मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽङ्कः ११७
ईषत्कम्पनं, सूचयित्वा—अभिनयं कृत्वा । कथं—कुतः, प्रथमम् एव—पूर्वमेव, सर्प-दर्शनम्—सर्पस्य अहेः दर्शनम् अवलोकनम् । नः—अस्माकं, सर्पदर्शने—भुजङ्गमाव-लोकने, कुतूहलम्—कौतुकं, नास्ति—न विद्यते । तत्—तस्मात्, एनम्—आहि-तुण्डिकम्, परितोष्य—सन्तुष्टं कृत्वा, विसर्जंय—इतो गन्तुं प्रेरय । अमात्यः—राक्षसः, अदर्शनेन—अवलोकन मन्तरैव, प्रसादम्—अनुग्रहम् उपहारमिति यावत्, करोति—विदधाति ददाति इति यावत्, न पुनः दर्शनेन—सर्पक्रीडामवलोक्ये-त्यर्थः । भद्र—कल्याणयुक्त !, मम वचनेन—मत्कथनेन, अमात्यं, विज्ञापय—निवेदय, अहं, केवलं, सर्पोपजीवी—अहिखेलनवृत्तिः, न—नहि, (किन्तु) अहं, प्राकृतकविः—प्राकृतभाषाकाव्यरचयिता (अस्मि), तस्मात्—तत्, यदि, मे—मम, दर्शनेन—सर्पक्रीडावलोकनेन, अमात्यः, प्रसादं न करोति, तदा—तर्हि, एतत्, पत्रकमपि, वाचयितुं—पठितुं, प्रसीदतु—प्रसन्नो भवतु । पत्रम्—आहि-तुण्डिकदत्तं दलं, गृहीत्वा—आदाय, ˙राक्षसम्, उपसृत्य, उपेत्य आहेति शेषः । आहितुण्डिकः—व्यालग्राही, विज्ञापयति—निवेदयति— न केवलमहं……।
हिन्दी अनुवाद—राक्षस— [ बाई आँख का फड़कना सूचित करके मन में] कैसे पहले ही सांप का दर्शन हुआ [ प्रकट ] प्रियंवदक ! हमे साँप ( के खेल ) देखने की उत्कंठा नही है । इसलिए इसे सन्तुष्ट करके विदा कर दो ।
प्रियंवदक—जो आर्य की आज्ञा । [ घूमकर और सँपेरे के पास जाकर ] भद्र! ये मंत्री जी बिना ( सर्प-क्रीडा ) दिखाये तुम पर प्रसन्न है, दिखाने से नही ।
सँपेरा—भद्र ! मेरी ओर से मंत्री जी से निवेदन कर दो कि मै केवल सँपेरा (ही) नही हूँ, प्राकृत भाषा का कवि भी हूँ । इसलिए यदि मंत्री जी मुझे दर्शन से कृतार्थ नही करते है तो ( कम से कम ) यह पत्र पढ़ने की कृपा करे ।
प्रियंवदक—[ पत्र लेकर राक्षस के पास पहुँचकर ] अमात्य । यह सँपेरा निवेदन कर रहा है कि मै केवल सर्पजीवी ( सँपेरा ) नही हूँ, प्राकृत का कवि भी हूँ । इसलिये यदि अमात्य मुझे दर्शन देने की कृपा नहीं करते है तो यह पत्र ही बाँच कर अनुगृहीत करें ।
**टिप्पणी—वामाक्षिस्पन्दनम्—**बाई आँख का फड़कना । यह पुरुषों के लिये अशुभसूचक है, जब कि दाईं आँख का फड़कना शुभसूचक है । इसके विपरीत स्त्रियों के लिये बाईं आँख का फड़कना शुभ होता है और दाई का अशुभ ।