मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः २६१
क्षपणकः—साबकां ! णत्थि एदं, तथावि ण कधइस्सं अदिणिसंसं ।
( उपासक ! नास्तीदं, तथापि न कथयिष्याम्यतिनृशंसम् । )
भागुरायणः—भदन्त ! अहमपि मुद्रां न दास्यामि ।
क्षपणकः—[ स्वगतम् ] युक्तमिदानीमर्थिने कथयितुम् । [प्रकाशम्] का गदी ? एसे णिवेदेमि, सुणादु साबको । अत्थि दाव हगे अधण्णो पढ़मं पाड़लिउत्ते णिब्समाणो रक्खसस्स मित्तत्तणं उबगदे । तहिं अबसले रक्खसेण गूढं बिकसण्णाप्पओअं समुप्पादिअ घादिदे देव पब्बदीसले । ( का गतिः ? एष निवेदयामि, शृणोतु उपासकः । अस्ति तावदहमधन्यः प्रथम पाटलिपुत्रे निवसन् राक्षसस्य मित्रत्वमुपागतः । तस्मिन्नवसरे राक्षसेन गूढ विषकन्याप्रयोगं समुत्पाद्य घातितो देव पर्वतेश्वरः । )
हिन्दी अनुवाद—क्षपणक—[ कानों को बन्द करके ] पाप शान्त हो, पाप शान्त हो । उपासक ! मैं वहीं जाऊँगा, जहाँ राक्षस या पिशाच का नाम भी नही सुना जाता है ।
भागुरायण—भदन्त ! मित्र पर आपका बड़ा भारी प्रेम-कोप है । सो राक्षस ने भदन्त का क्या अपराध किया ?
क्षपणक—उपासक ! राक्षस ने मेरा कुछ भी अपराध नहीं किया, मैं अभागा स्वयं ही अपने कर्मों से लज्जित हूँ ।
भागुरायण—भदन्त ! आप मेरे कुतूहल को बढ़ा रहे हैं ।
मलयकेतु—[ मन में ] मेरे भी ।
भागुरायण—मैं सुनना चाहता हूँ !
मलयकेतु—[ मन में ] मै भी ।
क्षपणक—उपासक ! इस न सुनने योग्य ( विषय ) के सुनने से क्या ( लाभ ) ?
भागुरायण—भदन्त ! यदि गोपनीय हो तो रहने दीजिये ।
क्षपणक—उपासक ! गोपनीय नही है ।
भागुरायण—तब कहिए ।