मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ मुद्राराक्षसम्
हिन्दी अनुवाद—चाणक्य—[ हँसकर ] वृषल ! राक्षस ने यह किया ?
राजा— और क्या ? यह अमात्य राक्षस ने किया ।
चाणक्य— वृषल ! मैंने पुन समझा कि नन्द के समान तुम्हे उखाड़कर पृथ्वी पर तुम्हारी तरह मलयकेतु को (उसने) सिंहासन पर बैठा दिया ।
राजा— उलाहना देना व्यर्थ है । आर्य ! भाग्य ने यह किया । इसमें आपका क्या है ?
चाणक्य— हे डाह रखने वाले !
दूसरे किसने लोगो के सामने उत्पन्न क्रोध के आवेश से टेढ़ी अगुलियो के अग्रभाग से खोली गई शिखा वाली, भयकर तथा सम्पूर्ण शत्रु-कुल के विनाश करने के कारण लम्बी प्रतिज्ञा को करके अभिमानी तथा निन्यानवे सौ करोड़ मुद्राओ के स्वामी नन्दो को क्रमश बलि-पशु के समान राक्षस के देखते मार दिया ॥ २७ ॥
टिप्पणी—उद्धृत्य— उन्मूल्य । अधिराज्यम्— राज्ये इति अधिराज्यम् अव्ययीभाव स०, 'अव्ययीभावश्च' इत्यनेन नपुसकत्वम् । आरोपित — स्थापितः । मत्सरिन् !— मत्सर = डाह । 'मत्सरोऽन्यशुभद्वेषे' इत्यमर । स अस्ति अस्य इति मत्सर + इनि । विषमिता — विषमाः कृताः इति विषमा + णिच् + क्त कर्मणि । नवनवतिशतद्रव्यकोटीश्वरा — नवाधिका नवति नवनवति शाकपार्थिवादित्वात् स० । तत्सङ्ख्यानि शतानि शाकपा० । द्रव्याणां कोट्य द्रव्यकोट्य । नवनवतिशतसङ्ख्याका द्रव्यकोट्यः शाकपा० । तासाम् ईश्वरा । पर्यायभूता — परि √अय् + घञ् भावे = पर्याय । पर्यायिण भूता. तृतीयातत्० वा सुप्पुपा स० । राक्षसस्य — अत्र 'षष्ठी चानादरे' इति षष्ठी । इस श्लोक मे अर्थापत्ति और उपमा अलकार हैं । इसमें ओज गुण है, गौडी रीति है और स्रग्धरा छन्द है । स्रग्धरा का लक्षण १, १ में देखिए ॥ २७ ॥
अपि च,
गृध्रैरावद्धचक्रं वियति विचलितैर्दीर्घनिष्क्रम्पपक्षै- र्धूमैर्ध्वस्तार्कभासा सघनमित्र दिशा मण्डल दर्शयन्तः।