मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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सुसिद्धार्थकः—वअस्स ! अध अमच्चरक्खसो दाणी कहिँ ? ( वयस्य ! अथाऽमात्यराक्षस इदानीं कुत्र ? )
सिद्धार्थक —वअस्स ! सोक्खु तस्सिं पलयकोलाहले वड्ढमाणे मलयकेदुकडआदो णिक्कमित्र उन्दुरणामहेएण चरेण अणुसरन्तो इमं ज्जेव कुसुमउर आगदो त्ति अज्जचाणक्कस्स णिवेदितं । ( वयस्य ! स खलु तस्मिन् प्रलयकोलाहले वर्धमाने मलयकेतुकटकात् निष्क्रम्योन्दुरनामधेयेन चरेणानुश्रियमाण इदमेव कुसुमपुरमागत इत्यार्यचाणक्यस्य निवेदितम् । )
हिन्दी अनुवाद—सुसिद्धार्थक—मित्र ! यह सब रहे। उस प्रकार सब लोगों के सामने अधिकारत्यागी होकर आर्य चाणक्य ने फिर मन्त्री का पद कैसे ग्रहण कर लिया ?
सिद्धार्थक—मित्र ! तुम इस समय अत्यन्त अबोध हो, जो कि पहले अमात्य राक्षस के द्वारा न समझी गई आर्य चाणक्य की बुद्धि को समझना चाहते हो ।
सिद्धार्थक—मित्र ! अच्छा, इस समय अमात्य राक्षस कहाँ है ?
सिद्धार्थक—मित्र ! वह तो उस ( मलयकेतु के शिविर ) में प्रलयकालीन जैसे कोलाहल के बढ़ जाने पर मलयकेतु के शिविर से निकलकर उन्दुर नामक गुप्तचर के द्वारा पीछा किया जाता हुआ इसी कुसुमपुर में आ गया है—यह आर्य चाणक्य से निवेदन कर दिया गया है ।
टिप्पणी—एतत् सर्वं तिष्ठतु—अर्थात् यह सब रहने दो। सर्वलोकप्रत्यक्षम्—समस्तजनसमक्षम् । उज्झिताधिकार —उज्झितः त्यक्तः अधिकारः मन्त्रिपदं येन तादृशः । आरूढ —प्राप्तः । स्वीकृतवानित्यर्थः । अतिमुग्ध —अतिगतावाध । अनवगृहीतपूर्वाम्—पूर्वमज्ञाताम् । अवगाहितुम्—ज्ञातुम् । प्रलयकोलाहले—प्रलयकालिककोलाहलसदृशे कोलाहले । अत्र 'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' इति सूत्रेण सप्तमी । अनुश्रियमाण —अनुगम्यमानः । आर्यचाणक्यस्य—अत्र शेषत्वविवक्षया षष्ठी । आर्यचाणक्य पुरत इति निवेदितम् ।