मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २०४ | मुद्राराक्षसम् |
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राजा— आर्येणैव सर्वतो निरुद्धचेष्टाप्रसरस्य मम बन्धनमिव राज्यं न राज्यमिव ।
चाणक्य— वृषल ! स्वयमनभियुक्तानां राज्ञामेते दोषा भवन्ति । तद्यदि न सहसे, तदा स्वयमेवाभियुज्यताम् ।
राजा— एते वयं स्वकर्मण्यभियुज्यामहे।
चाणक्य— प्रियं न , वयमपि स्वकर्मण्यभियुज्यामहे ।
हिन्दी अनुवाद—चाणक्य— [ सुनकर मन में ] पहला तो देवविशेषो की स्तुति रूप में प्रस्तुत शरद् ऋतु के गुणों को प्रकट करने वाला आशीर्वाद है । यह दूसरा क्या है, यह निश्चय नही कर पा रहा हूँ । [सोचकर] अच्छा, समझ गया । यह राक्षस का प्रयोग है । ओह दुष्ट पाजी गद्दन ! देखे जा रहे हो । चाणक्य जाग रहा है ।
राजा— आर्य वैहीनरि ! इन दोनो वैतालिकों को एक-एक लाख सुवर्ण-मुद्रायें दिला दो ।
कञ्चुकी— महाराज की जैसी आज्ञा । [उठकर घूमता है ।]
चाणक्य— [क्रोध के साथ] वैहीनरि ! ठहरो ठहरो, मत जाओ । वृषल ! क्यो अनुपयुक्त स्थान पर ही महान् धन का त्याग कर रहे हो ?
राजा— इस प्रकार आर्य के द्वारा सब तरह से रोकी गई गतिविधि वाले मेरे लिए तो राज्य बन्धन के समान है, न कि राज के समान ।
चाणक्य— वृषल ! स्वयम् स्वतन्त्रता से राज-कार्य न करने वाले राजाओं के ये दोष होते हैं (कि वे गुरुजनो की आज्ञा का सहन नही करते) । इसलिए यदि तुम्हें सहन नही होता है तो स्वयं राज-काज देखो ।
राजा— ये हम अपने कार्य को स्वतन्त्र रूप से करेंगे ।
चाणक्य— हमारे लिए अच्छा है । हम भी अपने कार्य में लग जाते हैं ।
टिप्पणी—प्रथमम्— पहले वैतालिक का पठन । विशिष्टदेवतास्तुति-रूपेण— विशिष्ट देवता (शिव और विष्णु) की स्तुति रूप से । विशिष्टा देवता कर्मधारय स०, तस्याः स्तुतिः , तस्याः रूपम् षष्ठीतत्०, तेन करणे तृतीया । प्रवृत्तशरद्गुणप्रख्यापनम्— उपस्थित शरद् ऋतु के गुणों का कीर्तन । प्रवृत्ता