मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
३३० मुद्राराक्षसम्
लगा हुआ मित्र का पुत्र हूँ। वह तुमको धन देने वाला है और ( यहाँ ) तुम अपनी इच्छा के अनुसार मुझे देते हो। वहाँ तुम्हारा मन्त्री का पद सत्कारपूर्वक दासता ही है और यहाँ ( तुम्हारा ) स्वामित्व है। फिर इससे अधिक किस स्वार्थ के विषय मे कामना तुम्हे अनार्य बना रही है ? ॥१६॥
टिप्पणी—अनार्या सवृत्ता.—आर्य का लक्षण यह है—'कर्तव्यमाचरन् काममकर्तव्यमनाचरन्। तिष्ठति प्रवृताचारो स वा आर्य इति स्मृत ॥' जो कर्तव्य करे और अकर्तव्य न करते हुए सदाचारी हो, वह आर्य है। हमने तो आपके उपकार रूप कर्तव्य का पालन नहीं किया, बल्कि आपके अपकार रूप अकर्तव्य का अनुष्ठान किया, इसलिये हम अनार्य हो गये। मोर्योऽसौ अर्थात् चन्द्रगुप्त तुम्हारे लिये प्रभु के समान सेव्य है और मै तुम्हारा सेवक हूँ, फलत वहाँ दासता है और यहाँ स्वामित्व है। दाता चन्द्रगुप्त तुमको धन देनवाला है और यहा तुम अपनी इच्छा से धन देते हो अर्थात् वहाँ धन के विषय मे परतन्त्रता है और यहाँ स्वतन्त्रता है। दास्यम् चन्द्रगुप्त के पास मन्त्री का पद दासता है और यहाँ मेरे पास तुम स्वामी हो। स्वार्थे कस्मिन् उपर्युक्त तथ्यो के आधार पर हम कह सकते हैं कि तुम्हारे लिये मेरे यहाँ से बढकर चन्द्रगुप्त के यहाँ कोई भी चीज प्रलोभन की नही है। फिर क्यो तुम मुझे छोडकर शत्रु का आश्रय ले रहे हो ? इससे बढकर अनार्यता क्या होगी। इस श्लोक मे यथासख्य अलकार है और स्रग्धरा छन्द है। स्रग्धरा का लक्षण १, १ मे देखिये ॥१६॥
राक्षस—कुमार ! एवमयुक्तव्याहारिणा भवतैव मे निर्णयो दत्त. कुत ?—[ 'मौर्याऽसौ स्वामिपुत्र.' इति युष्मदस्मदोर्व्यत्ययेन पठति । ]
मलयकेतु—[ लेखमलङ्करणस्थगिकाञ्च विनिर्दिश्य ] इदमिदानी किम् ?
राक्षस—[ सबाष्पम् ] विधेर्विलसितमिद, कुत ?—
भृत्यत्वे परिभावधामनि सति स्नेहात् प्रभूणा सता पुत्रेभ्य कृतवेदिना कृतधिया येषामभिन्ना वयम्। ते लोकस्य परीक्षका क्षितिभृत पापेन येन क्षताः तस्येद विपुल विधेर्विलसित पुसा प्रयत्नच्छिदः॥२०॥
अन्वय—कृतधिया कृतवेदिना येषा सता प्रभूणा वय परिभावधामनि
पञ्चमोऽङ्कः ३३१
भृत्यत्वे सति स्नेहात् पुत्रेभ्यः अभिन्नाः, ते लोकस्य परीक्षकाः क्षितिभृतः येन पापेन क्षताः तस्य पुंसां प्रयत्नच्छिदः विधेः इदं विपुलं विलसितम् ॥२०॥
व्याख्या—कृतधियां—परिनिष्ठितबुद्धीनां, कृतवेदिनां—कृतं कर्म विदन्ति जानन्ति ये तादृशानां गुणज्ञानां, येषां, सतां प्रभूणां—नृपोत्तमानां, (सम्बन्धे) वयम्—अहम्, परिभावधामनि—तिरस्कारास्पदे, भृत्यत्वे—सेवकत्वे, सति, स्नेहात्—प्रेम्णः, पुत्रेभ्यः—आत्मजेभ्यः, अभिन्नाः—नान्यः (स्म), ते—तथाविधाः, लोकस्य—पुरुषस्य, परीक्षकाः—विनिर्णयसमर्थाः, क्षितिभृतः—राजानः, येन, पापेन—दुराचारेण विधिना, क्षताः विनाशितः, तस्य—तथाविधस्य, पुंसां—पुरुषाणां, प्रयत्नच्छिदः—उद्योगनाशिनः, विधेः—दैवस्य, इदं दृश्यमानं, विपुलं—महत्, विलसितम्—लीला ॥२०॥
हिन्दी अनुवाद—राक्षस—कुमार ! इस प्रकार अनुचित कहने वाले आपने ही मेरा निर्णय कर दिया । क्योकि—[ 'मौर्योऽसौ स्वामिपुत्रः' इस श्लोक में युष्मद् और अस्मद् शब्दों को एक दूसरे से बदलकर पढ़ता है । ]
मलयकेतु—[ पत्र और आभूषणों की पेटी को बता कर ] सम्प्रति यह क्या है ?
राक्षस—[ आँसू के साथ ] यह भाग्य की लीला है। क्योकि—
संयत चित्त वाले तथा उपकार को समझने वाले जिन उत्तम राजाओं के अपमानास्पद सेवक-पद पर होने पर (भी) मैं स्नेह के कारण पुत्रों से भिन्न नही समझा जाता था, वे लोगों के परीक्षक (अर्थात् सदसद्विवेक-कर्ता) राजा जिस पापी (भाग्य) के द्वारा विनष्ट कर दिये गए, उस पुरुषों के प्रयत्न को नष्ट करने वाले भाग्य की यह महान् लीला है ॥ २० ॥
टिप्पणी—अयुक्तव्याहारिणा—अनुचितवादिना । अयुक्तं व्याहरति तच्छीलः इति अयुक्त-वि-आ √हृ + णिनि कर्तरि ताच्छील्ये = अयुक्तव्याहारी, तेन । युष्मदस्मदोर्व्यत्ययेन—युष्मद् और अस्मद् शब्द के व्यत्यय से 'मौर्योऽसौ'—श्लोक का पाठ इस प्रकार होता है—
मौर्योऽसौ स्वामिपुत्रः परिचरणपरो मित्रपुत्रो मम त्वं दाता सोऽर्थस्य मह्यं स्वमतमनुगतोऽहं तु तुभ्यं ददामि ।
३३२ मुद्रारा सम्
दास्यं सत्कारपूर्वं ननु सचिवपदं तत्र मे स्वाम्यमत्र स्वार्थे कस्मिन्न् समीहा पुनरधिकतरे मामनार्यं करोति ॥
वह चन्द्रगुप्त स्वामी (नन्द) का पुत्र है (अत स्वामी के समान सेव्य है) और सेवापरायण तुम मेरे मित्र के पुत्र हो (इसलिए सेवकतुल्य हो)। वह (चन्द्रगुप्त) मुझे धन देने वाला है और (यहाँ) मैं तुमको अपनी इच्छा के अनुसार धन देता हूँ। वहाँ सम्मानपूर्वक मन्त्री का पद दासता है और यहाँ मेरा स्वामित्व है। फिर किस विशेष स्वार्थ में इच्छा मुझे अनार्य बना रही है ?
