मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः २४१
हिन्दी अनुवाद—[ आकाश में ] आर्यगण ? क्या कह रहे हो, किस कारण ( लोगों को ) हटाया जा रहा है ? आर्यवृन्द ! ये कुमार मलयकेतु उत्पन्न शिरोवेदना वाले अमात्य राक्षस को देखने के लिए यही आ रहे हैं। इस कारण हटाया जा रहा है।
[ पुरुष निकल जाता है। ]
[ तब भागुरायण और कंचुकी से अनुसरण किया जाता हुआ मलयकेतु प्रवेश करता है। ]
मलयकेतु—[ साँस खींचकर मन में ] पिताजी को मरे आज दसवाँ महीना है। व्यर्थ में पुरुषत्व को ढोते हुए हमने उनके उद्देश्य से जलांजलि भी अर्पित नहीं की। अथवा पहले यह प्रतिज्ञा की थी—
माताओं के शोक से उत्पन्न छाती पीटने के कारण टूटे हुए रत्न-कंकणों वाली, गिरे हुए उत्तरीय वस्त्र वाली, धरती की धूलों से रूखे बालों वाली और हाय-हाय इस प्रकार उच्चारण किये गये दीनस्वर के कारण हृदयविदारक—ऐसी भिन्न दशा ( अर्थात् दुर्दशा ) को वैरियों की स्त्रियो ( के भाग्य ) में ( बदल ) करके मुझे पिता का श्राद्ध-तर्पण करना है ॥५॥
**टिप्पणी—अपसारणा—**हटाना। अप√सृ + णिच् + युच्—अन, टाप्। **समुत्पन्नशीर्षवेदनम्—**समुत्पन्ना सञ्जाता शीर्षे शिरसि वेदना पीड़ा यस्य सः समुत्पन्नशीर्षवेदनः त्रिपदव्यधिकरणबहुव्रीहि स०, तम्। **उपरतस्य—**मृतस्य। **तातस्य—**अत्र शेषे षष्ठी। तातस्य सम्बन्धे इत्यर्थः। **दशमः—**दशानां पूरणः इति दशन्+डट्, तस्य मडागमः। तोयाञ्जलिः तोयस्य अञ्जलिः अञ्जलिमितं जलमित्यर्थः। **आवजितः—**दत्तः। आ√वृज् + णिच् + क्त कर्मणि। **अलक—**सिर के बाल, केशपाश। **तादृक्—**तद्√दृश् + क्विन् कर्त्तरि। **अवस्थान्तरम्—**अन्या अवस्था अवस्थान्तरम् मयूरव्यंसकादित्वात् नित्यसमासः। **निवापाञ्जलिः—**श्राद्धतर्पणमित्यर्थः। इस श्लोक में असम्भवद्वस्तुसम्बन्धरूप निदर्शना अलंकार है। इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥५॥
तत् किमिह बहुना ?
उद्यच्छता धुरमकापुरुषानुरूपां।
गन्तव्यमाजिनिधनेन पितुः पथा वा।
मु० रा०—१६