मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२२ मुद्राराक्षसम्
अन्वय— चलेषु अर्थेषु लुब्धेन न अनपायिषु यश सु (लुब्धेन) स्वामि-भक्तय विस्मृता, पुत्रदाराणा स्मृत स्यात् ॥ १४ ॥
व्याख्या— चलेषु—अस्थिरेषु, अर्थेषु—धनेषु, लुब्धेन—इच्छुकेन, न—नहि, अनपायिषु—स्थिरेषु, यश सु—कीर्तिषु, (लुब्धेन) स्वामिभक्तय —प्रभुविषयकानुरागाः, विस्मृता —मनसा परिहृताः (स्यु ), पुत्रदाराणा—पुत्राणा मुताना दाराणा स्त्रियाश्च, स्मृत स्यात्—स्मरण वृत्त स्यात् ॥ १४ ॥
हिन्दी अनुवाद— भागुरायण—पुन अपने को मार खिलाना व्यर्थ है, बताओ ।
सिद्धार्थक— आर्य ! शकटदास ने ।
राक्षस— कुमार ! यदि शकटदास ने लिखा है तब मैने ही लिखा है ।
मलयकेतु — विजये ! शकटदास को देखना चाहता हूँ ।
प्रतीहारो— जो कुमार की आज्ञा ।
भागुरायण— [ मन मे ] आर्य चाणक्य के गुप्तचर अनिश्चित बात को नही बतायेगे । अथवा आकर शकटदास 'यह वही लेख है' ऐसा पहचानकर पहले की बात खोल दे । ऐसा होने पर सन्देह करता हुआ मलयकेतु इस प्रयोग में अनुत्साहित हो जायेगा [ प्रकट ] कुमार ! शकटदास अमात्य राक्षस के सामने 'मैंने लिखा है' ऐसा कभी भी स्वीकार नही करेगा । इसलिये उसकी दूसरी लिखावट मंगायी जाय, जिसलिये कि अक्षरो की समानता ही यह सब निर्णय कर देगी ।
मलयकेतु— विजये ! ऐसा करो ।
भागुरायण— कुमार ! यह मुद्रा भी ले आवे ।
मलयकेतु— दोनो ले आओ ।
'प्रतीहारी— जो कुमार की आज्ञा । [ बाहर जाकर पुन प्रवेश करके ] कुमार ! यह वह शकटदास का अपने हाथ से लिखा हुआ पत्र और मुद्रा है ।
मलयकेतु— [ दोनो को अभिनय के साथ देखकर ] आर्य ! अक्षर मिल रहे हैं ।