विलसितम्—विलास । वि√लस् + क्त भावे । कृतधियाम्—कृता परिनिष्ठिता म गता वा धी बुद्धि येषां ते कृतधियः, तेषाम् । कृतवेदिना—कृतज्ञानाम् । कृतं वेत्तुं शीलमेषाम् इति कृत√विद् + णिनि कर्तरि ताच्छील्ये । परिभावधामनि—अनादर के स्थान । परि√भू + घञ् = परिभाव, तस्य धाम, तस्मिन् । भृत्यत्वे—अत्र अनादरे सप्तमी । भृत्यत्वमनादृत्य = सति भृत्यत्वे? प्रभूणाम्—यह नद को सूचित करता है । आदरार्थे बहुवचनम् । पापेन—पापविशिष्टेन । पाप + अच् अर्शआदित्वात् । प्रयत्नच्छिद—उद्योगनाशक । प्रयत्नं छिनत्ति इति प्रयत्न√छिद् + क्विप् कर्तरि = प्रयत्नच्छिद्, तस्य । इस श्लोक में अतिशयोक्ति और परिसंख्या अलंकारों की संसृष्टि है । इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है । इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥ २० ॥
मलयकेतु—[सक्रोधम्] कथमद्यापि निह्नुयते विधेर्विलसितमिदं, न ममेति ? अनार्य !
कन्या तीव्रविषप्रयोगविषमा कृत्वा कृतघ्न ! त्वया विश्रम्भप्रवणः पुरा मम पिता नीतः कथाशेषताम् । सम्प्रत्याहितगौरवेण भवता मन्त्र्याधिकारे रिपो प्रारब्धाः प्रणयाय मांसवदहो ! विक्रेतुमेते वयम् ॥ २१ ॥
अन्वय—कृतघ्न ! पुरा त्वया तीव्रविषप्रयोगविषमा कन्या कृत्वा विश्रम्भप्रवणः मम पिता कथाशेषतां नीतः । सम्प्रति अहो रिपो मन्त्र्याधिकारे आहितगौरवेण भवता प्रणयाय एते वयं मांसवत् विक्रेतुं प्रारब्धाः ॥ २१ ॥
व्याख्या—कृतघ्न !—अकृतज्ञ !, पुरा—पूर्वम्, त्वया—भवता, तीव्रविष-
पञ्चमोऽङ्कः ३३५
प्रयोगविषमां—तीव्रस्य तीक्ष्णस्य विषस्य गरलस्य प्रयोगेण नित्यसेवनेन विषमां घोरां, कन्यां—बालिकां, कृत्वा—विधाय, विस्रम्भप्रवणः—अतिविश्वस्तः, मम—मे, पिता—तातः, पर्वतेश्वर इति यावत्, कथाशेषतां—नाममात्रस्थितत्वं, नीतः—प्रापितः। सम्प्रति—अधुना, अहो—खेदस्य विषयः ( यत् ), रिपोः—शत्रोः, मन्त्राधिकारे—मन्त्रस्य मन्त्रणाकार्यस्य यः अधिकारः नियोगः तस्मिन्, आहितगौरवेण—आहितं स्थापितं गौरवम् महत्त्वम् यस्मिन् तथाविधेन, भवता—त्वया, प्रणयाय—तत्प्रीत्यर्थं एते—विश्वस्ताः, वयम्, मांसवत्—क्रव्यमिव, विक्रेतुं—पणायितुं, प्रारब्धाः—प्रक्रान्ताः ॥ २१ ॥
हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु—[ क्रोध के साथ ] कैसे अब भी छिपा रहे हो कि यह भाग्य की लीला है, मेरा ( काम ) नहीं है। नीच !
कृतघ्न ! पहले तुमने तीक्ष्ण विष के नित्य सेवन के कारण घातक कन्या का निर्माण करके अत्यन्त विश्वस्त मेरे पिता को नाममात्र से अवशिष्ट कर दिया। ओह ! और अब तो शत्रु के मंत्रणाकार्य रूप अधिकार ( अर्थात् महामात्य के पद ) को महत्त्व देने वाले तुमने ( उसकी ) प्रीति के लिए हमें मांस के समान बेचना प्रारम्भ कर दिया है ॥ २१ ॥
टिप्पणी—निह्नुयते—प्रच्छाद्यते। छिपाया जा रहा है। विस्रम्भप्रवणः—विस्रम्भे विश्वासे प्रवणः उन्मुखः अनाशङ्क इत्यर्थः। कथाशेषतां नीतः—कथा नाममात्रं शेषः अस्य इति कथाशेषः, तस्य भावः तत्ता, ताम् नीतः प्रापितः। अर्थात् मरवा दिया। मन्त्राधिकारे—मन्त्रित्वे इत्यर्थः। आहितगौरवेण—धृताभिलाषेण इत्यर्थः। प्रणयाय—अत्र 'क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः' इति सूत्रेण चतुर्थी। इस श्लोक में श्रौती पूर्णोपमा अलंकार है और शार्दूलविक्रीडित छन्द है। छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥ २१ ॥
राक्षसः—[ स्वगतम् ] अयमपरो गण्डस्योपरि विस्फोटः। [ प्रकाशं कर्णौ पिधाय ] शान्तं पाप, शान्तं पापम्। नाहं विषकन्यामारोपितवान्-पापोऽहं पर्वतेश्वरे।
मलयकेतुः—केन तर्हि व्यापादितस्तातः ?
राक्षसः—दैवमत्र प्रष्टव्यम्।
१३४ मुद्राराक्षसम्
मलयकेतु — [ सक्रोधम् ] दैवमद्य प्रष्टव्य, न क्षपणको जीवसिद्धिः ?
राक्षस — [ स्वगतम् ] कथ जीवसिद्धिरपि चाणक्यप्रणिधि ? हन्त हृदयमपि मे रिपुभि स्वीकृतम् ।
मलयकेतु — [ सक्रोधम ] भासुरक ! आज्ञाप्यता शिखरसेन सेनापति —'ये एतेन राक्षसेन सह सौहार्दमुत्पाद्यास्मच्छरीरद्रोहेण चन्द्रगुप्तमाराधयितुकामा पञ्च राजान, तद्यथा—'कौलूत चित्रवर्मा, मलयनरपति सिंहनाद, काश्मीर पुष्कराक्ष, सिन्धुराज सुषेण, पारसीकाधिराजो मेघाक्ष इति । तेषु त्रय प्रथमा मदीया भूमि कामयन्ते, ते गम्भीरश्वभ्रमुपनीय पांशुभि पूर्यन्ताम्, इतरौ तु द्वौ हस्तिबलकामौ हस्तिनैव घात्येतामि' ति ।
पुरुष — ज कुमारो आणवेदि । ( यत् कुमार आज्ञापयति । ) [ इति निष्क्रान्त । ]
मलयकेतु — [ सक्रोधम् ] राक्षस ! राक्षस ! नाह विस्रम्भघाती राक्षसो मलयकेतु खल्वह, तद् गच्छ, समाश्रीयता सर्वात्मना चन्द्रगुप्त इति,—
विष्णुगुप्तञ्च मौर्यञ्च सममप्यागतौ त्वया ।
उन्मूलयितुमीशोऽह त्रिवर्गमिव दुर्नय ॥ २२ ॥
अन्वय — त्वया समम् अपि आगतौ विष्णुगुप्त च मौर्यं च अह त्रिवर्गं दुर्नय इव उन्मूलयितुम् ईश ॥ २२ ॥
व्याख्या— त्वया राक्षसेन, समम् अपि—सार्द्धमपि, आगतौ—आयातौ, विष्णुगुप्त च—चाणक्य च, मौर्यं च—नृपल च, अह—मलयकेतु, त्रिवर्गं—धर्मार्थकामान् दुर्नय इव—कुनीतिखिव, उन्मूलयितुम्—विनाशयितुम्, ईश —समर्थ ( अस्मि ) ॥ २२ ॥
हिन्दी अनुवाद—राक्षस— [ मन में ] यह मर्म-स्थान के फोडे पर दूसरा फोडा है । [ प्रकट रूप से कानों को बन्द करके ] पाप शान्त हो, पाप शान्त हो । मैंने (पर्वतेश्वर पर) विषकन्या का प्रयोग नहीं किया, मैं पर्वतेश्वर के प्रति निष्पाप हूँ ।
पञ्चमोऽङ्कः ३३५
मलयकेतु—तब किसने पिता जी को मारा ?
