मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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हिन्दी अनुवाद—विराधगुप्त— उस मूर्ख ने आपकी दी हुई उस महान् धन-राशि को प्राप्त करके बड़े खर्च के साथ उपभोग करना आरम्भ किया। पश्चात् यह पूछे जाने पर कि तुम्हें इतना प्रचुर धन कहाँ से आया, वह जब बहुत-सी परस्पर विरोधी बातें कहने लगा तब दुष्ट चाणक्य के आदेश से विचित्र प्रकार के वध के द्वारा मरवा दिया गया।
राक्षस [उद्वेग के साथ] क्या यहाँ भी भाग्य ने हमें ही मारा ? अच्छा सोये हुए चन्द्रगुप्त के शरीर पर प्रहार करने के लिए हमारे नियुक्त किये हुए, राजा के शयन-कक्ष के भीतरी सुरंग में निवास करने वाले वीभत्सक आदि का क्या समाचार है ?
विराधगुप्त— अमात्य ! भयानक समाचार है।
राक्षस—[उद्वेग के साथ] कैसा भयानक समाचार है ? वहाँ रहने हुए वे दुष्ट चाणक्य के द्वारा ताड़ लिये तो नहीं गए ?
विराधगुप्त— और क्या ?
राक्षस— कैसे ?
टिप्पणी—हन्त— अत्र वाक्यालङ्कारे प्रयुक्तः । अतिमृष्टम्— दत्तम्। पृच्छ्यमान— जिज्ञास्यमान चाणक्येनेति शेषः । √प्रच्छ्+लट् कर्मणि + शानच् । वाक्यभेदान्— वाक्यस्य भेदान् भिन्नानि वाक्यानि इत्यर्थः । 'भावानयनं द्रव्यानयनम्' इति न्यायात् । विचित्रेण— विस्मयोत्पादकेन । विशेषेण चित्रं विचित्रं तेन । उपहता— विनाशिता । उप√हन्+क्त कर्मणि । अन्तस्सुरङ्गायाम्— अभ्यन्तरवर्तिनि ।
विराधगुप्त— प्राक् चन्द्रगुप्तप्रवेशात् प्रविष्टमात्रेणैव शयनगृहे चाणक्येन दुरात्मना समन्तादवलोकितम्। ततस्तु एकस्माद् भित्तिच्छिद्राद् गृहीतभक्तावयवा निष्क्रामन्ती पिपीलिकापङ्क्तिमवलोक्य पुरुषगर्भमेतद्गृहमिति गृहीतार्थेन दाहितं तदन्त शयनगृहम्। तस्मिंश्च दह्यमाने धूमावरुद्धदृष्टय प्रथममपिहितनिर्गमनमार्गमनधिगम्य सर्व एव वीभत्सकादयस्तत्रैव ज्वलनमुपगता उपरताश्च।
राक्षसः—[सास्रम्] सखे ! पश्य, चन्द्रगुप्तस्य दैवसम्पदा सर्व एव