भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः ५५

हो गया (अर्थात् हमारी मुट्ठी में आ गया)। [ प्रकट ] भद्र ! अँगूठी की प्राप्ति के बारे में विस्तार से सुनना चाहता हूँ।

गुप्तचर—आर्य सुनें। नागरिकों के चरित्र का पता लगाने के लिए आपके द्वारा नियुक्त किया हुआ मैं दूसरे के घर में प्रवेश करने पर किसी के संदेह न करने योग्य इस यमपट के साथ घूमता हुआ सेठ जौहरी चन्दनदास के घर मे प्रविष्ट हुआ। वहाँ यमपट को फैलाकर गीत गाने लगा।

चाणक्य—उसके बाद क्या हुआ ?

टिप्पणीसुहृत्तमः—परम बन्धु। अतिशयेन सुहृत् इति सुहृत्तमः सुहृद् + तमप्। अनात्मसदृशेषु—आत्मसदृशाः निजानुरूपाः ये न तादृशेषु। जो अपने अनुरूप या अभिन्नहृदय न हो, ऐसे लोगों के पास। न्यासीकरिष्यति—निधास्यति। रखेगा। अवगतार्थम्—ज्ञात विषय वाला। अवगतः विदितः अर्थः विषयः प्रश्नवस्तु इति यावत् येन, तम्। वारयति—उच्चारयति। बाँचता है। √वच् + णिच् + लट् — तिप्। अस्मदङ्गुलिप्रणयी--अस्माकम् अङ्गुलयः अस्मदङ्गुलयः षष्ठीतत्०। तासु प्रणयी सुप्सुपा स०। हमारी उँगलियों का स्नेही अर्थात् हमारे हस्तगत। विस्तरेण—विस्तार से। वि√स्तृ + अप् भावे = विस्तरः, तेन। विस्तार शब्दे तु 'प्रथने वावशब्दे' इति सूत्रेण घञ् प्रत्ययः। अतएव 'वाक्यस्य विस्तरः' 'पटस्य विस्तारः' इत्यादि। अस्ति—यह एक अव्यय है। इसका अर्थ होता है—यह है कि। आर्येण—भवता। पौरजनस्य—नागरिकस्य। चरितान्वेषणे—व्यापारज्ञाने। अनाशङ्कनीयेन—सन्देहायोग्येन। आहिण्डमानः—भ्रमन्।

चरः—तदो एक्कादो अववरकादो पञ्चवरिसदेसीओ पिअदंसणी-असरीराकिदी कुमारओ 'बालत्तणसुलहकोदूहलोप्फुल्लणअणोणिक्कमिदुं पउत्तो। तदो हा णिग्गदो हा णिग्गदो त्ति संकापरिग्गहणिवेदइत्तिओ तस्स एव्व अववरकस्स अब्भन्तरे इत्थिआजणस्स उट्ठिदो महन्तो कलअलो। तदो ईसि दारदेशदाविदमुहीए एक्काए इत्थिआए सो कुमारओ णिक्कमन्तो एव्व णिब्भच्छिअ अवलम्बिदो कोमलाए बाहुलदाए। तस्साए कुमारसंरोधसंभमप्पचलिदङ्ग लिदो करादो पुरिसअङ्गुलिपरि-णाहप्पमाणघडिआ विअलिआ इअं अङ्गुलिमुद्दिआ देहलीबन्धम्मि पडिआ उट्ठिदा ताए अणवबुद्धा एव्व मम चलणपासं समागच्छिअ प्रणामणि-