राक्षस—इस बारे में भाग्य से पूछना चाहिए ।
मलयकेतु—[ क्रोध के साथ ] इस बारे में भाग्य से पूछना चाहिए, और क्षपणक जीवसिद्धि से नहीं ?
राक्षस—[ मन में ] क्या जीवसिद्धि भी चाणक्य का गुप्तचर है ? हाय ! शत्रुओं ने मेरे हृदय पर भी अधिकार कर लिया ।
मलयकेतु—[ क्रोध के साथ ] भामुरक ! सेनापति शिखरसेन को आज्ञा दे दो कि ये जो मेरे शरीर से द्रोह करने वाले राक्षस के साथ मित्रता करके चन्द्रगुप्त की सेवा करने के इच्छुक पाँच राजा, जैसे—कुलूत का चित्रवर्मा, मलय का राजा सिंहनाद, काश्मीर का पुष्कराक्ष, सिन्धु का राजा सुषेण और पारसीक का अधिपति मेघाक्ष है, इनमें से पहले तीन मेरी भूमि चाहते है। उन्हे गहरे गड्ढे में ले जाकर मिट्टी से तोप दो और गजसेना चाहने वाले अन्य दो ( राजाओं ) को हाथी से मरवा ही डालो ।
पुरुष—जो कुमार की आज्ञा । [ बाहर चला जाता है ।]
मलयकेतु—[ क्रोध के साथ ] राक्षस ! राक्षस ! मैं विश्वासघाती राक्षस नहीं हूँ । मैं मलयकेतु हूँ । इसलिए जाओ । सब तरह से चन्द्रगुप्त का आश्रय लो ।
तुम्हारे सहित आये हुए चाणक्य और चन्द्रगुप्त को विनष्ट करने में मैं उसी तरह समर्थ हूँ जैसे दुर्नीति धर्म, अर्थ और काम को ( विनष्ट करने में समर्थ होती है ) ॥२२॥
टिप्पणी—गण्डस्य—मर्मस्थान में हुए फोडे को गंड कहते है । विस्फोटः—फोड़ा । आरोपितवान्—प्रयुक्तवान् । दैवमत्र—राक्षस के पास इसका कोई प्रमाण नही है कि चाणक्य ने पर्वतेश्वर को नही मरवाया है । इसलिए 'वह भाग्य से पूछने को कहता है । वह अपनी सारी असफलताओं पर भाग्य को ही दोष देता है । छठे अंक में उसने कहा है—'दैवं हि नन्दकुलशत्रुरसौ न विप्रः' । वह 'दैवाधीनं जगत्सर्वम्' इस शास्त्रवचन पर पूर्ण विश्वास करते हुए दिखाई पडता है । हृदयमपि—राक्षस जीवसिद्धि को अभिन्नहृदय समझता
३३६ मुद्राराक्षसम्
था । उस अपने हृदय की सब बाते बता दिया करता था । जब वह भी चाणक्य का गुप्तचर निकला तब राक्षस की कौन सी बात शत्रु के लिए अज्ञात बच गई । इसलिए उसने कहा है कि शत्रु ने मेरे हृदय पर भी अधिकार कर लिया है । अस्मच्छरीरद्रोहेण— अन 'क्रुधद्रुहोपसृष्टयो कर्म' इत्यनेन कर्मत्वम् । कर्मषष्ठ्या समास । **श्वभ्रम्—**गर्तम् । गड्डा । 'गर्त्ताऽटो भुवि श्वभ्रे' इत्यमर । घातयेताम्—√हन्+णिच्+लोट् कर्मणि । **विस्रम्भघाती—**विस्रम्भ घातयति इति विस्रम्भ-√हन्+णिनि कर्तरि ताच्छील्ये । **आगतौ—**यहाँ द्विवचन इसलिए है कि 'विष्णुगुप्त च मौर्यं च इति विष्णुगुप्तमौर्यौ' इस द्वन्द्वसमास का विशेषण इसे माना गया है । **त्रिवर्गम्—**धर्म, अर्थ और काम या क्षय, स्थान और वृद्धि के समूह को त्रिवर्ग कहते है । 'त्रिवर्गा धर्मकामार्थश्चतुर्वर्गः समोक्षकैः', 'क्षय. स्थान च वृद्धिश्च त्रिवर्गो नीतिवेदिनाम्' इति चामर । **दुर्नय —**दुष्टो नय दुर्नय प्रादिसमास , 'दुर षत्वणत्वयोरुपसर्गंत्वप्रतिषेधः' इति न णत्वम् । इस श्लोक मे श्रौती पूर्णोपमा अलकार है और अनुष्टुप् छन्द है । अनुष्टुप् का लक्षण १, ३ मे देखिये ॥२२॥
**भागुरायण —**कुमार ! कृत कालहरणेन । शीघ्रमेव कुसुमपुरोपरोधाय प्रतिष्ठाप्यन्तामस्मद्वलानि,—
गौडीना लोध्रधूलीपरिमलवहलान् धूम्रयन्त कपोलान् क्लिश्नन्त कृष्णिमान भ्रमरकुलरुच कुञ्चितस्यालकस्य । पांशुव्यूहा वलाना तुरगखुरपुटक्षोदलव्धात्मलाभाः शत्रूणामुत्तमाङ्गे गजमदसलिलच्छिन्नमूला पतन्तु ॥२३॥
[ इति सपरिजनो निर्गतो मलयकेतु । ]
**अन्वय —**बलाना तुरगखुरपुटक्षादलव्धात्मलाभाः पांशुव्यूहा गजमद-सलिलच्छिन्नमूलाः (सन्त ) गौडीना लोध्रधूलीपरिमलबहलान् कपोलान् धूम्रयन्तः भ्रमरकुलरुच कुञ्चितस्य अलकस्य कृष्ण्णिमान क्लिश्नन्त शत्रूणाम् उत्तमाङ्गे पतन्तु ॥२३॥
**व्याख्या—**बलाना—सैन्याना, **तुरगखुरपुटक्षोदलव्धात्मलाभा —**तुरगाणा घोटकाना खुरपुटे अविवक्षस्त्वत् पुटिते - शफे य क्षोद चूर्णन तेन लब्धः
पञ्चमोऽङ्कः ३३७
