मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः २७७
राक्षस— [ आसन से उठकर और देखकर ] अरे ! भगवान् सूर्य तो अस्त होने के इच्छुक हैं। इस समय—
क्षण भर के लिए उत्पन्न प्रीति वाले ये उद्यान के वृक्ष उदयाचल से उदित होते हुए सूर्य के आगे पत्रों की छाया रूप से शीघ्र ही दूर तक जाकर फिर पश्चिम दिशा की सीमा पर टिके हुए मंडल वाले उस ( सूर्य ) के होने पर लौट आये हैं; ( क्योंकि ) प्रायः सेवा करते हुए भृत्यगण क्षीण ऐश्वर्य वाले स्वामी को त्याग देते हैं ॥२२॥
[ सभी ( पात्र ) चले जाते है । ]
॥ चौथा अंक समाप्त ॥
**टिप्पणी—**संवाद्यताम्—विचार या परामर्श कर लीजिए । सम्√वद्+णिच्+लोट्—ताम् भावे । कृतान्त—यम या सिद्धान्त 'कृतान्तौ यमसिद्धान्तौ' इत्यमरः । येन आत्मनः पक्षम् ………इसका गूढार्थ यह है कि जिस लिए तुम अपने पक्ष—नन्दवंशोत्पन्न मौर्य को छोड़कर परपक्ष—मलयकेतु को आत्मीय समझ रहे हो, इसलिए भगवान् यम कुपित है । अस्ताभिलाषी—अस्तम् अभिलषितुं शीलमस्य इति अस्त-अभि√लष्+णिनि कर्तरि ताच्छील्ये । उज्जहानस्य—उद्√हा ( गतौ )+शानच् कर्तरि । पत्रच्छायैः—पत्राणां छाया पत्रच्छायम् 'विभाषा सेनासुराच्छायाशालानिशाम्' इत्यनेन नपुंसकत्वम् । पत्रच्छायञ्च पत्रच्छायञ्च पत्रच्छायञ्च इति पत्रच्छायानि एकशेष, तैः । इस श्लोक में प्रतीयमाना उत्प्रेक्षा अलंकार से उत्थापित अर्थान्तरन्यास अलंकार है और स्रग्धरा छंद है । स्रग्धरा का लक्षण १, १ मे देखिए ॥२२॥
पञ्चमोऽङ्कः
[ ततः प्रविशति लेखमलङ्करणस्थगिकाञ्च मुद्रितामादाय सिद्धार्थकः ]
**सिद्धार्थकः—**हो हीमाणहे ! हीमाणहे !! ( आश्चर्यम् ! आश्चर्यम् !!
बुद्धिजलणिज्झरेहिं सिञ्चन्ती देशकालकलसेहिं ।
दंसइस्सदि कज्जफलं गुरुअं चाणक्कणीदिलदा ॥१॥