मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽङ्कः १५५
[ शकटदास वैसा करता है । ]
राक्षस— [ उसका आलिंगन करके ] यहाँ इस आसन पर बैठो ।
शकटदास— अमात्य की जो आज्ञा । [ अभिनयपूर्वक बैठ जाता है । ]
राक्षस— मित्र शकटदास ! तो यह कौन इस प्रकार के मेरे हृदय के आनन्द का कारण है ?
शकटदास— [ सिद्धार्थक को लक्ष्य करके ] अमात्य ! प्रिय मित्र सिद्धार्थक वधिकों को डरा-धमका कर मुझे वध्य-भूमि से हटा लाया ।
राक्षस— [हर्ष के साथ] कल्याणभाजन सिद्धार्थक ! इस प्रिय (कार्य) के लिए यह बिलकुल अपर्याप्त है, तो भी स्वीकार करो । [ अपने शरीर से आभूषण उतारकर देता है ।]
सिद्धार्थक— [लेकर चरणो पर गिरकर मन ही मन] यह आर्य (चाणक्य) की शिक्षा है । अच्छा । वैसा करूँगा । [प्रकट] अमात्य ! यहाँ पहले-पहल आये हुए मेरा कोई परिचित नही है, जिसके पास आपके इस प्रसाद को धरोहर रखकर निश्चिन्त हो जाऊँ । इसलिए चाहता हूँ कि मैं इस मुद्रा से अंकित करके आप ही के खजाने में थाती रख दूँ । जब इसकी जरूरत पडेगी तब ले लूँगा ।
टिप्पणी— कौटिल्यगोचरगतः—कौटिल्यस्य गोचरः तं गतः चाणक्य-समीपं प्राप्त इत्यर्थः । परिष्वजस्व—आलिङ्ग । परि√स्वञ्ज्+लोट्—स्व 'उपसर्गात् सुनोति'—इति षत्वम् । विद्राव्य—संताड्य दण्डयित्वेति यावत् । वि√द्रु+णिच्+क्त्वा—ल्यप् । प्रसादम्—अनुग्रहम् । प्र√सद्+घञ् भावे = प्रसादः, तम् । निवृत्तः—सुखी । निर्√वृत्+क्त कर्तरि । भाण्डागारे—कोषगृहे ।
राक्षसः— भद्र ! भवतु, को दोषः ? शकटदास ! एवं क्रियताम् ।
शकटदासः— यदाज्ञापयतीति । [मुद्रां विलोक्य जनान्तिकम्] अमात्य ! भवन्नामाङ्कितेयं मुद्रा ।
राक्षसः— [विलोक्य सविषादं सवितर्कमात्मगतम्] सत्यं नगरात् निष्क्रामतो मम हस्ताद् ब्राह्मण्या उत्कण्ठाविनोदार्थं गृहीता, तत् कथमस्य हस्तमुपगता ? [प्रकाशम्] भद्र सिद्धार्थक ! कुतस्त्वयेयमधिगता ?