प्रातः आत्मलाभः जन्म यैः तादृशाः पांशुव्यूहाः—रजोराशयः, गजमदसलिल-च्छिन्नमूलाः—गजानां हस्तिनां मदा एव सलिलानि दानवारयः तैः छिन्नं विनाशितं मूलं ब्रध्नः येषां तथाभूताः ( सन्तः ), गौडीनां—गौडदेशरमणीनां, लोध्रधूलीपरिमलबहलान्—लोध्राणां लोध्रपुष्पाणां धूली परागः तस्य परिमलः आमोदः तेन बहलान् व्याप्तान्, कपोलान्—गण्डस्थलानि, धूम्रयन्तः—मलिनयन्तः, भ्रमरकुलरुचः—भ्रमरकुलानां मधुपवृन्दानां रुक् कान्तिरिव रुक् यस्य तादृशस्य, कुञ्चितस्य—कुटिलस्य, अलकस्य—चूर्णकुन्तलस्य, कृष्णिमानं—काष्र्ण्यं, क्लिश्नन्तः—अभिभवन्तः, शत्रूणाम्—रिपूणाम्, उत्तमाङ्गे—शिरसि, पतन्तु—अवरोहन्तु ॥ २३ ॥
हिन्दी अनुवाद—भागुरायण—कुमार ! समय बिताना व्यर्थ है । शीघ्र ही पाटलिपुत्र को घेरने के लिए हमारी सेनायें प्रयाण कर दें—
( हमारी ) सेनाओं के घोड़ों के खुर-पुटों से किये जाने वाले चूर्ण से उत्पन्न धूलराशियाँ हाथियों के मदजल से छिन्न-मूल होते हुए गौड़ देश की रमणियो के लोध्रपुष्प के पराग की सुगंधि से व्याप्त कपोलों को मलिन करते हुए और भ्रमर-समूहों की कान्ति जैसी कान्तिवाले घुंघराले बालों की कालिमा को अभिभूत करते हुए, शत्रुओं के शिर पर गिरें ॥ २३ ॥
[ परिजनों समेत मलयकेतु चला जाता है । ]
टिप्पणी—प्रतिष्ठाप्यन्ताम्—प्रेष्यन्तामित्यर्थः । गौडीनाम्—गौड एक क्षत्रिय-वंश का नाम है । गौडानां निवासो जनपदः गोडाः = गौड़ देश । गौडाः विषयो देशः एषाम् इति गौडाः = गौड़ देश के निवासी । गौडानाम् अपत्यानि स्त्रियः इति गौड + अण् + ङीप् = गौड्यः, तासाम् । धूली—धूलि + ङीष् । धूम्रयन्तः—धूम्र = धूसर । धूम्रं कुर्वन्तः इति धूम्र + णिच् + लट्—शतृ । कृष्णिमानम्—कृष्णस्य भावः इति कृष्ण + इमनिच् = कृष्णिमा, तम् । क्लिश्नन्तः—दबाते या तिरस्कृत करते हुए । क्लिश् ( क्र्यादिगणीय ) + लट्—शतृ । इस श्लोक में तद्गुण, लुप्तोपमा, रूपक, पर्याय और स्वभावोक्ति अलंकारों का सांकर्य है । इसमें गौडी रीति है, ओज गुण है और स्रग्धरा छन्द है । स्रग्धरा का लक्षण १, १ मे देखिए ॥ २३ ॥
मु० रा०—२२
३३८ | मुद्राराक्षसम्
राक्षसः—[ सावेगम् ] हा धिक् कष्टम् ! तेऽपि हतास्तपस्विनश्चित्रवर्मादयः ॥ तत् कथं सुहृन्नाशाय राक्षसश्चेष्टते, न रिपुविनाशाय ? तत् किमिदानीं करवाणि मन्दभाग्य ?
किं गच्छामि तपोवनम् ? न तपसा शाम्येत् सवैरं मन किं भर्तॄननुयामि जीवति रिपौ ? स्त्रीणामियं योग्यता । किं वा खड्गसखः पताम्यरिवले ? नेदं न युक्तं भवेत् चेतश्चन्दनदासमोक्षरभसं रुन्ध्यात् कृतघ्नं न चेत् ॥२४॥
[ इति निष्क्रान्ता सर्वे । ]
॥ इति पञ्चमोऽङ्कः ॥
अन्वय —तपोवनम् गच्छामि किम् ? सवैरं मनः तपसा न शाम्येत् । रिपौ जीवति भर्तॄन् अनुयामि किम् ? इयं स्त्रीणां योग्यता । वा खड्गसखः अरिबले पतामि किम् ? न इदं युक्तं न भवेत्, चन्दनदासमोक्षरभसं चेत् रुन्ध्यात्, चेत् न कृतघ्नं भवेत् ॥ २४ ॥
व्याख्या—तपोवनम्— तपस्यार्थमरण्यं, गच्छामि किम्—यामि किम् ?, सवैरं—सामर्षं, मनः चेतः , तपसा—तपश्चरणेन, न— नहि, शाम्येत्— शान्तिं प्राप्नुयात् । रिपौ—शत्रौ, जीवति—प्राणधारणं कुर्वति ( सति ), भर्तॄन्—स्वामिना, अनुयामि किम्—अनुगच्छामि किम् ?, इयम्—एषा, स्त्रीणाम्—अबलानाम्, योग्यता—प्रतिविधानम् । वा—अथवा, खड्गसखः — असिमात्रसहायः, अरिबले—शत्रुसैन्ये, पतामि किम्—विशामि किम् ?, न, इदम्—एतत्, युक्तं—समीचीनं, न भवेत्—न स्यात्, ( यतो हि ) चन्दनदासमोक्षरभसं—चन्दनदासस्य मोक्षे मोचने रभसः त्वरा यस्य तादृशं, चेत् — ( मदीयं ) मनः, रुन्ध्यात्—प्रतिबध्नीयात्, चेत्—यदि, न—एवं न कुर्यादित्यर्थः, (तदा मम मनः ) कृतघ्नम्—अकृतज्ञं, भवेत्—स्यात् ॥ २४ ॥
हिन्दी अनुवाद—राक्षस—[ आवेग के साथ ] हाय धिक्कार है, कष्ट है ! वे बेचारे चित्रवर्मा आदि भी मारे गए ! तो क्या मित्रों के नाश के लिए राक्षस प्रयत्न करता है, शत्रुओं के विनाश के लिए नहीं ? तो मैं अभागा क्या करूँ ?
