मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः २८६
अज्जं पेक्खिदुमिच्छदि । ( आर्य ! एष खलु क्षपणको मुद्रानिमित्तमार्यं प्रेक्षितुमिच्छति । )
**भागुरायणः—**प्रवेशय ।
**भासुरकः—**जं अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । )
[ इति निष्क्रान्तः । ]
क्षपणकः—[ प्रविश्य ] साबकाणं धम्मविद्धी होदु । ( उपासकानां धर्मवृद्धिर्भवतु । )
भागुरायणः—[ नाट्येनावलोक्य स्वगतम् ] अये ! राक्षसस्य मित्रं जीवसिद्धिः । [ प्रकाशम् ] भदन्त ! न खलु राक्षसस्य प्रयोजनमेव किञ्चिदुद्दिश्य गम्यते ?
हिन्दी अनुवाद—[ प्रकट ] विजये ! भागुरायण कहाँ है ?
**प्रतीहारी—**कुमार ! ये शिविर से बाहर जाने की इच्छा करने वालों को मुद्रा दे रहे हैं ।
**मलयकेतु—**विजये ! क्षण भर के लिए पैरों की गति को रोक दो, जबतक कि मैं दूसरी ओर मुंह किये हुए ही इसकी आंखो को ( अपने ) हाथों से बंद कर दूं ।
**प्रतीहारी—**जो कुमार की आज्ञा ।
भासुरक—[ प्रवेश करके ] आर्य ! ये क्षपणक मुद्रा के लिए आर्य से मिलना चाहते हैं ।
**भागुरायण—**प्रवेश कराओ ।
**भासुरक—**जो आर्य की आज्ञा ।
[ बाहर चला जाता है । ]
क्षपणक—[ प्रवेश करके ] उपासकों का धर्म बढ़े ।
भागुरायण—[ अभिनय के साथ देखकर मन में ] अरे ! राक्षस का मित्र जीवसिद्धि है । [ प्रकट ] भदन्त ! राक्षस के ही किसी प्रयोजन को लक्ष्य करके तो नहीं जा रहे हैं ?
मु० रा०—१९