मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः १४१
नुभूतपार्थिवप्रसादोऽहं प्रियवयस्यं प्रेक्षितुं तव गेहं चलितोऽस्मि ।)
सुसिद्धार्थकः—बअस्स ! जदि मए एदं सुणिदव्वं भोदि, ता मं पि सुणावेहि, किं ते प्पिअं प्पिअदंसणस्स चन्दसिरिणो णिबेदिदं त्ति । ( वयस्य ! यदि मयेदं श्रोतव्यं भवति, तन्मामपि श्रावय, किं तत् प्रियं प्रियदर्शनस्य चन्द्रश्रियो निवेदितमिति । )
हिन्दी अनुवाद—मैंने सुना है कि मलयकेतु के शिविर से प्रिय मित्र सिद्धार्थक आया है । तब तक इसको खोजता हूँ । [ घूमकर और पास जाकर ] यह सिद्धार्थक है ।
सिद्धार्थक—[ देखकर ] कैसे इधर ही प्रिय मित्र सुसिद्धार्थक ( आ रहा है ) ! [ समीप जाकर ] प्रिय मित्र सुख से तो हैं ?
[ दोनों परस्पर आलिंगन करते हैं । ]
सुसिद्धार्थक—वाह मित्र ! मुझे सुख कहाँ से, जिसके तुम चिरकाल के प्रवास से लौटकर बिना समाचार बताये दूसरी ओर चले गए हो ।
सिद्धार्थक—प्रिय मित्र प्रसन्न हों । मुझे तो देखते ही आर्य चाणक्य ने आज्ञा दी, जैसे —सिद्धार्थक ! जाओ, यह प्रिय समाचार प्रियदर्शन वाले महाराज चन्द्रगुप्त से निवेदन कर दो ।' तदनन्तर उनसे वह निवेदन करके इस प्रकार राजा की कृपा का अनुभव किये हुए मैं प्रिय मित्र को देखने के लिए तुम्हारे घर की ओर चला हूँ ।
सुसिद्धार्थक—मित्र ! यदि यह मेरे सुनने योग्य हो तो मुझे भी सुनाओ । वह कौन-सा प्रिय ( समाचार ) प्रियदर्शन चन्द्रगुप्त से निवेदन किया है ?
टिप्पणी—चिरप्रवासप्रत्यागतः—चिरं प्रवासः, तस्मात् प्रत्यागतः प्रतिनिवृत्तः । प्रियवयस्यः—स्निग्धमित्रम् । प्रियदर्शनस्य—प्रियम् सुखकारकं दर्शनम् अवलोकनम् यस्य स तयोक्तः, तस्य । देवस्य—अत्र शेषत्वविवक्षया षष्ठी । गेहं चलितः—गेहं प्रति चलितः ।
सिद्धार्थकः—प्पिअवअस्स ! तुह वि किं असुणिदव्वं अत्थि ? ता णिसामेहि । अत्थि दाव, अज्जचाणक्कणीदिमोहिदमदिणा मलय-