षष्ठोऽङ्कः (उद्यानप्रवेश व मलयकेतुत्याग)
षष्ठोऽङ्कः ३१६
क्या मैं तपोवन में चला जाऊँ ? वैरभाव से युक्त मन तपस्या से शान्त नहीं होगा । शत्रु के जीवित रहने पर क्या स्वामी का अनुकरण करूँ ? यह तो अबलाओं का काम है । अथवा क्या तलवार लेकर शत्रुदल में कूद पडूँ । नही, यह अच्छा नहीं होगा । (क्योंकि) चन्दनदास को छुड़ाने में व्यग्र (मेरा) मन रोकेगा । यदि नही (रोकेगा तो वह) कृतघ्न होगा ॥ २४ ॥
[ सभी (पात्र) बाहर चले जाते हैं । ]
॥ पाँचवाँ अंक समाप्त ॥
टिप्पणी—तोपि घातिताः—यहाँ अपि शब्द समुच्चयार्थक है, अर्थात् मेरे स्वामी और मित्र सब मारे गए । तत् किमिदानीम्—मेरे सभी प्रयत्न मुझे ही हानि पहुँचा रहे हैं, इसलिए अब क्या करूँ । किं गच्छामि—इस श्लोक में निराश होकर राक्षस सोच रहा है कि क्या मैं तप करने के लिए बन में चला जाऊँ अथवा क्या स्वामी का अनुगमन करने के लिए आत्महत्या कर लूँ अथवा तलवार लेकर शत्रुओं पर टूट पडूँ । इन सभी विकल्पों के बाद वह निश्चय करता है कि नहीं, ऐसा करने से मैं चन्दनदास के प्रति कृतघ्न हो जाऊँगा । इसलिए अब उसे छुड़ाने का ही प्रयत्न करूँगा । इस पद्य में दीपक अलंकार और वाक्यार्थहेतुक काव्यलिंग अलंकार का सांकर्य है । इसमें शार्दूल-विक्रीडित छन्द है । उक्त छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥ २४ ॥
षष्ठोऽङ्कः
[ ततः प्रविशत्यलङ्कृतः सहर्षः सिद्धार्थकः । ]
सिद्धार्थकः—
जअदि जगदणीलो केसवो केसिघादी जअदि अ जगदिट्ठो चन्दमा चन्दउत्तो । जअदि जअणसज्जं जा अकाऊण सेण्णं पडिहदपरपक्खा अज्जचाणक्कणीदी ॥ १ ॥
३४० मुद्राराक्षसम्
(जयति जलदनील केशव केशिघाती जयति च जनदृष्टेश्चन्द्रमाश्चन्द्रगुप्त । जयति जयनसज्ज या अकृत्वा च सैन्य प्रतिहतपरपक्षा आर्यचाणक्यनीति ॥ १ ॥ )
अन्वय —जलदनील, केशिघाती केशव जयति । जनदृष्टे चन्द्रमा चन्द्रगुप्तश्च जयति । आर्यचाणक्यनीतिश्च जयति या जयनसज्ज सैन्यम् अकृत्वा प्रतिहतपरपक्षा ( विद्यते ) ॥ १ ॥
व्याख्या—जलदनील —जलद मेघ इव नील श्याम, केशिघाती—केशिनामदैत्यविनाशक, केशव —कृष्णावतार श्रीविष्णु, जयति—उत्कर्षं लभते । जनदृष्टे —लोकलोचनस्य सम्बन्धे, चन्द्रमा —चन्द्र ( इव ), चन्द्रगुप्तश्च—मौर्यश्च, जयति—उत्कर्षं लभते । आर्यचाणक्यनीतिश्च—पूज्यकौटिल्यनयश्च, जयति, या—चाणक्यनीति, जयनसज्ज—जयन युद्धादि तदर्थं सज्जा वेशो यस्य तादृश, सैन्यम्—सेनाम्, अकृत्वा—अविधाय सैय विनेवेत्यर्थः, प्रतिहतपरपक्षा—प्रतिहत विनाशित परपक्ष शत्रुपक्ष यया तादृशी, ( विद्यते ) ॥ १ ॥
हिन्दी अनुवाद—[ तदनन्तर अलङ्कारयुक्त एवम् प्रसन्न सिद्धार्थक प्रवेश करता है। ]
सिद्धार्थक—मेघ के समान श्याम वर्ण वाले तथा केशी नामक राक्षस को मारने वाले विष्णु की जय हो, मनुष्यों की दृष्टि के लिए चन्द्रतुल्य चन्द्रगुप्त की जय हो और युद्धार्थ उद्यत सेना के बिना ही शत्रुपक्ष को नष्ट कर देने वाली आर्य चाणक्य की नीति की जय हो ॥ १ ॥
टिप्पणी— इस प्रकार मलयकेतु के निग्रह रूप अवांतर कार्य सम्पन्न हो जाने के बाद राक्षस को वश में करने के लिए तथा मौर्य की लक्ष्मी को सुदृढ करने रूप महान् फल की सिद्धि के लिए छठे और सातवें अको का उपक्रम किया गया है। जलदनील —जल ददातीति जलद । तद्वत् नील जलदनील उपमितकर्मधारय स० । केशिघाती—केशिन हन्तु शीलमस्य इति केशिन्√हन्+णिनि कर्तरि ताच्छील्ये । केशवः—क ब्रह्माणम् ईशं रुद्रञ्च वर्तयति इति
षष्ठोऽङ्कः ३४१
केशवः । हरिवंश में इसकी निरुक्ति इस प्रकार की गई है—‘हिरण्यगर्भः कः प्रोक्त ईशः शङ्कर एव च । सृष्ट्यादिना वर्तयति तौ यतः केशवो भवान् ॥’ जयन—जयति अस्मिन् इति √जि+ल्युट् अधिकरणे = जयनम् । इस पद्य में लुप्तोपमा, रूपक तथा विभावना अलंकारो की संसृष्टि है। इसमे मालिनी छन्द है। मालिनी का लक्षण ३, १५ मे देखिए ॥ १ ॥
ता जाव चिरस्य कालस्स पिअबअस्सं सुसिद्धत्थअ पेक्खामि । [ परिक्रम्यावलोक्य च ] अअं उण पिअबअस्सओ सुसिद्धत्थओ इदो ज्जेब आअच्छीदी ता जाव उबसप्पामि । ( तद्यावच्चिरस्य कालस्य प्रियवयस्यं सुसिद्धार्थकं पश्यामि । अयं पुनः प्रियवयस्यः सुसिद्धार्थक इत एवागच्छति, तद्यावदुपसर्पामि ।
[ ततः प्रविशति सुसिद्धार्थकः । ]
सुसिद्धार्थकः—
सन्तावेन्ता आबाणेसुं महूसवेसुं रुआबेन्ता ।
हिअअच्छिआ अवि विहवा विरहे मित्ताणं दुम्मणाअन्ते ॥२॥
( सन्तापयन्तः आपानेषु महोत्सवेषु रुजायन्तः ।
हृदयस्थिता अपि विभवा विरहे मित्राणां दुर्मनायन्ते ॥२॥)
अन्वयः—मित्राणां विरहे विभवाः हृदयस्थिता अपि आपानेषु सन्तापयन्तः महोत्सवेषु रुजायन्तः दुर्मनायन्ते ॥ २ ॥
व्याख्या—मित्राणां—सुहृदां, विरहे—वियोगे, विभवाः—ऐश्वर्याणि, हृदयस्थिता अपि—अन्तःकरणवर्तिनोऽपि, आपानेषु—पानगोष्ठीषु, सन्तापयन्तः—क्लेशं जनयन्तः, महोत्सवेषु—नृत्यगीतादिषु समारम्भेषु, रुजायन्तः—मनोरोगं समुत्पादयन्तः, दुर्मनायन्ते—निरानन्दवन्तः सम्पत्स्यन्ते ॥ २ ॥
हिन्दी अनुवाद—तो बहुत दिनों के बाद प्रिय मित्र सुसिद्धार्थक को देख रहा हूँ। [ घूमकर और देखकर ] फिर यह प्रिय मित्र सुसिद्धार्थक इधर ही आ रहा है। इसलिए समीप जाता हूँ।
[तब सुसिद्धार्थक प्रवेश करता है।]
| १४२ | मुद्राराक्षसम् |
|---|
सुसिद्धार्थक—मित्रों के वियोग मे ऐश्वर्य हृदय मे विद्यमान रहने पर भी पान गोष्ठियो मे टीस उत्पन्न करते हुए और महोत्सवों में रोग उत्पन्न करते हुए आनन्द शून्य हो जाते हैं ॥ २ ॥
टिप्पणी—चिरस्य कालस्य—बहो कालात् परमित्यर्थ । रुजायन्त — रुजा कुर्वन्त इति रुजा+णिच्+लट्+शतृ । दुर्मनायन्ते—बहुमनम दुर्मनसः भवन्ति इति दुर्मनस्+क्यङ्, सलोप 'भृशादिभ्यो भुव्यच्चेर्लोपश्व हल.' इत्यनेन । इस पद्य मे दीपक अलकार और पदार्थहेतुक काव्यलिंग अलकार में साकर्य है । इसमे आर्या छन्द है । आर्या का लक्षण १, ५ मे देखिए ॥ २ ॥
