मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽङ्कः १८१
कंचुकी—महाराज ! कौमुदीमहोत्सव रोक दिया गया ।
राजा—[क्रोध के साथ] ऐं, किसके द्वारा ?
कंचुकी—मैं इससे अधिक निवेदन महाराज से नही कर सकता हूँ ।
राजा—(क्या) आर्य चाणक्य ने तो देखने वालों की आँखों का (यह) अत्यन्त सुन्दर दृश्य नही लूट लिया ?
कंचुकी—महाराज ! दूसरा कौन जीवन चाहने वाला महाराज की आज्ञा का उल्लंघन करेगा ?
राजा—शोणोत्तरा ! मैं बैठना चाहता हूँ ।
प्रतीहारी—महाराज ! यह सिंहासन है, आप विराजें ।
राजा—[अभिनयपूर्वक बैठकर] आर्य वैहीनरि ! मैं आर्य चाणक्य को देखना चाहता हूँ ।
कंचुकी—महाराज की जो आज्ञा । [बाहर चला जाता है ।]
[तब अपने भवन में आसन पर विराजमान, क्रोधपूर्वक चिन्ता का अभिनय करते हुए चाणक्य का प्रवेश]
चाणक्य—[ मन में ] दुष्ट राक्षस मेरे साथ क्यों स्पर्धा कर रहा है ? क्योंकि—
टिप्पणी—विज्ञापयितुम्—बोधयितुम्, निवेदन करने के लिए । वि√ज्ञा + णिच्, पुक् + तुमुन् । प्रेक्षकाणाम्—दर्शकानाम् । चक्षुषः विषयः—नेत्रस्य विषयः दृश्यपदार्थ इत्यर्थः । अपहृतः—प्रतिषिद्धः । जीवितुकामः—जीवनाभिलाषी । जीवितुं कामः अस्य इति जीवितुकामः बहुव्रीहि स०, ‘लुम्पेदवश्यमः कृत्ये तुंकाममनसोरपि’ इति कारिकाबलात् मलोपः । अतिवर्तेत—उल्लङ्घयेत् । कोपानुविद्धाम्—कोपेन क्रोधेन अनुविद्धा सम्बद्धा क्रोधसहितामित्यर्थः, ताम् । राक्षसह्रतकः—कुत्सितः राक्षसः इति राक्षसह्रतकः ‘कुत्सितानि कुत्सनैः’ इत्यनेन समासः ।
कृतागाः कौटिल्यो भुजग इव निर्याय नगराद्
यथा नन्दान् हत्वा नृपतिमकरोन्मौर्यवृषलम् ।
तथाऽहं मौर्येन्दोः श्रियमपहरामीति कृतधीः
प्रभावं मद्बुद्धेरतिशयितुमेष व्यवसितः ॥११॥