मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः ३११
आदि ) से । पक्षान्तर में—विरुद्धः पक्षः अस्य इति विपक्षः शत्रु मे । व्यावृत्तम्—हटा हुआ । वि-आ√वृत्+क्त कर्मणि । निग्रहः—पराजय । नि√ग्रह्+अप् भावे ।
यहाँ दार्ष्टान्तिक पक्ष का अभिप्राय यह है कि चन्द्रगुप्त की लक्ष्मी को स्थिर करने रूप साध्य में निश्चित मौर्य की स्थिति तथा नन्द के विनाश रूप अन्वय और व्यतिरेक व्याप्ति से विशिष्ट, भद्रभट, भागुरायण आदि रूप सपक्ष में स्थिति को धारण करने वाली और मलयकेतु रूप विपक्ष से अलग चाणक्य-नीति रूप साधन मौर्य की लक्ष्मी को स्थिर करने के लिए समर्थ है । किन्तु जो मलयकेतु की सेना भद्रभट आदि के कारण स्वयमेव साध्य है ( अर्थात् वंश-परम्परागत पुरुषो से युक्त नही है ) मलयकेतु ओर चाणक्य दोनों पक्षों में समान ( आदर रखती ) है और मलयकेतु के पक्ष मे भद्रभटादिको के रूप में विपरीत है, उस सेना के स्वीकार करने से स्वामी ( अर्थात् मलयकेतु ) का पराजय अवश्यम्भावी है । इस श्लोक में श्लेषालंकार से अनुप्राणित श्रौती पूर्णोपमा अलंकार है और शार्दूलविक्रीडित छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥ १० ॥
अथवा तैस्तैर्विज्ञातापरागहेतुभिः प्राक्परिगृहीतोपजापैरापूर्णमिति न विकल्पयितुमर्हामि । [ प्रकाशम् ] प्रियंवदक ! उच्यन्तामस्मद्वचनात् कुमारानुयायिनो राजानः—सम्प्रति दिने दिने प्रत्यासीदति कुसुमपुरम् । अतः परिकल्पितविभागैर्भवद्भिः प्रयाणे प्रस्थातव्यम् । कथमिति ?
प्रस्थातव्यं पुरस्तात् खसमगधगणैर्मामनुव्यूह्य सैन्यै-
र्गान्धारैर्मध्ययाने सयवनपतिभिः संविधेयः प्रयत्नः ।
पश्चाद् गच्छन्तु वीराः शकनरपतयः संवृताश्चेदिहूणैः
कौलूताद्यश्च शिष्टः पथि परिवृणुयाद्राजलोकः कुमारम् ॥ ११ ॥
अन्वयः—पुरस्तात् व्यूह्य मामनु खसमगधगणैः सैन्यैः प्रस्थातव्यम् । मध्ययाने सयवनपतिभिः गान्धारैः प्रयत्नः संविधेयः । पश्चात् चेदिहूणैः संवृताः वीराः शकनरपतयः गच्छन्तु । शिष्टः च कौलूताद्यः राजलोकः पथि कुमारं परिवृणुयात् ॥ ११ ॥