मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २४४ | मुद्राराक्षसम् |
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केदुहदएण णिराकरिअ रक्खसं, सदा चित्तवम्मप्पमुहा पहाणा पञ्च पत्थिवा, तदो असामिक्खकारी एसो दुराआरो त्ति कट्टुअ, उज्झिअ मलअकेदुकडकभूमिं, णिअभूमिकुसलदाए भयविलोलसेण्णतणूकिदसेस-परिवारेसु सक सक विसअ अभिप्पत्थिदेसु, पत्थिवेसु भद्रभट-पुरु-दत्त हिङ्गरात बलउत्त-राजसण-भागुरायण-रोहितवम्म-विजयवम्मप्पमुहेहि सजमिदो मलअकेदू । (प्रियवयस्य ! तवापि किमश्रोतव्यमस्ति ? तन्निशा-मय— अस्ति तावदायर्चणक्यनीतिमोहितमतिना मलयकेतुहतकेन निरा-कृत्य राक्षस, हताश्चित्रवर्मप्रमुखा प्रधाना पञ्च पार्थिवा । ततो ऽसमीक्ष्यकारी एष दुराचार इत्युज्झित्वा मलयकेतु कटकभूमि निजभूमि-कुशलतया भयविलोलसैन्यतनूकृतशेषपरिवारेषु स्वकं स्वकं विषयमभि-प्रस्थितेषु पार्थिवेषु, भद्रभट पुष्पत्त-हिङ्गरात बलगुप्त-राजसेन-भागु-रायण-रोहिताक्ष-विजयवर्मप्रमुखै संयमितो मलयकेतु ।)
हिन्दी अनुवाद— **सिद्धार्थक—**प्रिय मित्र ! क्या तुम्हें भी न सुनाने योग्य ( कोई समाचार ) है ? तो सुनो—वात यह है कि आर्य चाणक्य की नीति से किंकर्तव्यविमूढ बने मलयकेतु न राक्षस को निकाल-बाहर करके चित्र-वर्मा आदि पाँच प्रधान राजाओ को मरवा डाला । तदनन्तर यह विना विचारे काम करने वाला दुराचारी है—ऐसा समझकर अपने अधिकार की रक्षा करने मे निपुण होने के कारण मलयकेतु के शिविर को त्यागकर भय से विह्वल सैनिको द्वारा अल्प किय गये अवशिष्ट अनुयायिवर्गों वाले राजाओ के अपने अपने देश को चले जाने पर भद्रभट, पुष्पत्त, हिङ्गरात, बलगुप्त, राजसेन, भागुरायण, रोहिताक्ष और विजयवर्मा आदि ने मलयकेतु को पकड लिया ।
टिप्पणी— निशामय— शृणु। चाणक्यनीतिमोहितमतिना— चाणक्यस्य नीति नयः तया मोहिता वशीकृता मति बुद्धि. यस्य तथाभूतेन । मलयकेतुहतकेन— मलयकेतुश्चासौ हतक मलयकेतुहतक 'कुत्सितानि कुत्सितैः' इति समाम , तेन । निराकृत्य— पृथक्कृत्य । असमीक्ष्यकारी— जाल्मः । सम्√ईक्ष्+क्त्वा—ल्यप्=समीक्ष्य । न समीक्ष्य असमीक्ष्य । असमीक्ष्य कर्तु शीलमस्य इति असमीक्ष्य√कृ+णिनि कर्तरि ताच्छील्ये,