सुदञ्च मए जहा—मलअकेतुकडआदो पिअवअस्सओ सिद्धत्थओ आजदो त्ति । ता जाव णं अण्णेमामि । [ परिक्रम्योपसृत्य च ] एसो सिद्धत्थओ । ( श्रुतञ्च मया यथा—मलयकेतुकटकात् प्रियवयस्यः सिद्धार्थक आगत इति । तद्यावदेनमन्विष्यामि । एष सिद्धार्थकः । )
सिद्धार्थक —[विलोक्य] कथ इदो ज्जेव पिअवअस्सओ सुसिद्धत्थओ ! [ उपगम्य ] अवि मुह पिअवअस्सस्स ? ( कथमित एव प्रियवयस्यः सुसिद्धार्थक । अपि सुख प्रियवयस्यस्य ? )
[ उभावप्योन्यमालिङ्गत ]
सुसिद्धायक —अह वयम्स ! बुदो मे सुह, जस्स तुम चिरआलप्प-वासपच्चागदोवि अआणिअ बुत्तन्त अण्णदो गदोसि ? त्ति । ( अहो वयस्य ? कुतो मे सुखम्, यस्य त्व चिरप्रवासप्रत्यागतोऽप्यज्ञापयित्वा वृत्तान्तमन्यतो गतोऽसीति ।
सिद्धार्थक —प्पीसीददु पिअवअस्सो । अह क्खु दिट्ठमेत्तो ज्जेव्व अज्जचाणक्केण आणत्तो जहा— सिद्धत्थअ ! गच्छ, एद पिअ बुत्तन्त पिअदसणस्स देवस्स चन्दसिरिणो णिवेदेहि' त्ति । तदा तस्स त णिवेदिय एव्व अणुभूदपात्थिंवप्पसादो अह प्पिअवअम्म प्पेक्खिदु तुह गेह चलिदोह्मि । ( प्रसीदतु प्रियवयस्य । अह खलु दृष्टमात्र एवार्यचाणक्येनाज्ञप्तो यथा— 'सिद्धार्थक ! गच्छ, इम प्रिय वृत्तान्त प्रियदर्शनस्य देवस्य चन्द्रश्रियो निवेदेयेति । ततस्तस्य तन्निवेद्य एवम-
षष्ठोऽङ्कः १४१
नुभूतपार्थिवप्रसादोऽहं प्रियवयस्यं प्रेक्षितुं तव गेहं चलितोऽस्मि ।)
सुसिद्धार्थकः—बअस्स ! जदि मए एदं सुणिदव्वं भोदि, ता मं पि सुणावेहि, किं ते प्पिअं प्पिअदंसणस्स चन्दसिरिणो णिबेदिदं त्ति । ( वयस्य ! यदि मयेदं श्रोतव्यं भवति, तन्मामपि श्रावय, किं तत् प्रियं प्रियदर्शनस्य चन्द्रश्रियो निवेदितमिति । )
हिन्दी अनुवाद—मैंने सुना है कि मलयकेतु के शिविर से प्रिय मित्र सिद्धार्थक आया है । तब तक इसको खोजता हूँ । [ घूमकर और पास जाकर ] यह सिद्धार्थक है ।
सिद्धार्थक—[ देखकर ] कैसे इधर ही प्रिय मित्र सुसिद्धार्थक ( आ रहा है ) ! [ समीप जाकर ] प्रिय मित्र सुख से तो हैं ?
[ दोनों परस्पर आलिंगन करते हैं । ]
सुसिद्धार्थक—वाह मित्र ! मुझे सुख कहाँ से, जिसके तुम चिरकाल के प्रवास से लौटकर बिना समाचार बताये दूसरी ओर चले गए हो ।
सिद्धार्थक—प्रिय मित्र प्रसन्न हों । मुझे तो देखते ही आर्य चाणक्य ने आज्ञा दी, जैसे —सिद्धार्थक ! जाओ, यह प्रिय समाचार प्रियदर्शन वाले महाराज चन्द्रगुप्त से निवेदन कर दो ।' तदनन्तर उनसे वह निवेदन करके इस प्रकार राजा की कृपा का अनुभव किये हुए मैं प्रिय मित्र को देखने के लिए तुम्हारे घर की ओर चला हूँ ।
सुसिद्धार्थक—मित्र ! यदि यह मेरे सुनने योग्य हो तो मुझे भी सुनाओ । वह कौन-सा प्रिय ( समाचार ) प्रियदर्शन चन्द्रगुप्त से निवेदन किया है ?
टिप्पणी—चिरप्रवासप्रत्यागतः—चिरं प्रवासः, तस्मात् प्रत्यागतः प्रतिनिवृत्तः । प्रियवयस्यः—स्निग्धमित्रम् । प्रियदर्शनस्य—प्रियम् सुखकारकं दर्शनम् अवलोकनम् यस्य स तयोक्तः, तस्य । देवस्य—अत्र शेषत्वविवक्षया षष्ठी । गेहं चलितः—गेहं प्रति चलितः ।
सिद्धार्थकः—प्पिअवअस्स ! तुह वि किं असुणिदव्वं अत्थि ? ता णिसामेहि । अत्थि दाव, अज्जचाणक्कणीदिमोहिदमदिणा मलय-
| २४४ | मुद्राराक्षसम् |
|---|
केदुहदएण णिराकरिअ रक्खसं, सदा चित्तवम्मप्पमुहा पहाणा पञ्च पत्थिवा, तदो असामिक्खकारी एसो दुराआरो त्ति कट्टुअ, उज्झिअ मलअकेदुकडकभूमिं, णिअभूमिकुसलदाए भयविलोलसेण्णतणूकिदसेस-परिवारेसु सक सक विसअ अभिप्पत्थिदेसु, पत्थिवेसु भद्रभट-पुरु-दत्त हिङ्गरात बलउत्त-राजसण-भागुरायण-रोहितवम्म-विजयवम्मप्पमुहेहि सजमिदो मलअकेदू । (प्रियवयस्य ! तवापि किमश्रोतव्यमस्ति ? तन्निशा-मय— अस्ति तावदायर्चणक्यनीतिमोहितमतिना मलयकेतुहतकेन निरा-कृत्य राक्षस, हताश्चित्रवर्मप्रमुखा प्रधाना पञ्च पार्थिवा । ततो ऽसमीक्ष्यकारी एष दुराचार इत्युज्झित्वा मलयकेतु कटकभूमि निजभूमि-कुशलतया भयविलोलसैन्यतनूकृतशेषपरिवारेषु स्वकं स्वकं विषयमभि-प्रस्थितेषु पार्थिवेषु, भद्रभट पुष्पत्त-हिङ्गरात बलगुप्त-राजसेन-भागु-रायण-रोहिताक्ष-विजयवर्मप्रमुखै संयमितो मलयकेतु ।)
हिन्दी अनुवाद— **सिद्धार्थक—**प्रिय मित्र ! क्या तुम्हें भी न सुनाने योग्य ( कोई समाचार ) है ? तो सुनो—वात यह है कि आर्य चाणक्य की नीति से किंकर्तव्यविमूढ बने मलयकेतु न राक्षस को निकाल-बाहर करके चित्र-वर्मा आदि पाँच प्रधान राजाओ को मरवा डाला । तदनन्तर यह विना विचारे काम करने वाला दुराचारी है—ऐसा समझकर अपने अधिकार की रक्षा करने मे निपुण होने के कारण मलयकेतु के शिविर को त्यागकर भय से विह्वल सैनिको द्वारा अल्प किय गये अवशिष्ट अनुयायिवर्गों वाले राजाओ के अपने अपने देश को चले जाने पर भद्रभट, पुष्पत्त, हिङ्गरात, बलगुप्त, राजसेन, भागुरायण, रोहिताक्ष और विजयवर्मा आदि ने मलयकेतु को पकड लिया ।
टिप्पणी— निशामय— शृणु। चाणक्यनीतिमोहितमतिना— चाणक्यस्य नीति नयः तया मोहिता वशीकृता मति बुद्धि. यस्य तथाभूतेन । मलयकेतुहतकेन— मलयकेतुश्चासौ हतक मलयकेतुहतक 'कुत्सितानि कुत्सितैः' इति समाम , तेन । निराकृत्य— पृथक्कृत्य । असमीक्ष्यकारी— जाल्मः । सम्√ईक्ष्+क्त्वा—ल्यप्=समीक्ष्य । न समीक्ष्य असमीक्ष्य । असमीक्ष्य कर्तु शीलमस्य इति असमीक्ष्य√कृ+णिनि कर्तरि ताच्छील्ये,
षष्ठाङ्कः ३४५
उपपदतत्० । दुराचारः— दुः दुष्ट आचारः व्यवहारः यस्य स दुराचारः प्रादिबहुव्रीहि स० । **उज्झित्वा—**परित्यज्य । **भयविलोलासैन्यतनूकृतशेषपरिवारेषु—**भयेन साध्वसेन विलोलानि चपलानि विह्वलानि वा सैन्यानि, तैः तनूकृताः शेषाः परिवाराः येषां ते तथोक्ताः, तेषु । **विषयम्—**जनपदम् । **संयतितः—**धृतः ।
सुसिद्धार्थकः— वअस्स ! भद्दभटप्पमुहा किल देअस्स चन्दासिरिणो अवरत्ता मलअकेदुं समास्सिदा त्ति लोए मन्तीअदि । ता किं णिमित्त एदं कुकविणाडअस्स विअ अण्णं मुहे अण्णं णिव्वहणे त्ति ? (वयस्य ! भद्रभटप्रमुखाः किल देवस्य चन्द्रश्रियोऽपरक्ता मलयकेतुं समाश्रिता इति लोके मन्त्र्यते । तत् किं निमित्तमेतत् कुकविनाटकस्येवान्यन्मुखेऽन्यन्निर्वहण इति ?)
