भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

पृष्ठ 429, कुल 488 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 429

३५२ मुद्राराक्षसम्

पुरुष—(सन्धि, विग्रह आदि) छह गुणों के संयोग के कारण दृढ़, (साम, दान आदि) उपायों के क्रम से रचित पाश रूपी मुख वाली और शत्रु के बाँधने से सीधी चाणक्य की नीति रूपी रस्सी विजयी हो रही है। (रस्सी के पक्ष में—) छह डोरों के प्रयोग के कारण दृढ़, विविध कौशल-परम्परा में रचित पाश रूपी छोर वाली तथा शत्रु के बाँधने से सीधी चाणक्य की नीति के समान रस्सी उत्कर्ष प्राप्त कर रही है ॥४॥

[ घूमकर और देखकर ] यह वही आर्य चाणक्य के उन्दुरक नामक गुप्त-चर का बताया हुआ स्थान है, जहाँ मुझे आर्य चाणक्य की आज्ञा से अमात्य राक्षस को देखना है। [ देखकर ] कैसे ये अमात्य राक्षस सिर को ढके हुए इधर ही आ रहे हैं ? तो तब तक इन उद्यान के पुराने वृक्षों से शरीर को छिपाये हुए देखता हूँ कि (ये) कहाँ बैठते हैं। [ घूमकर उसी तरह खड़ा हो गया। ]

टिप्पणी—प्रेक्षितव्य —अवलोकितव्यः । कृतशीर्षावगुण्ठनं—अव √गुण्ठ्+ल्युट्—अन भावे = अवगुण्ठनम् = ढकना । कृतं शीर्षम्य अवगुण्ठनं येन स कृतशीर्षावगुण्ठन । अपवारितशरीर —अपवादित तिरोहित शरीरं यस्य सः। षड्गुण —इस पद्य में रूपक और उपमा अलंकारों का संकर है और वह श्लेषालंकार से अनुप्राणित होकर पदार्थहेतुक काव्यलिंग अलंकार से संकीर्ण भी है। इसमें आर्या छन्द है। आर्या का लक्षण १, ५ में देखिए ॥ ४ ॥

[ तत प्रविशति यथानिर्दिष्ट सशस्त्रो राक्षस । ]

राक्षस —[ सवाष्पम् ] कष्ट, भो कष्टम् ॥

उत्सन्नाश्रयकातरेव कुलटा गोत्रान्तरं श्रीर्गता तामेवानुगता गतानुगतिकास्त्यक्तानुरागा प्रजा । आप्तैरप्यनवाप्तपौरुषफलै कार्यस्य धूर्हज्झिता किं कुर्वन्त्वथवोत्तमाङ्गरहितैर्नागैरिव स्थीयते ॥ ५ ॥

अन्वय — श्री उत्सन्नाश्रयकातरा कुलटा इव गोत्रान्तर गता । गतानुगतिका प्रजा त्यक्तानुरागा ताम् एव अनुगता । अनवाप्तपौरुषफलै आप्तै अपि कार्यस्य धू उज्झिता । अथवा किं कुर्वन्तु, उत्तमाङ्गरहितै नागै इव स्थीयते ॥ ५ ॥