भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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३३० मुद्राराक्षसम्

लगा हुआ मित्र का पुत्र हूँ। वह तुमको धन देने वाला है और ( यहाँ ) तुम अपनी इच्छा के अनुसार मुझे देते हो। वहाँ तुम्हारा मन्त्री का पद सत्कारपूर्वक दासता ही है और यहाँ ( तुम्हारा ) स्वामित्व है। फिर इससे अधिक किस स्वार्थ के विषय मे कामना तुम्हे अनार्य बना रही है ? ॥१६॥

टिप्पणीअनार्या सवृत्ता.—आर्य का लक्षण यह है—'कर्तव्यमाचरन् काममकर्तव्यमनाचरन्। तिष्ठति प्रवृताचारो स वा आर्य इति स्मृत ॥' जो कर्तव्य करे और अकर्तव्य न करते हुए सदाचारी हो, वह आर्य है। हमने तो आपके उपकार रूप कर्तव्य का पालन नहीं किया, बल्कि आपके अपकार रूप अकर्तव्य का अनुष्ठान किया, इसलिये हम अनार्य हो गये। मोर्योऽसौ अर्थात् चन्द्रगुप्त तुम्हारे लिये प्रभु के समान सेव्य है और मै तुम्हारा सेवक हूँ, फलत वहाँ दासता है और यहाँ स्वामित्व है। दाता चन्द्रगुप्त तुमको धन देनवाला है और यहा तुम अपनी इच्छा से धन देते हो अर्थात् वहाँ धन के विषय मे परतन्त्रता है और यहाँ स्वतन्त्रता है। दास्यम् चन्द्रगुप्त के पास मन्त्री का पद दासता है और यहाँ मेरे पास तुम स्वामी हो। स्वार्थे कस्मिन् उपर्युक्त तथ्यो के आधार पर हम कह सकते हैं कि तुम्हारे लिये मेरे यहाँ से बढकर चन्द्रगुप्त के यहाँ कोई भी चीज प्रलोभन की नही है। फिर क्यो तुम मुझे छोडकर शत्रु का आश्रय ले रहे हो ? इससे बढकर अनार्यता क्या होगी। इस श्लोक मे यथासख्य अलकार है और स्रग्धरा छन्द है। स्रग्धरा का लक्षण १, १ मे देखिये ॥१६॥

राक्षस—कुमार ! एवमयुक्तव्याहारिणा भवतैव मे निर्णयो दत्त. कुत ?—[ 'मौर्याऽसौ स्वामिपुत्र.' इति युष्मदस्मदोर्व्यत्ययेन पठति । ]

मलयकेतु—[ लेखमलङ्करणस्थगिकाञ्च विनिर्दिश्य ] इदमिदानी किम् ?

राक्षस—[ सबाष्पम् ] विधेर्विलसितमिद, कुत ?—

भृत्यत्वे परिभावधामनि सति स्नेहात् प्रभूणा सता पुत्रेभ्य कृतवेदिना कृतधिया येषामभिन्ना वयम्। ते लोकस्य परीक्षका क्षितिभृत पापेन येन क्षताः तस्येद विपुल विधेर्विलसित पुसा प्रयत्नच्छिदः॥२०॥

अन्वय—कृतधिया कृतवेदिना येषा सता प्रभूणा वय परिभावधामनि