्नहृदय पाटलिपुत्र का रहने वाला सेठ जौहरी चन्दनदास नाम का ( व्यक्ति ) है, जिसके घर मे ( अपनी ) पत्नी को थाती रखकर अमात्य राक्षस नगर से बाहर निकला हुआ है।

**टिप्पणी—बद्धपक्षपातः—**बद्धस्नेहः । पक्षपात ( तरफदारी ) करने वाला । पक्षे पातः सुप्स्सुपा स० । बद्धः पक्षपातः अनेन इति बद्धपक्षपातः बहुव्रीहि स० । **जीवसिद्धिः—**चाणक्य का मित्र इन्दुशर्मा । यह चाणक्य का प्रयोजन सिद्ध करने के लिये नाम और वेश बदल कर राक्षस का प्रबल पक्षपाती बन गया है । यह बात निपुणक को नही मालूम है । इसीलिए यह चाणक्य से उसकी निन्दा करता है । **समावेशिता—**नियुक्त किया । सम् आ√विश् +णिच् +क्त कर्मणि । **प्रणिधिः—**गुप्तचर । प्रणिधीयन्ते अस्मिन् इति प्र-नि√धा +कि + 'कर्मण्यधिकरणे च' इत्यनेन, 'नेर्गदनद'—इत्यादिना णत्वम् । **लघ्वी मात्रा—**क्षुद्रः अंशः । छोटी मात्रा, तुच्छ बात । कायस्थ की उत्पत्ति क्षत्रिय पिता और शूद्रा माता से मानी गई है । उसका कार्य लिखना है, न कि युद्ध करना । इसी से उसकी अल्पप्राणता की ओर संकेत करते हुए चाणक्य ने उसके लिए 'लघ्वी मात्रा' शब्द का प्रयोग किया है । **सुहृच्छद्मना—**मित्रच्छलेन । **विनिक्षिप्तः—**विनियोजितः । **मणिकारश्रेष्ठी—**जौहरो, सेठ । मणीन् करोति इति मणिकारः मरिण√कृ +अण् 'कर्मण्यण्' इत्यनेन । श्रेष्ठानि श्रेष्ठवस्तूनि सन्ति अस्य इति श्रेष्ठी श्रेष्ठ +इनि । मणिकारश्चासौ श्रेष्ठी च इति मणिकारश्रेष्ठी