भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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३१२ | मुद्राराक्षसम्

व्याख्या—पुरस्तात्— ( सङ्ग्रामोद्यतसैन्यसमुदायस्य ) अग्रे, व्यूह्य— विभागं कृत्वा, माम् अनु— मम पृष्ठत , खसमगधगणै — खसाश्च मगधाश्च खसमगधा तेषां गणो येषु तानि खसमगधगणानि तयाविधे , सैन्यै — सैनिकै , प्रस्थातव्यम्— प्रयातव्यम् । मध्ययाने - सैन्यमध्यगमने, सयवनपतिभि — यवनराजै सह, गान्धारे — गान्धारदेशवासिभि सैन्यैरिति शेष , प्रयत्न — उद्योग , मविधेय — कार्य । पश्चात् — अनन्तरम्, चेदिहूणै — चेदिदेशीयम्नेच्छविशेषै , मवृता — सम्मिलिता वीर — पराक्रमशालिन , शकनरपतय — शकदेशीयराजान , गच्छन्तु— यान्तु । शिष्टः च— अवशिष्टश्च, कोलूतार्थ — कुलूतराजप्रमुख , राजलोञ् — नृपवर्ग , पथि-- मार्गे, कुमार— मलयकेतुम्, परिवृणुयात्— वेष्टयित्वा यायात् ॥ ११ ॥

हिन्दी अनुवाद — अथवा ( चन्द्रगुप्त के प्रति ) जिनके विराग के कारणों को जान लिया गया है ऐसे तथा पहले से ( हमारे ) भेदों को जान हुए उन ( भद्रभटादिकों ) से व्याप्त है—इस प्रकार सन्देह करने के योग्य नहीं हैं। [ प्रकट ] प्रियंवदक ! मेरी ओर से कुमार के अनुयायी राजाओं से कहो—अब पाटलिपुत्र दिनोंदिन समीप आता जा रहा है । इसलिए विभागों की रचना करके आप लोगों को यात्रा में चलना चाहिये । किस प्रकार ?—

(सैन्यसमूह के ) अग्रभाग में व्यूह बनाकर मेरे पीछे खस और मगध के समूहों वाली सेनाओं को चलना चाहिये । मध्य भाग में यवन राजाओं के साथ गान्धार सैनिकों को प्रयत्न करना चाहिये । पश्चात् चेदि देश के रहने वाले हूणों से सम्मिलित होकर वीर शक राजगण जायें । और अवशिष्ट कोलूत आदि राजाओं का समूह मार्ग में कुमार को घेर कर चलें ॥ ११ ॥

टिप्पणी—विज्ञातापरागहेतुभि — विज्ञाता अनुमिता अपरा गहेतवः विरागकारणानि येषा ते तथोक्ता , तै । प्राक्परिगृहीतोपजापै — प्राक् पूर्वं परिगृहीत ज्ञात उपजाप भेद ये ते तथोक्ता , तै । परिकल्पितविभागे — परिकल्पित आरचित विभाग सैन्यविभाग ये ते तथोक्ता , तै । माम् अनु-- अत्र अनोः कर्मप्रवचनीयत्वेन तद्योगे द्वितीया । व्यूह्य— व्यूहं कृत्वा इति व्यूह + णिच् + क्त्वा—ल्यप् । यहाँ ल्यप् आदेश किसी भी सूत्र से सम्भव नहीं है । यदि 'वि /ऊह् + क्त्वा—ल्यप्' ऐसी व्युत्पत्ति करते हैं तो 'उपसर्गाद्ध्रस्वस्य ऊहतेः'