मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमोऽङ्कः २६७
अन्वयः—अर्थस्य वशात् नीतिः अस्मृतपूर्ववृत्तं मित्राणि शत्रुत्वं शत्रून् च मित्रत्वम् इव आनयन्ती जीवत एव पुंसः जन्मान्तरं नयति ॥८॥
व्याख्या—अर्थस्य—प्रयोजनस्य, वशात्—अनुरोधात्, नीतिः—नय-व्यवहारः, अस्मृतपूर्ववृत्तम्—अस्मृतं स्मृतिपथमना रूढं पूर्ववृत्तं प्राग्व्यवहारः यस्मिन् तत् यथा तथा, मित्राणि—सुहृदः, शत्रुत्वं, शत्रून् च—अरींश्च, मित्रत्वम्—सुहृत्त्वम्, इव—तद्वत्, आनयन्ती—प्रापयन्ती, जीवत एव—अमृतानेव, पुंसः—पुरुषान्, जन्मान्तरम्—अन्यज्जन्म, नयति—प्रापयति ॥८॥
हिन्दी अनुवाद—भागुरायण—[ मन में ] राक्षस के प्राण बचाने चाहिए, यह आर्य (चाणक्य) की आज्ञा है। तब तक ऐसा हो। [ प्रकट रूप से ] कुमार ! क्रोध में न आवें। आसनासीन हुए कुमार से कुछ निवेदन करना चाहता हूँ।
मलयकेतु—[ बैठकर ] मित्र ! क्या कहना चाहते हो ?
भागुरायण—कुमार ! नीतिशास्त्र के अनुसरण करने वालों की शत्रु, मित्र और तटस्थ की व्यवस्था प्रयोजनवश हुआ करती है, साधारण व्यक्तियों की तरह स्वेच्छानुसार नही। क्योकि उस समय सर्वार्थसिद्धि को राजा बनाने की इच्छा करते हुए राक्षस के लिये चन्द्रगुप्त से भी बलवान् प्रातः स्मरणीय महाराज पर्वतेश्वर ही स्वार्थ में बाधक महान् शत्रु थे। (अतएव) उस समय राक्षस ने यह किया, इसलिए इसमें (उसका) बहुत दोष नही देखता हूँ। कुमार देखें—
प्रयोजनवश नीति पहले के व्यवहार को बिना स्मरणपथ में लाये मित्रों को शत्रु और शत्रुओं को मित्र के समान बनाती हुई जीवित ही पुरुषों को दूसरे जन्म मे पहुँचा देती है ॥८॥
टिप्पणी—अर्थशास्त्रव्यवहारिणाम्—नीतिशास्त्रानुसरणशीलानाम् । अर्थशास्त्रेण व्यवहर्तुं शीलमेषाम् इति अर्थशास्त्र—वि—अव √हृ + णिनि कर्तरि तच्छील्ये, तेषाम् । अर्थवशात्—अर्थस्य प्रयोजनस्य वशम् आयत्तता, तस्मात् । अरिमित्रोदासीनव्यवस्था—वि-अव √स्था + अङ् भावे = व्यवस्था । अरयश्च मित्राणि च उदासीनाश्च इति द्वन्द्व स०, तेषाम् व्यवस्था । लौकिकानाम्—लोकानुसरणशीलानाम् साधारणजनानामित्यर्थः । लोके भवाः