भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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२५६ | मुद्राराक्षसम्

मलयकेतु—मित्र भागुरायण ! 'अब चन्द्रगुप्त मेरे हाथ में आ जाएगा' ऐसा कहते हुए इसका क्या तात्पर्य है ?

भागुरायण—और क्या ? चाणक्य से अलग हुए चन्द्रगुप्त के उन्मूलन से किसी प्रयोजन को ( यह ) अवश्य नहीं देखता है ।

राक्षस—भद्र ! अधिकार से वंचित वह वटुक ( चाणक्य ) इस समय कहाँ है ?

करभक—उसी पाटलिपुत्र में रह रहा है ।

राक्षस—[आवेग के साथ] भद्र ! वही रह रहा है ? तपोवन नहीं गया ? या फिर प्रतिज्ञा नहीं की ?

करभक—अमात्य ! तपोवन जाएगा, ऐसा सुना जाता है ।

राक्षस—[ आवेग के साथ ] शकटदास ! यह युक्तिसंगत नहीं है । देखो—

टिप्पणी—हस्तलगत —करतलप्राप्त । हस्तस्य तलम् षष्ठीतत्० । तत्र गतं द्वितीयातत्० । अपकृष्टस्य—दूरीभूतस्य । उद्धरणात्—समुच्छेदात् । किञ्चित् कार्यम्—कामपि स्वार्थसिद्धि । न पश्यति—न उत्प्रेक्षते । हृताधिकार —हृत दूरीकृत अधिकारः नियोग यस्य स हृताधिकार बहुव्रीहि स० ।

देवस्य येन पृथिवीतलवासवस्य
स्वाग्रासनापनयजा निकृतिर्न सोढा ।
सोऽयं स्वयङ्कृतनराधिपतेर्मनस्वी
मौर्यात्कथ नु परिभूतिमिमा सहेत ? ॥ ११ ॥

अन्वय—येन पृथिवीतलवासवस्य देवस्य स्वाग्रासनापनयजा निकृति न सोढा, स अयं मनस्वी स्वयङ्कृतनराधिपते मौर्यात् इमां परिभूतिं कथं नु सहेत ? ॥११॥

व्याख्या—येन—चाणक्येन, पृथिवीतलवासवस्य—पृथिव्या तले महीपृष्ठे वासव इन्द्र इव तस्य, देवस्य—नन्दस्य, स्वाग्रासनापनयजा—स्वस्य आत्मनः यत् अग्रासनं श्रेष्ठासन तस्मात् य अपनय निष्कासन तस्मात् जाता उत्पन्ना,

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