भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 355, कुल 488 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 355

२७२ मुद्राराक्षसम्

अवि अ—( अपि च — )

अत्याहिमुहे सूले, उदिदे सउण्णमण्डले चन्दे । गमणं बुहस्स लग्गे, उदिदत्यमिदे अ केदुम्मि ॥१९॥ (अस्ताभिमुखे शूरे, उदिते सम्पूर्णमण्डले चन्द्रे । गमनं बुधस्य लग्ने, उदितास्तमिते च केतौ ॥१९॥)

अन्वय —शूरे अस्ताभिमुखे सम्पूर्णमण्डले चन्द्रे उदिते केतौ च उदितास्तमिते बुधस्य लग्ने गमनम् ॥१९॥

व्याख्याशूरे—सूर्ये, अस्ताभिमुखे—अस्ताचलं गच्छति, सम्पूर्णमण्डले—परिपूर्णबिम्बे, चन्द्रे—चन्द्रमसि, उदिते—आविर्भूते, केतौ च—राहुपुच्छे अपि, उदितास्तमिते—उदितात् लग्नात् अस्तमिते सप्तमस्थानवर्तिनि सति अर्थात् आविर्भूयैव तिरोभूते सति, बुधस्य लग्ने—बुधस्वामिके राशौ कन्यालग्न इत्यर्थः, गमनं—यात्रा प्रशस्तमिति शेषः। पक्षान्तरेशूरे—बलवति राक्षसे इत्यर्थः, अस्ताभिमुखे—विनाशोन्मुखे, सम्पूर्णमण्डले—राजमण्डलाधिरूढे सुप्रतिष्ठिते इत्यर्थे, चन्द्रे—चन्द्रगुप्ते, उदिते—उत्थित सति, केतौ च—मलयकेतौ अपि, उदितास्तमिते—उत्थाय एव पतिते, बुधस्य—चाणक्यस्य, लग्ने—सम्बन्धे, गमनम् प्रशस्तमिति शेषः ॥१९॥

हिन्दी अनुवाद—[ समीप जाकर ] उपासक ! धर्म का लाभ हो !

राक्षस—भदन्त ! हमारे प्रयाण योग्य दिन बताइए ।

क्षपणक—[ अभिनय के साथ सोचकर ] उपासक ! मुहूर्त तो ठीक बैठ गया । मध्याह्न काल से लेकर सम्पूर्ण चन्द्रवाली पूर्णिमा तिथि विष्टिभद्रा से रहित सुन्दर तिथि है, और उत्तर की ओर से दक्षिण प्रस्थान करते हुए आपका नक्षत्र ( भी ) दक्षिणवर्ती है ( जो और भी सुन्दर है ) ।

और भी—सूर्य के अस्ताचल पर जाने पर, सम्पूर्ण मण्डल वाले चन्द्रमा के उदित होने पर और केतु के उदित होकर अस्त हो जाने पर, बुध के लग्न में प्रस्थान करना उत्तम है। पक्षान्तर में—बलवान् ( राक्षस ) के विनाशोन्मुख होने पर, सम्पूर्ण राष्ट्र वाले चन्द्रगुप्त के उत्थान होने पर और मलयकेतु के