भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 488 में से

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पृष्ठ 330

चतुर्थोऽङ्कः २४५

मलयकेतुः—सखे भागुरायण ! नन्वस्माकममात्यराक्षसः प्रियतमो हिततमश्च ।

हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु—आर्य जाजलि ! तुम भी परिजनों के साथ लौट जाओ । अकेला भागुरायण मेरे पीछे-पीछे आवे ।

कंचुकी—कुमार की जो आज्ञा ।

[ अनुचरों के साथ चला जाता है । ]

मलयकेतु—मित्र भागुरायण ! यहाँ आये हुए भद्रभट आदियो ने मुझसे कहा कि हम लोग अमात्य राक्षस के द्वारा आश्रय के योग्य कुमार का आश्रय नही ले रहे हैं, किन्तु कुमार के सेनापति शिखरसेन ( की बातों ) को स्वीकार करके दुष्ट अमात्य चाणक्य के वशीभूत चन्द्रगुप्त से विरक्त होकर उत्तम गुणों से विभूषित होने के कारण कुमार का आश्रय ले रहे है । सो मैने चिरकाल तक सोचने पर भी उनके वाक्य का तात्पर्य नही समझा ।

भागुरायण—कुमार ! यह तात्पर्य दुर्बोध नहीं है । देखिए, जीतने के इच्छुक, आत्मा के गुणों ( पराक्रम, उत्साह आदि ) से सम्पन्न और आश्रय के योग्य का आश्रय प्रिय एवं हितचिन्तक व्यक्ति के द्वारा ग्रहण करना चाहिए ।

मलयकेतु—मित्र भागुरायण ! आमात्य राक्षस तो हमारे अत्यन्त प्रिय एवम् अत्यन्त हितचिन्तक हैं ।

टिप्पणीविज्ञापितः—निवेदितः । आमात्यराक्षसद्वारेण—अमात्य-राक्षस एव द्वारम्, तेन, करणे तृतीया । आश्रयणीयम्—सेवनीयम् । आश्रया-महे—सेवामहे । ऊरीकृत्य—स्वीकृत्य । ऊरी √कृ + क्त्वा—ल्यप्, 'ऊर्यादि-च्चिडाचश्च' इत्यनेन गतिसंज्ञा, 'कुगतिप्रादयः' इत्यनेन गतिसमासः । आभि-रामिकगुणयोगात्—प्रशस्तगुणभूषितत्वात् । अभि समन्तात् रमयति इति अभि √रम् + णिच् + अच् कर्तरि = अभिरामम् । तत् शीलमस्य इति अभिराम + ठक्—इक = आभिरामिकम् । तस्य गुणाः । तैः योगः, तस्मात् । हेतौ पञ्चमी । विजिगीषुम्—विजयाभिलाषिणम् । विजेतुम् इच्छुः विजिगीषुः वि√जि + सन्, द्वित्वादि + उ, तम् । प्रियहितद्वारेण—प्रियश्चासौ हितः प्रियहितः । स एव द्वारम् उपायः, तेन ।

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