मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ५४ | मुद्राराक्षसम् |
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कर्मधारय स०। न्यासीकृत्य—निक्षिप्य। धरोहर रखकर। नि√अस्+घञ् कर्मणि=न्यास । अन्यासं न्यासं कृत्वा इति न्यास+च्वि√कृ, ईत्व+त्वा—ल्यप् । अपक्रान्त —भाग निकला। अप√क्रम्+क्त कर्तरि।
चाणक्य —[ आत्मगतम् ] नून सुहृत्तम । न अनात्मसदृशेषु राक्षस कलत्र न्यासीकरिष्यति। [ प्रकाशम् ] भद्र, चन्दनदासस्य गृहे राक्षसेन कलत्र न्यासीकृतमिति कथमवगम्यते ?
चर —अज्ज, इअ अङ्गु०लिमुद्दा अज्ज अवगदत्थ करिस्मदि (आर्य, इयमङ्गु०लिमुद्रा आर्यमवगतार्थं करिष्यति ।) [ इत्यर्पयति ।]
चाणक्य —[ मुद्रामवलोक्य गृहीत्वा राक्षसस्य नाम०वाचयति । सहर्षं स्वगतम् । ] ननु वक्तव्य राक्षस एवास्मदङ्गु०लिप्रणयी संवृत्त इति । [ प्रकाशम् ] भद्र, अङ्गु०लिमुद्राधिगम विस्तरेण श्रोतुमिच्छामि ।
चर —सुणादु अज्जो । अत्थि दाव अह अज्जेण पौरजणचरिदअण्णे-सणे णिउत्तो परघरप्पवेसे परस्स अणासक्कणिज्जेण इमिणा जमपडेण हिण्डन्तो मणियारसेट्ठिचन्दनदासस्स गेह पविट्ठोम्हि । तर्हि जमपड पसारिअ पडत्तोम्हि गीदाइ गाइदुं । ( शृणोत्वार्य । अस्ति तावदह-मार्येण पौरजनचरितान्वेषणे नियुक्त परगृहप्रवेशे परस्यानाशङ्कनीयेन अनेन यमपटेन आहिण्डमानो मणिकारश्रेष्ठिचन्दनदासस्य गृह प्रविष्टो-ऽस्मि । तत्र यमपट प्रसार्य प्रवृत्तोऽस्मि गीतानि गातुम् । )
चाणक्य —तत किम् ?
हिन्दी अनुवाद—चाणक्य —[ मन मे ] सचमुच परम मित्र है। (क्योकि) अपने से भिन्न जनो के पास राक्षस ( अपनी ) भार्या को नही रखेगा । [ प्रकट ] भद्र ! चन्दनदास के घर में राक्षस ने ( अपनी ) स्त्री को रखा है—यह कैसे ( तुम ) जानते हो ?
गुप्तचर—आर्य ! यह अँगूठी आपको सब कुछ बता देगी । [ अँगूठी देता है । ]
चाणक्य—[अँगूठी को देखकर, लेकर राक्षस का नाम बांचता है । हर्ष के साथ मन में ] कहना तो यह चाहिए कि राक्षस ही हमारी उँगलिया का प्रेमी