सिद्धार्थकः— वअस्स ! सुणु दाव, दैवगदीए विअ असुणिदगदीए णमो अज्जचाणक्कणीदीए । (वयस्य ! शृणु तावत्, देवगत्ये इवाश्रुतगत्यै नम आर्यचाणक्यनीतये ।)
सुसिद्धार्थकः— अअस्स ! तदो तदो ? (वयस्य ! ततस्ततः ?)
सिद्धार्थकः— बअस्स ! तदो प्पहुदि, सारसाहणसमुदएण इदो णिक्कमिअ अज्जचाणक्केण पडिवण्णं अराअलोअं असेसराअबलं । (वयस्य ! ततः प्रभृति सारसाधनसमुदयेनेतो निष्क्रम्य आर्यचाणक्येन प्रतिपन्नमराजलोकमशेषराजबलम् ।)
सुसिद्धार्थकः— बअस्स ! कहिं ? (वयस्य ! कुत्र ?)
सिद्धार्थकः— बअस्स ! जहिं एदे,—(वयस्य ! यत्रैते,—)
अदिसअगुरुएणं दाणदप्पेण दन्ती
सजलजलदलीला उव्वहन्ता णदन्ति ।
कसपहरभएण जादकम्पा तुरन्ता
गहिदजअणसज्जा सपदन्त तुलगा ॥ ३ ॥
( अतिशयगुरुकेण दानदर्पेण दन्तिनः
सजलजलदलीलामुद्वहन्तो नदन्ति ।
१४६ मुद्राराक्षसम्
कशाप्रहारभयेन जातकम्पास्त्वरयन्त गृहीतजयनसज्जाः सम्पद्यन्ते तुरङ्गाः ॥ ३ ॥
अन्वय — गृहीतजयनसज्जाः दन्तिनः अतिशयगुरुकेण दानदर्पेण सजल-जलदलीलाम् उद्दहन्तः नदन्ति। तुरङ्गाः कशाप्रहारभयेन जातकम्पाः त्वरयन्तः सम्पद्यन्ते ॥ ३ ॥
व्याख्या — गृहीतजयनसज्जाः — गृहीतः परिहितः जयनस्य युद्धस्य सज्जा वेशो यै स्तादृशाः, दन्तिनः — गजाः, अतिशयगुरुकेण — अतिप्रवृद्धेन, दानदर्पेण — मदजलगर्वेण, सजलजलदलीलाम् — सजलानां जलपूर्णानां जलदानां मेघानां लीलाम् चरितम्, उद्वहन्तः — धारयन्तः, नदन्ति — गर्जन्ति। तुरङ्गाः — अश्वा कशाप्रहारभयेन — कशायाः ताडन्या प्रहारः आघातः तस्मात् यत् भय भीतिः तेन, जातकम्पा — जात उत्पन्नः कम्पः कम्पनं येषां तादृशाः, (अतएव) त्वरयन्त — (स्वारोहिणः) त्वरावन्तो विदधतः, सम्पद्यन्ते — सन्नद्धा भवन्ति ॥ ३ ॥
हिन्दी अनुवाद — सुसिद्धार्थक — मित्र ! भद्रभट आदि महाराज चन्द्रगुप्त से विरक्त होकर मलयकेतु के आश्रय में चले गये—ऐसा लोगों में कहा जाता है। तो किस कारण यह अयोग्य कवि के द्वारा रचित नाटक की तरह मुख-सन्धि (अर्थात् प्रारम्भ) में कुछ और तथा निर्वहणसन्धि (अर्थात् अन्त) में कुछ और हो रहा है ?
सिद्धार्थक — मित्र ! सुनो, देवता के गति के समान न सुनी गई गति वाली आर्य चाणक्य की नीति को नमस्कार है।
सुसिद्धार्थक — मित्र ! तब क्या हुआ ?
सिद्धार्थक — मित्र ! तत्पश्चात् उत्कृष्ट सेना के समूह के साथ आर्य चाणक्य ने यहाँ से निकलकर नृपसमूह से रहित सम्पूर्ण राजसेना को अधिकार में कर लिया।
सुसिद्धार्थक — मित्र ! कहाँ ?
