मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः ३५३
व्याख्या—श्रीः—लक्ष्मीः, उत्सन्नाश्रयकातरा—उत्सन्नः विनष्टः आश्रयः अवलम्बः यस्याः तादृशी चासौ कातरा व्याकुला, कुलटा—स्वैरिणी, इव, गोत्रान्तरम्—अन्यवंशम्, गता—प्राप्ता । गतानुगतिकाः—गतस्य प्राक्प्रस्थितस्य यत् अनुगतम् अनुगमनं तच्छीलाः, प्रजाः—प्रकृतयः, त्यक्तानुरागाः—त्यक्तः परिहृतः अनुरागः स्नेहः याभिः तथाभूताः ( सत्यः ) ताम्—लक्ष्मीम्, एव, अनुगताः—अनुसृताः । अनवाप्तपौरुषफलैः—अनवाप्तं न प्राप्तम् पौरुषस्य पुरुषकारस्य फलं यैः तादृशैः, आप्तैः—विश्वस्तैः, अपि, कार्यस्य—कर्त्तव्यस्य, धूः—भारः, उज्झिता—त्यक्ता । अथवा—आहोस्वित्, ( ते ) किं कुर्वन्तु—किं विदधतु, उत्तमाङ्गरहितैः—शीर्षवियुक्तैः, नागैः—हस्तिभिः, इव ( तैः ) स्थीयते—वर्त्यते ॥ ५ ॥
हिन्दी अनुवाद—[ तत्पश्चात् हाथ में शस्त्र लिये सिर ढके राक्षस प्रवेश करता है । ]
राक्षस—[ आँसू के साथ ] अजी ! कष्ट है, कष्ट !!
लक्ष्मी आश्रय के विनष्ट हो जाने से व्याकुल कुलटा स्त्री के समान दूसरे कुल में चली गई। गये हुए के पीछे चलने वाली तथा अनुराग का त्याग किये हुई प्रजायें उसी ( लक्ष्मी ) के पीछे चली गईं। पुरुषार्थ का फल न प्राप्त करने वाले विश्वस्त जनों ने भी कार्य के भार को छोड़ दिया । अथवा ( वे ) क्या करें ( वे तो ) सिर से रहित हाथियों के तरह रह रहे हैं ॥ ५ ॥
टिप्पणी—यथानिर्दिष्टः—यथा यद्वत् निर्दिष्टः वर्णितः पुरुषेण । सुप्सुपा स० । उत्सन्न—नष्ट । उद् √ सद् + क्त कर्तरि । कुलटा—पुंश्चली, उत्कुला । अटति परित्यज्य गच्छति इति अटा √ अट् + अच् कर्तरि स्त्रियाम् । कुलस्य अटा कुलटा शकन्ध्वादित्वात् पररूपम् । गतानुगतिकाः—अनुगतम् अनुगमनम् भावे क्तः । गतस्य अनुगतम् । तत् अस्ति एषां शीलत्वेन इति गतानुगत + ठन्—इक मत्वर्थे । नागैरिव—हाथियों या सर्पों की भाँति । भाव यह है कि जैसे हाथी या साँप शक्तिशाली होते हुए भी सिर से रहित होने पर अकिञ्चित्कर हो जाते हैं उसी तरह उत्कृष्ट शक्ति से सम्पन्न होने पर भी आप्त जन नायक के अभाव में कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं । इस श्लोक में पूर्णोपमा,
मु० रा०—२३