मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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चन्दनदास—[ स्वगतम् ] उपलक्खिदमणेण दुट्टेण किवि। ( उप- लक्षितमनेन दुष्टेन किमपि । ) [प्रकाशम्] ज अज्जो आणवेदि त्ति। (यदार्य आज्ञापयति ।)[उपविष्ट ।]
चाणक्य—भो श्रेष्ठिन् चन्दनदास ! अपि प्रचीयन्ते संव्यवहाराणां वृद्धिलाभा ।
चन्दनदास—[स्वगतम्] अच्छादरो सकणीओ । ( अत्यादर शङ्क- नीय । [प्रकाशम्] अह इं । अज्जस्स प्पसाएण अखण्डिदा मे वणिज्जा । ( अथ किम् । आर्यस्य प्रसादेन अखण्डिता मे वणिज्या ।)
चाणक्य—न खलु चन्द्रगुप्तदोषा अतिक्रान्तपार्थिवगुणानधुना स्मा- रयन्ति प्रकृती ?
चन्दनदास—[ कर्णौ विधाय ] सन्त पावम् । सारअणिसासमुग्गएण विअ पुण्णिमाचन्देण चन्दसिरिणा अहिअ णन्दन्ति पकिदिओ । ( शान्तं पापम् । शारदनिशासमुद्गतेनेव पूर्णमाचन्द्रेण चन्द्रश्रियाधिक नन्दन्ति प्रकृतय ।)
हिन्दी अनुवाद—चन्दनदास—[प्रणाम करके] क्या आर्य नहीं जानते हैं कि अनुचित सत्कार तिरस्कार से भी बढकर हृदय में दुःख उत्पन्न करता है । इसलिये यही उपयुक्त भूमि पर बैठ जाता हूँ ।
चाणक्य—सेठ जी ! नहीं, ऐसी बात नहीं है । हम जैसे ( व्यक्तियों ) के द्वारा आपका यह ( सत्कार करना ) उचित ही है। इसलिये आसन पर ही बैठिय ।
चन्दनदास—[ मन में ] इस दुष्ट ने कुछ ताड़ लिया है । [ प्रकट ] जो आर्य की आज्ञा ।
चाणक्य—सेठ चन्दनदास जी ! ( आपका ) व्यवसाय तो बढ़ती पर है न ?
चन्दनदास—[ मन में ] बहुत आदर अनिष्टसूचक होता है। [ प्रकट ] और क्या । आपकी कृपा से मेरा व्यवसाय निर्विघ्न चल रहा है ।