मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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राक्षस - [ अभिनय के साथ देखकर ] अरे ये कुमार हैं। जो ये— मनोव्यापार से रहित होने के कारण उस (पैर के अग्र भाग) के विशेषो (अंगुष्ठ कनिष्ठिका आदि) को न जानने वाली 'स्थिर दृष्टि को पैर के अग्र भाग पर रख कर महान् कार्यों की गुरुता से मानो झुके हुए मुखचन्द्र को हाथ से धारण कर रहे हैं ॥ १३ ॥
**टिप्पणी—शून्यत्वात्—**मन के साथ न रहने पर नेत्रों के खुले रहने पर भी पदार्थ का अवलोकन नही होता है । उपनिषद् मे भी कहा है—'अन्यत्रमनाः आसम् नापश्यम्' । **निश्चलन्तीम्—**इसके स्थान में 'निश्चलाङ्गीम्' भी पाठ मिलता है । अर्थ स्पष्ट है । वक्त्रेन्दुम् — वक्त्रम् मुखम् इन्दुरिव अथवा वक्त्रमिव इन्दु इति वक्त्रेन्दु उपमितकर्मधारय स०, तम् । यहाँ रूपक और उपमा अलंकारों का सन्देहसङ्कर है, जो वाच्यात्प्रेक्षा अलंकार से संसृष्ट है । इसमें प्रहर्षिणी छन्द है । इसका लक्षण १, ७ में देखिए ॥ १३ ॥
[ उपसृत्य ] विजयता विजयता कुमार ।
मलयकेतु — आर्य ! अभिवादये । इदमासनमास्यताम् ।
राक्षस — [ उपविशति ]
मलयकेतु — अमात्य ! चिरदर्शनेनार्यस्य वयमुद्विग्ना ।
राक्षस — कुमार ! प्रयाणे प्रतिविधानमनुतिष्ठता मया कुमारादयमुपालम्भोऽधिगत ।
मलयकेतु — अमात्य ! प्रयाणे कथ प्रतिविहितमिति श्रोतुमिच्छामि ।
राक्षस — कुमार ! एवमादिष्टा कुमारस्यानुयायिनो राजान ।
[ प्रस्थातव्यमित्यादिश्लोक पुन पठति । ]
मलयकेतु — [ स्वगतम् ] विज्ञायते, कथ य एव मद्विनाशन चन्द्रगुप्तमाराधयितुमुद्यता त एव मा परिवृण्वन्ति [ प्रकाशम् ] आर्य ! अस्ति कश्चित् य कुसुमपुर प्रति गच्छति तत आगच्छति वा ?
राक्षस — कुमार ! अवसितमिदानी गतागतप्रयोजनम् । ननु पञ्च षैरहोभिर्वयमेव तत्र गन्तास्म ।