भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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पृष्ठ 354

चतुर्थोऽङ्कः ३७१

प्रियंवदक—अमात्य की जो आज्ञा । [ बाहर जाकर क्षपणक को देखकर पुनः प्रवेश करके ] अमात्य ! ये ज्योतिषी क्षपणक हैं ।

राक्षस—[ मन में अशकुन को सूचित करके ] कैसे पहले ही क्षपणक का दर्शन हुआ ?

प्रियंवदक—जीवसिद्धि ।

राक्षस—[ प्रकट ] निन्दित वेष से रहित करके भीतर ले आओ ।

प्रियंवदक—अमात्य की जो आज्ञा ।

[ बाहर चला जाता है । ]

[ तब क्षपणक प्रवेश करता है । ]

क्षपणक

मोह रूपी रोग के चिकित्सक जैन संन्यासियों के उपदेश को ग्रहण करो, जो मात्र पहले कटु और पश्चात् हितकारी उपदेश करते हैं ॥ १८ ॥

टिप्पणीसांवत्सरिकाणाम्—दैवज्ञानाम् । (टिप्पणी २, १५ के बाद के गद्य में देखिए ।) क्षपणकः—बौद्ध संन्यासी या जैन संन्यासी । अनिमित्तम्—न निमित्तम् विरोधार्थे नञ्तत् ० । अर्हताम्—जैन या बौद्ध संन्यासियो का । अर्ह् + शतृ कर्तरि = अर्हन्तः, तेषाम् । प्रथममात्रकटुकम्—प्रथमम् एव इति प्रथममात्रम्, प्रथममात्रं कटुकम् इति प्रथममात्रकटुकम् । इस पद्य में अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार रूपक अलंकार से संकीर्ण है । इसमें आर्या छंद है । आर्या छन्द का लक्षण १, ८ में देखिए ॥१८॥

[ उपसृत्य ] धम्मलाहो साबका ! भोदु । ( धर्मलाभ उपासक ! भवतु । )

राक्षसः—भेदन्त ! निरूप्यतां तावदस्मत्प्रस्थानयोग्यदिवसः ।

क्षपणकः—[ नाट्येन चिन्तयित्वा ] साबका ! णिलूविदे मुहुत्ते । आ मज्झणादो णिव्वुत्तसत्तसकला सोहणा तिही संपुणचन्दा पुण्णमासी तुह्माणं उत्तलाए दिसाए दक्खिणं दिसं पत्थिदाणं दक्खिणदुवारिओ णक्खत्तओ । (उपासक ! निरूपितो मुहूर्तः । आ मध्याह्नात् निवृत्त-सप्तशकला शोभना तिथिः सम्पूर्णचन्द्रा पौर्णमासी, युष्माकमुत्तरस्या दिशो दक्षिणां दिशं प्रस्थितानां दक्षिणद्वारिकं नक्षत्रम् ।)