भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

महाकवि विशाखदत्त द्वारा

DevanagariSanskritpublished488 पृष्ठ

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३७२ मुद्राराक्षसम्

पुरुष — अत्थि, जाणादि अज्जो, एत्थ णअरे मणिआरसेट्ठी चन्दन- दासो णाम। ( अस्ति, जानात्यार्य , इह नगरे मणिकारश्रेष्ठी चन्दन- दामो नाम । )

राक्षस — [सविषादात्मगतम्] एतत्तदपावृतमस्मद्विनाशदीक्षाप्रकाशद्वार दैवेन। हृदय ! स्थिरीभव, किमपि ते कष्टतरमाकर्णनीयम्। [ प्रकाशम् ] भद्र ! श्रूयते मित्रवत्सल म साधु । किं तस्य ?

पुरुषः— सो एदस्स जिष्णुदासस्स पिअवअस्सो होदि। ( स एतस्य जिष्णुदासस्य प्रियवयस्यो भवति । )

राक्षस — [ स्वगतम् ] अयमभ्यर्णः शोकवज्रपातो हृदयस्य [ प्रकाशम् ] ततस्तत ?

पुरुष— तदो जिष्णुदासेण पिअवअस्सस्स सिणेहसरिस अज्ज विण्णत्तो चन्दउत्तो । ( ततो जिष्णुदासेन प्रियवयस्यस्य स्नेहमदृशमद्य विज्ञप्तश्चन्द्रगुप्त । )

राक्षस — कथय किमिति ?

पुरुष — देव ! अत्थि मे गेहे कुटुम्बभरणपज्जत्तो अत्थो। तस्स विणिमएण मुञ्चिज्जदु मे पिअवअस्सो चन्दनदासो त्ति । ( देव ! अस्ति मे गृहे कुटुम्बभरणपर्याप्तोऽर्थ । तस्य विनिमयेन मुच्यता मे प्रियवयस्य- श्चन्दनदास इति । )

हिन्दी अनुवाद—पुरुष— आर्य ! और क्या ?

राक्षस— [ आवेग के साथ मन ही मन ] चन्दनदास इसके मित्र के प्रिय मित्र हैं, और उसके प्रिय मित्र का विनाश ही अग्नि मे प्रवेश करने का कारण है। इसलिए सचमुच मित्र-स्नेह के पक्षपाती हृदय से मैं व्याकुल हूँ। [ प्रकट ] भद्र ! तुम्हारे उस मित्र का भी सुचरित विस्तार से सुनना चाहता हूँ।

पुरुष— आर्य ! इसके बाद मैं अभागा मृत्यु के विघ्न को उत्पन्न करने में समर्थ नही हूँ।

राक्षस— भद्रमुख सुनने योग्य क्या को कहे।