मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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में प्रयत्नशील अमात्य राक्षस निकलकर सम्प्रति असफल होते हुए फिर इसी कुसुमपुर में कैसे आ गए ?
सिद्धार्थक—मित्र ! मैं अनुमान करता हूँ कि चन्दनदास के स्नेह के कारण ।
सुसिद्धार्थक—मित्र ! सचमुच चन्दनदास के स्नेह के कारण ? क्या तुम चन्दनदास के छुटकारे की संभावना कर रहे हो ?
सिद्धार्थक—मित्र ! उस अभागे का छुटकारा कहाँ ? उसे तो इस समय आर्य चाणक्य की आज्ञा से हम दोनों के द्वारा वध्य स्थान में प्रवेश कराकर मार डालना है ।
सुसिद्धार्थक—[ क्रोध के साथ ] मित्र ! क्या आर्य चाणक्य को दूसरा कोई वधिक नहीं मिला, जिससे हम दोनों को ऐसे क्रूर कार्य में नियुक्त कर दिया ?
सिद्धार्थक—मित्र ! संसार में जीवन चाहने वाला कौन आर्य चाणक्य की आज्ञा अस्वीकार करता है ? इसलिए आओ चंडाल का वेश धारण करके चन्दनदास को वध्यस्थान में ले चलते हैं ।
[ दोनों बाहर चले जाते हैं । ]
प्रवेशक समाप्त
टिप्पणी—कृतव्यवसाय—विहितोद्योग । अकृतार्थ—असफल । तर्कयामि—सम्भावयामि । अथ—अत्र प्रश्नार्थकोऽयं शब्दः । 'मङ्गलानन्तरारम्भप्रश्नकात्स्न्र्येष्वथो अथ' इत्यमरः । अधन्यस्य—हतभाग्यस्य । आज्ञप्या—आज्ञया । आ√ज्ञप्+णिच्+क्तिन् भावे=आज्ञप्ति, तया । व्यापादयितव्य—हन्तव्यः । वि आ√पद्+णिच्+तव्य कर्मणि । जीवितुकाम—अत्र 'लुम्पेदवश्यम् कृञ्ये' इति कारिकया मलोपः । प्रतिकूलयति—अन्यथाकरोति अस्वीकरोति वा । प्रतिकूलेन योजयति इति प्रतिकूल+णिच्+लट्—तिप् । प्रवेशक—दे० ५वें अंक में श्लोक ३ से पूर्व टिप्पणी ।
[ ततः प्रविशति रज्जुहस्तः पुरुषः । ]