मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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सिंहासन राज-धर्म की अवहेलना करने वाले नन्दो से रहित, राजाओ मे श्रेष्ठ मौर्य से सुशोभित तथा अपने अनुरूप राजा मे युक्त (हो गया है)—ये (तीनो) गुण (अभ्युदय) मेरे अतिशय आनन्द को उत्पन्न कर रहे हैं ॥ १८ ॥
टिप्पणी—विद्वेषपक्षपात —द्वेष के विषय मे पक्षपात या आसक्ति । पक्षे पात पक्षपात आसक्तिविशेष इत्यर्थ । विद्वेषे पक्षपात विद्वेषपक्षपात । उभयत्र सुप्सुपा स० । सिंहासनम्—अत्र ‘अधिशीङ्स्थासा कर्म’ इत्यनेन कर्म-सञ्ज्ञा—द्वितीया । अनपेक्षितराजवृत्ते —राजा के धर्म या कर्त्तव्य का पालन न करने वाले । राजा का वृत्त या धर्म चार प्रकार का बताया गया है — ‘न्यायेनार्जनमर्थाना रक्षण पालन तथा । सत्पात्रे विनियोगश्च राजवृत्त चतुर्विधम् ।।' 'अनपेक्षितराजराजे' इस पाठान्तर की व्याख्या होगी—'अना-दृतकुबेरे । नन्द महाधनाढ्य था इसलिए वह अपने सामने कुबेर को भी तुच्छ समझता था । किन्तु इससे अच्छा पाठ 'अनपेक्षितराजवृत्ते ' यही है । वृपेण—श्रेष्ठ । 'शुक्ने मूषिके श्रेष्ठे सुवृते वृषभे वृप' इत्यमर । सदृशपा-र्थिवसङ्गतञ्च—योग्य या अनुरूप राजा से युक्त । समान (स) √दृश् + कन् कर्तरि = सदृश । पृथिव्या ईश्वर इति पृथिवी + अञ् = पार्थिव । इस पद्य मे सम नामक अलकार है, वैदर्भी रीति है, प्रसाद गुण है और वसन्ततिलका छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, ८ मे देखिए ॥ १८ ॥
[उपसृत्य] विजयता नृपल ।
[ सिंहासनादुत्थाय चाणक्यस्य पादौ गृहीत्वा ] आर्य ! चन्द्रगुप्त प्रणमति ।
चाणक्य —[पाणौ गृहीत्वा] उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वत्स !—
आ शैलेन्द्राच्छिलान्त स्खलितसुरनदीशीकरासारशीता- तीरान्तान्नैकरागस्फुरितमणिरुचो दक्षिणस्यार्णवस्य । आगत्यागत्य भीतिप्रणतनृपशतै शश्वदेव क्रियन्ता चूडारत्नांशुगर्भस्तव चरणयुगस्याङ्गुलीरन्ध्रभागा ॥ १९ ॥
अन्वय —शिलात स्खलितसुरनदीशीकरासारशीतात् शैलेन्द्रात् , आ,