मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ मुद्राराक्षसम्
क्षोभितम् आन्दोलितम् अन्तर्जल गभीरतलवर्ति सलिल येषा तादृशाना, चतुर्णाम्, अम्भोधीना—सागराणा पारेभ्य या—तीरपर्यन्त यो भूभाग तत्र, या, तव—ते, आज्ञा—आदेश, सपुष्पा—पुष्पयुक्ता, माला इव—स्रगिव, नृपतिशतै—राजसमूहै, शिरोभि—उत्तमाङ्गै, उह्यते—धायते, सा—आज्ञा, मयि एव—चाणक्य एव, स्खलन्ती—व्याहता (गता), त, प्रभुत्व—स्वामित्व विनयाऽलङ्कृत—विनयेन शीलेन अलङ्कृत भूषित, प्रथयति—ख्यापयति ॥२४॥
हिन्दी अनुवाद—राजा—यदि ऐसा है तो कौमुदीमहोत्सव को रोकने का प्रयोजन सुनना चाहता हूँ ।
चाणक्य—वृषल ! कौमुदीमहोत्सव मनाने का क्या प्रयोजन है, यह मैं भी सुनना चाहता हूँ ।
राजा—पहले तो (न मानने से) मेरी आज्ञा का उल्लङ्घन होता है ।
चाणक्य—मेरा भी तो तुम्हारी आज्ञा का उल्लङ्घन करना ही कौमुदी-महोत्सव को रोकने का पहला प्रयोजन है । क्योंकि—
तमाल वृक्षों के नवीन पल्लवों से काले बने हुए तटवर्ती वनों वाले और चंचल महामत्स्यों के समूह से क्षुब्ध भीतरी जल वाले चारों समुद्रों के तीर-पर्यन्त भू-भाग पर जो तुम्हारी आज्ञा फूलों की माला के समान सैकड़ों राजाओं के द्वारा सिर से लगायी जाती है, वह मुझमें ही स्खलित होती हुई (अर्थात् मेरे ही आगे भग्न होती हुई) तुम्हारे प्रभुत्व को विनय से विभूषित बताती है ॥२४॥
टिप्पणी—आज्ञाव्याघात—आज्ञा का उल्लङ्घन । 'आज्ञाऽव्याघात' इस पाठ में 'आज्ञा का उल्लङ्घन न होना' अर्थ करना चाहिए । वि-आ√हन्+घञ् भावे=व्याघात । न व्याघात अव्याघात । आज्ञाया अव्याघात पक्षे आज्ञाया व्याघात । तमालप्रभव०—प्रभवति अस्मात् इति प्र√भू+अप् अपादाने= प्रभव । तमाल प्रभव एषाम् इति तमालप्रभवाणि तादृशानि किसलयानि (आगे दे० व्याख्या) । तिमि—बहुत बड़े आकार का एक समुद्री मत्स्य । इसके सम्बन्ध में कहा गया है—'अस्ति मत्स्य तिमिर्नाम शतयोजनविस्तृत । तिमिङ्गिलगिलो-ऽप्यस्ति तद्गिलोऽप्यस्ति राघव ।।' अन्तर्जलम्—अन्त स्थित जलम् मध्यमपदलोपी स० अथवा जलस्य अन्त षष्ठीतत्० । 'राजदन्तादिषु परम्' इत्यनेन जलस्य पर-