मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः २६३
भागुरायणः—भदन्त ! प्रतिश्रुतराज्यार्धमयच्छता चाणक्यहतकेनेदमकार्यमनुष्ठितं न राक्षसेनेति श्रुतमस्माभिः ।
क्षपणकः—[ कर्णौ विधाय ] सन्तं पावं । सावका ! चाणक्को बिसकण्णाए णामपि णं जाणादि । तेण ज्जेब दुट्ठबुद्धिणा रक्खसेण एसा अकज्जसिद्धी किना ( शान्तं पापम् ! उपासक ! चाणक्यो विषकन्याया नामापि न जानाति । तेनैव दुष्टबुद्धिना राक्षसेनैषाऽकार्यसिद्धिः कृता ।)
भागुरायणः—भदन्त ! कष्टमिदमियं मुद्रा दीयते, एहि कुमारं संश्रावयावः ।
हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु—[ आँसू के साथ मन में ] कैसे राक्षस ने पिता जी को मरवाया चाणक्य ने नहीं ?
भागुरायण—भदन्त ! तब क्या हुआ ?
क्षपणक—तब मैं राक्षस का मित्र हूँ, ऐसा करके दुष्ट चाणक्य के द्वारा अपमानपूर्वक नगर से निकाल दिया गया । अभी भी अनेक प्रकार के कुकर्मों में निपुण राक्षस ने कुछ वैसा ( काम ) प्रारंभ किया है, जिससे मैं संसार से निकाल दिया जाऊँगा ।
भागुरायण—भदन्त ! प्रतिज्ञा किये हुए राज्य का आधा ( भाग ) न देते हुए दुष्ट चाणक्य ने यह कुकर्म किया राक्षस ने नहीं, ऐसा हमने सुना था ।
क्षपणक—[ कानों को बन्द करके ] पाप शान्त हो । उपासक ! चाणक्य विषकन्या का नाम भी नहीं जानता है । उसी दुष्टबुद्धि राक्षस ने यह कुकर्म का अनुष्ठान किया है ।
भागुरायण—भदन्त ! यह कष्ट की बात है । यह मुद्रा दे रहा हूँ । आइए, कुमार को हम दोनों सुनावें ।
टिप्पणी—राक्षसस्य मित्रमिति कृत्वा—पहले अंक में यह संकेत आ चुका है कि जीवसिद्धि को चाणक्य ने राक्षस का मित्र बनकर कार्य सिद्ध करने का आदेश दिया । अतएव जीवसिद्धि ने राक्षस का इतना विश्वास प्राप्त कर लिया कि विषकन्या के द्वारा चन्द्रगुप्त को मरवाने के कार्य में राक्षस ने जीवसिद्धि को ही नियुक्त किया । किन्तु जीवसिद्धि ने विषकन्या का प्रयोग चन्द्रगुप्त के प्रति