भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 488 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 157
५४मुद्राराक्षसम्

कर्मधारय स०। न्यासीकृत्य—निक्षिप्य। धरोहर रखकर। नि√अस्+घञ् कर्मणि=न्यास । अन्यासं न्यासं कृत्वा इति न्यास+च्वि√कृ, ईत्व+त्वा—ल्यप् । अपक्रान्त —भाग निकला। अप√क्रम्+क्त कर्तरि।

चाणक्य —[ आत्मगतम् ] नून सुहृत्तम । न अनात्मसदृशेषु राक्षस कलत्र न्यासीकरिष्यति। [ प्रकाशम् ] भद्र, चन्दनदासस्य गृहे राक्षसेन कलत्र न्यासीकृतमिति कथमवगम्यते ?

चर —अज्ज, इअ अङ्गु०लिमुद्दा अज्ज अवगदत्थ करिस्मदि (आर्य, इयमङ्गु०लिमुद्रा आर्यमवगतार्थं करिष्यति ।) [ इत्यर्पयति ।]

चाणक्य —[ मुद्रामवलोक्य गृहीत्वा राक्षसस्य नाम०वाचयति । सहर्षं स्वगतम् । ] ननु वक्तव्य राक्षस एवास्मदङ्गु०लिप्रणयी संवृत्त इति । [ प्रकाशम् ] भद्र, अङ्गु०लिमुद्राधिगम विस्तरेण श्रोतुमिच्छामि ।

चर —सुणादु अज्जो । अत्थि दाव अह अज्जेण पौरजणचरिदअण्णे-सणे णिउत्तो परघरप्पवेसे परस्स अणासक्कणिज्जेण इमिणा जमपडेण हिण्डन्तो मणियारसेट्ठिचन्दनदासस्स गेह पविट्ठोम्हि । तर्हि जमपड पसारिअ पडत्तोम्हि गीदाइ गाइदुं । ( शृणोत्वार्य । अस्ति तावदह-मार्येण पौरजनचरितान्वेषणे नियुक्त परगृहप्रवेशे परस्यानाशङ्कनीयेन अनेन यमपटेन आहिण्डमानो मणिकारश्रेष्ठिचन्दनदासस्य गृह प्रविष्टो-ऽस्मि । तत्र यमपट प्रसार्य प्रवृत्तोऽस्मि गीतानि गातुम् । )

चाणक्य —तत किम् ?

हिन्दी अनुवादचाणक्य —[ मन मे ] सचमुच परम मित्र है। (क्योकि) अपने से भिन्न जनो के पास राक्षस ( अपनी ) भार्या को नही रखेगा । [ प्रकट ] भद्र ! चन्दनदास के घर में राक्षस ने ( अपनी ) स्त्री को रखा है—यह कैसे ( तुम ) जानते हो ?

गुप्तचर—आर्य ! यह अँगूठी आपको सब कुछ बता देगी । [ अँगूठी देता है । ]

चाणक्य—[अँगूठी को देखकर, लेकर राक्षस का नाम बांचता है । हर्ष के साथ मन में ] कहना तो यह चाहिए कि राक्षस ही हमारी उँगलिया का प्रेमी

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक) · पृष्ठ 157, कुल 488 में से · BharatKosha