मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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सिद्धार्थक—अमच्च ! अत्थि कुसुमपुरणिवासी मणिआरसेट्ठी चन्दन- दासो णाम। तस्स गेहदुवारे भूमिए पडिदा, मए समासाहिदा। (अमात्य ! अस्ति कुसुमपुरनिवासी मणिकारश्रेष्ठी चन्दनदासो नाम। तस्य गेहद्वारे भूमौ पतिता, मया समासादिता।)
राक्षस—युज्यते।
सिद्धार्थक—अमच्च ! किं एत्थ जुज्जदि ? (अमात्य ! किमत्र युज्यते ?)
राक्षस—भद्र ! यतो महाधनानां गृहे पतितस्यैवंविधस्योपलब्धि- रिति।
शकटदास—सखे सिद्धार्थक ! अमात्यनामाङ्कितेयं मुद्रा। तदितो बहुतरेणार्थेन भवन्तममात्यस्तोषयिष्यति। तद् दीयतामेषा मुद्रा।
सिद्धार्थक—अज्ज ! एसो मे परितोसो, जं अमच्चो इमाए मुद्धाए परिग्गहप्पसादं करेदित्ति। (आर्य ! एष मे परितोषो, यदमात्योऽस्या मुद्रायाः परिग्रहप्रसादं करोतीति।) [ इति मुद्रां समर्पयति ]
हिन्दी अनुवाद—राक्षस—भद्र ! हो, इसमें क्या हानि है ? शकटदास ! ऐसा कर दो।
शकटदास—जो आज्ञा। [ मुद्रा को देखकर धीरे से कान में ] अमात्य ! इस मुद्रा पर तो आपका नाम अङ्कित है।
राक्षस—[ देखकर विषाद और सन्देह के साथ मन में ] सचमुच, नगर से बाहर निकलते हुए मेरे हाथ से ब्राह्मणी ने सान्त्वना के लिए (यह मुद्रा) ले ली थी। तो इसके हाथ में कैसे आ गई ? [प्रकट] सौम्य सिद्धार्थक ! तुम्हें यह कहाँ मिली ?
सिद्धार्थक—अमात्य ! पाटलिपुत्र में चन्दनदास नाम का सेठ जौहरी रहता है। उसके गृह-द्वार की भूमि पर गिरी-पड़ी मैंने पायी।
राक्षस—ठीक है।
सिद्धार्थक—अमात्य ! इसमें ठीक क्या है ?