सिद्धार्थक — मित्र ! जहाँ ये—
युद्ध के वेश को धारण किये हुये हाथी अत्यन्त बढे हुये मदजल के गर्व
षष्ठोऽङ्कः ३४७
से सजल मेघों की भाँति लीला करते हुए गर्जन कर रहे हैं और घोड़े चाबुक की मार के भय से काँपते हुए तथा ( अपने सवारों को ) शीघ्रतायुक्त करते हुए ( युद्धार्थ ) तत्पर हो रहे हैं ॥ ३ ॥
टिप्पणी—चन्द्रश्रियः—अत्र शेषे षष्ठी । चन्द्रश्रियः चन्द्रगुप्तस्य सम्बन्धे अपरक्ताः । मन्त्र्यते—कथ्यते । मुखे—मुखसन्धौ प्रारम्भे इत्यर्थः । निर्वहणे—निर्वहणसन्धौ—उपसंहारे इत्यर्थः । निरुह्यते इतस्तत आदाय पिण्डीक्रियते एकार्थीक्रियते अस्मिन् इति निर्√वह्+ल्युट् अधिकरणे = निर्वहणम् । अश्रुतगत्यै—अश्रुता गतिर्यस्याः सा अश्रुतगतिः, तस्यै अनाकर्णितकृत्यै इत्यर्थः । आर्यचाणक्यनीत्यै—अत्र नमः शब्दयोगे चतुर्थी । सारसाधनसमुदयेन—साध्यते अनेन इति √साध्+ल्युट् करणे = साधनम् = सैन्यम् । सारं साधनम्, तस्य समुदयेन समूहेन । प्रतिपन्नम्—अधिकृतम् । अराजलोकम्—नृपजनरहितम् । अशेषराजबलम्—समस्तनृपसैन्यम् । अतिशयगुरुकेण—गुरुरेव गुरुकः अतिशयश्चासौ गुरुकः अतिशयगुरुकः, तेन = अतिप्रवृद्धेन वा अतिप्रबलेन । जातकम्पास्त्वरयन्तः—यहाँ 'जातकम्पोत्तरङ्गाः' पाठभेद मिलता है । अर्थ होगा—काँपते हुए तथा चंचल । अर्थात् घोड़े इस तरह काँप रहे है कि मानो तरंगों के समान चक्कर काट रहे हैं । इस श्लोक के पूर्वार्ध में उपमा तथा रूपक का सन्देहसङ्कर है और उत्तरार्ध में समासोक्ति तथा पदार्थहेतुक काव्यलिंग अलंकार हैं । इसमे मालिनी छन्द है । मालिनी का लक्षण ३, १५ में देखिए ॥ ३ ॥
सुसिद्धार्थकः—बअस्स ! एदं सव्वं दावं चिट्ठदु, तहा सव्वलोअपच्चक्खं उज्जआहिआरो भविअ कहं अज्जचाणक्को पुणो बि तं ज्जेब मन्तिपदं आरूढो ? ( वयस्य ! एतत् सर्वं तावत् तिष्ठतु । तथा सर्वलोकप्रत्यक्षमुज्झिताधिकारो भूत्वा कथमार्थचाणक्यः पुनरपि तदेव मन्त्रिपदमारूढः ? )
सिद्धार्थकः—बअस्स ! अदिमुद्धो दाणी सि तुमं, जो अमच्चरक्खसेण अणवगाहिदपुव्वं अज्जचाणक्कबुद्धिं अवगाहिदुं इच्छसि ? ( वयस्य ! अतिमुग्ध इदानीमसि त्व, योऽमात्यराक्षसेनानवगृहीतपूर्वामार्यचाणक्यबुद्धिमवगाहितुमिच्छसि । )
३४८ मुद्राराक्षसम्
सुसिद्धार्थकः—वअस्स ! अध अमच्चरक्खसो दाणी कहिँ ? ( वयस्य ! अथाऽमात्यराक्षस इदानीं कुत्र ? )
सिद्धार्थक —वअस्स ! सोक्खु तस्सिं पलयकोलाहले वड्ढमाणे मलयकेदुकडआदो णिक्कमित्र उन्दुरणामहेएण चरेण अणुसरन्तो इमं ज्जेव कुसुमउर आगदो त्ति अज्जचाणक्कस्स णिवेदितं । ( वयस्य ! स खलु तस्मिन् प्रलयकोलाहले वर्धमाने मलयकेतुकटकात् निष्क्रम्योन्दुरनामधेयेन चरेणानुश्रियमाण इदमेव कुसुमपुरमागत इत्यार्यचाणक्यस्य निवेदितम् । )
हिन्दी अनुवाद—सुसिद्धार्थक—मित्र ! यह सब रहे। उस प्रकार सब लोगों के सामने अधिकारत्यागी होकर आर्य चाणक्य ने फिर मन्त्री का पद कैसे ग्रहण कर लिया ?
सिद्धार्थक—मित्र ! तुम इस समय अत्यन्त अबोध हो, जो कि पहले अमात्य राक्षस के द्वारा न समझी गई आर्य चाणक्य की बुद्धि को समझना चाहते हो ।
सिद्धार्थक—मित्र ! अच्छा, इस समय अमात्य राक्षस कहाँ है ?
सिद्धार्थक—मित्र ! वह तो उस ( मलयकेतु के शिविर ) में प्रलयकालीन जैसे कोलाहल के बढ़ जाने पर मलयकेतु के शिविर से निकलकर उन्दुर नामक गुप्तचर के द्वारा पीछा किया जाता हुआ इसी कुसुमपुर में आ गया है—यह आर्य चाणक्य से निवेदन कर दिया गया है ।
टिप्पणी—एतत् सर्वं तिष्ठतु—अर्थात् यह सब रहने दो। सर्वलोकप्रत्यक्षम्—समस्तजनसमक्षम् । उज्झिताधिकार —उज्झितः त्यक्तः अधिकारः मन्त्रिपदं येन तादृशः । आरूढ —प्राप्तः । स्वीकृतवानित्यर्थः । अतिमुग्ध —अतिगतावाध । अनवगृहीतपूर्वाम्—पूर्वमज्ञाताम् । अवगाहितुम्—ज्ञातुम् । प्रलयकोलाहले—प्रलयकालिककोलाहलसदृशे कोलाहले । अत्र 'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' इति सूत्रेण सप्तमी । अनुश्रियमाण —अनुगम्यमानः । आर्यचाणक्यस्य—अत्र शेषत्वविवक्षया षष्ठी । आर्यचाणक्य पुरत इति निवेदितम् ।
षष्ठोऽङ्कः । ३४६
सुसिद्धार्थकः—बअस्स ! तहा णाम अमच्चरक्खसो णन्दरज्जप्पच्चाणअणे किदव्ववसाओ णिक्कमिअ सम्पदं अकिदत्थो पुणो बि कहं इमं ज्जेव कुसुमउरं आअदो ? ( वयस्य ! तथा नाम अमात्यराक्षसो नन्दराज्यप्रत्यानयने कृतव्यवसायो निष्क्रम्य साम्प्रतमकृतार्थः पुनरपि कथमिदमेव कुसुमपुरमागतः ? )
सिद्धार्थकः—बअस्स ! तक्केमि, चन्दणदासस्स सिणेहेण त्ति । ( वयस्य ! तर्कयामि, चन्दनदासस्य स्नेहेनेति । )
सुसिद्धार्थकः—बअस्स ! सच्चं चन्दणदासस्स सिणेहेण त्ति ? अध चन्दणदासस्स मोक्खं पेक्खसि ? ( वयस्य ! सत्य चन्दनदासस्य स्नेहेनेति ? अथ चन्दनदासस्य मोक्षं प्रेक्षसे ? )
सिद्धार्थकः—वअस्स ! कुदो से अधण्णस्स मोक्खो ? सो क्खु सम्पदं अज्जचाणक्कस्स आणत्तीए दुवेहिं पि अम्हेहि बज्झट्ठाणं पवेसिअ वावादइदव्वो । ( वयस्य ! कुतोऽस्याधन्यस्य मोक्षः ? स खलु साम्प्रतमार्यचाणक्यस्याऽऽज्ञप्त्या द्वाभ्यामप्यावाभ्यां वध्यस्थानं प्रवेश्य व्यापादयितव्यः । )
सुसिद्धार्थकः [सक्रोधम्] बअस्स ! किं अज्जचाणक्कस्स घादअजणो अण्णो णत्थि, जेण अम्हे ईदिसे णिसंसे कम्मे णिजुज्जीअदि ? (वयस्य ! किलार्यचाणक्यस्य घातकजनोऽन्यो नास्ति, येनावामीदृशे नृशंसे कर्मणि नियुज्यावहे ? )
सिद्धार्थकः—वअस्स ! को जीवलोए जीविदुकामो अज्जचाणक्कस्स आणत्तिं पडिकूलेदि ? ता एहि, चंडालवेसधारिणा भविअ चन्दणदासं वज्झट्ठाणं णेह्म । ( वयस्य ! को जीवलोके जीवितुकामः आर्यचाणक्यस्याज्ञप्ति प्रतिकूलयेत् ? तदेहि, चाण्डालवेशधारिणौ भूत्वा चन्दनदासं वध्यस्थानं नयावः । )
[ इत्युभौ निष्क्रान्तौ ]
प्रवेशकः
हिन्दी अनुवाद—सुसिद्धार्थक— मित्र ! उस प्रकार नन्दराज्य को लौटाने