भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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मुद्रारक्षसम् १००

राक्षसस्य मत्या परिगृहीत, मलयकेतु—पर्वतसूनुम्, अवलोक्य, अधिराज्यात्—अधिष्ठितो राजा अधिराज तस्य भाव आधिराज्य तस्मात्, चलित—च्युतम् इव, चन्द्रगुप्तम्, अवगच्छामि । कुत —यतो हि,

अन्वय —मौर्यनृपस्य लक्ष्मीं कौटिल्यधीरज्जुनिबद्धमूर्ति स्थिरा मन्ये, राक्षसेन उपायहस्तै निकृष्यमाणाम् इव लक्षयामि अपि ॥ २ ॥

व्याख्यामौर्यनृपस्य—चन्द्रगुप्तभूपते , लक्ष्मी—श्रिय, कौटिल्यधीरज्जुनिबद्धमूर्ति—कौटिल्यस्य चाणक्यस्य धी बुद्धि एव रज्जु दाम तया निबद्धा सयता मूर्ति यस्या तथाविधाम्, स्थिरा—निश्चला, मन्ये—तर्कयामि । (पक्षान्तरे) राक्षसेन—नन्दामात्येन, उपायहस्तै —उपाया सामदानदण्डभेदा त एव हस्ता तै , निकृष्यमाणाम्—नितरा कृष्यमाणाम् इव, लक्षयामि—सम्भावयामि अपि ॥२ ॥

हिन्दी अनुवाद— [ मन मे । सस्कृत भाषा का आश्रय लेकर ] ओह ! आश्चर्य है । चाणक्य की बुद्धि(राय) से चलने वाले चन्द्रगुप्त को देखकर राक्षस के प्रयत्न को मैं व्यर्थ-सा समझता हूँ । ( और दूसरी ओर ) राक्षस की बुद्धि का अनुसरण करने वाले मलयकेतु को देखकर चन्द्रगुप्त को राज्य से भ्रष्ट हुआ-सा समझता हूँ । क्योकि—

राजा चन्द्रगुप्त की लक्ष्मी को चाणक्य की बुद्धिरूपी रस्सी से बँधे हुए शरीर वाली और ( अतएव ) अचल मानता हूँ, किन्तु राक्षस के उपाय रूपी हाथो से मानो खींची जाती हुई भी ( उसे ) देखता हूँ ।

टिप्पणीसस्कृतमाश्रित्य—यह आहितुण्डिक नन्द के विशिष्ट कर्मचारी होने के कारण उत्तम पात्र है, अतएव सस्कृत मे स्वगत भाषण करता है । पहले प्राकृत मे इसलिए किया है कि वह कार्यवश आहितुण्डिक के वेश मे है । कहा भी है—'कार्यतश्चोत्तमादीना कार्यो भाषाव्यतिक्रम ' दशरूपक । आधिराज्यात्—साम्राज्य से । अधिको राजा अधिराज 'राजाह सखिभ्यष्टच्' इति सूत्रेण समासान्त टच्प्रत्यय । तस्य भाव आधिराज्यम् अधिराज+ष्यञ् , तस्मात् । मौर्यनृपस्य—मौर्यश्चासौ नृप कर्मधारय स०, तस्य । उपायहस्तै —उपाय—साम, दाम, दण्ड और भेद—रूपी हाथो से। 'भेदो दण्ड सामदानमित्युपायचतुष्टयम्' इत्यमर । उपाया एव हस्ता मयूरव्यसकादित्वात् स०, तै । इस श्लोक मे निरङ्गरूपक और वाच्योत्प्रेक्षा अलङ्कारो का साङ्कर्य है । इसमे वैदर्भी रीति है,