भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 488 में से

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पृष्ठ 273

१८६ मुद्राराक्षसम्

उन्मुखदर्शनापलपने — उत् ऊर्ध्वं मुखं यस्मिन् कर्मणि तत् उन्मुखम् उद्ग्रीव यथा स्यात् तथा दर्शनानि वीक्षितानि अपलपनानि मिथ्याभाषनानि च तैः, पिण्डार्थम्—भोज्यार्थम्, आयस्यत —क्लिश्यमानस्य, (सेवकस्य) लाघवकारिणी—लघुतासम्पादिनी, सेवा—शुश्रूषा, श्ववृत्ति—कुक्कुरलीला, विदु —मन्यन्ते ॥ १४ ॥

हिन्दी अनुवाद—कञ्चुकी—[प्रवेश करके] सेवा दुःखद (वस्तु) है। क्योंकि—

राजा से डरना चाहिए, उसके बाद मंत्री से, तत्पश्चात् राजा के प्रियपात्र से, (फिर उन) इतर व्यक्तियो से, जो कृपापात्र धूर्त इस (राजा) के घर में रहते हैं। ठीक (ही है कि) विद्वानों ने दीनता के कारण ऊपर मुख करके देखने और मिथ्या भाषणों से जीविका के लिए कष्ट उठाते हुए (सेवक) की तुच्छ बनाने वाली सेवा को कुत्ते की वृत्ति माना है ॥ १४ ॥

टिप्पणीकष्टम्—अत्र सामान्ये नपुंसकम्। उन्मुखदर्शनापलपनै — अप √ लप् + ल्युट् भावे = अपलपनम् = मिथ्या भाषण, झूठमूठ की प्रशंसा। कुत्ते के पक्ष में—पीटे जाने के भय से शरीर को सिकोडना। श्ववृत्तिम्—शुनो वृत्तिमिव वृत्तिम्। जैसे कुत्ता उदरपूर्ति के लिए स्वामी को देखकर ऊपर को मुंह उठाता है, भूकता है और पिटाई के डर से देह को सिकोडता है, उसी तरह सेवक भी राजा और उनके कृपापात्रवर्ग के साथ बरतता हुआ कालयापन करता है। इसीलिए अन्यत्र भी कहा गया है—'सेवा श्ववृत्तिराख्याता'। इस श्लोक में कंचुकी का निर्वेद दिखाया गया है और उसे निर्वेद इसलिए हुआ है कि वह चाणक्य और चन्द्रगुप्त के कपटवैमनस्य को यथार्थ समझ रहा है। इस पद्य में काव्यलिंग अलंकार है, वैदर्भी रीति है, प्रसाद गुण है और शार्दूलविक्रीडित छंद है। उस छंद का लक्षण १, १२ में देखिए ॥ १४ ॥

[परिक्रम्यावलोक्य च] इदमार्यचाणक्यस्य गृहं, यावत् प्रविशामि। [नाट्येन प्रविश्यावलोक्य च] अहो ! राजाधिराजमन्त्रिणो गृहभूतिः! कुतः ?—

उपलशकलमेतद् भेदकं गोमयानां
वटुभिरुपहृतानां बर्हिषां स्तोम एष

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