भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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२२६ मुद्राराक्षसम्

नयनकान्त्या, भ्रूभङ्गोद्भेदधूम—भ्रूभङ्गस्य भ्रूकुटे य उद्भेद आविर्भाव स एव धूमो यत्र तत् यथा स्यात् तथा, पुर—अग्रे, ज्वलितमिव—प्रदीप्तमिव। मन्ये—शङ्के, ताण्डवे—उद्धतनृत्ये, रौद्र रसम्—क्रोधात्मकरसम्, अभिनयत— (अभिनीय) दर्शयत, रुद्रस्य—शिवस्य, संस्मरन्त्या—सम्यक् स्मृतिम् अनुभवन्त्या, धरया—पृथिव्या, पादघात—चरणप्रहार, कथमपि—केनापि प्रकारेण, सञ्जातोद्ग्रकम्प—सञ्जात समुत्पन्न उद्ग्र विशेष कम्प यस्मिन् कर्मणि तत् यथा स्यात् तथा, धारित व्यवस्थापित ॥ ३० ॥

हिन्दी अनुवादराजा [ सावेग के साथ मन में ] तब क्या सचमुच ही आर्य कुपित हो गए ? क्योंकि—

क्रोध में कम्पायमान पलकों से भरत हुए स्वच्छ जल न धोने के कारण क्षीण होने पर भी लाल नेत्रकिरणों से तनी हुई भुकुटिरूपी धुआ मानो सामने प्रदीप्त हुआ है। मैं समझता हूँ कि ताण्डव नृत्य के समय रौद्र रस का अभिनय करते हुए शङ्कर का स्मरण करती हुई पृथ्वी ने ( आर्य चाणक्य का ) पाद-प्रहार उत्पन्न विशेष कम्पन के साथ बड़ी कठिनाई से सहन किया है ॥ ३० ॥

टिप्पणीस्पन्दि—स्पन्दते इति $\sqrt{}$स्पन्द् + णिनि साधुकारिणि कर्तरि। भ्रूभङ्गोद्भेद = उद्गत भ्रूभङ्ग, 'भावायनन द्रव्यायतनम्'। पुर—आंखों के सामने। धुआ आग से ऊपर रहता है। यहाँ भी भृकुटी रूपी धुआ नेत्राग्नि से ऊपर है। रुद्रस्य—अत्र 'अधीगर्थदयेशां कर्मणि' इत्यनेन षष्ठी। उदग्र—उद्गतमग्रमस्य इति उदग्र। इस श्लोक में रूपक और उत्प्रेक्षा अलंकारों में सांकर्य होने से सङ्कर अलंकार है। इसमें पाञ्चाली रीति है, ओज गुण है और स्रग्धरा छन्द है। इसका लक्षण १, १ में देखिए ॥३०॥

चाणक्य — [ कृतक कोप सहृत्य ] वृषल ! वृषल ! अलमुत्तरोत्तरेण । यद्यस्मत्तो वरीयान् राक्षसोऽवगम्यते, तस्मादिदं शस्त्रं तस्मै दीयतामिति । [शस्त्रमुत्सृज्य उत्थाय च आकाशे लक्ष्यं बद्ध्वा स्वगतम्] राक्षस ! राक्षस ! एष भवत कौटिल्यबुद्धिविजिगीषोर्बुद्धे प्रकर्ष ।

चाणक्यत स्खलितभक्तिमहं सुखेन जेप्यामि मौर्यमिति सम्प्रति यः प्रयुक्तः ।