मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः ३८५
खड्गवारणसमयः, न—नहि ( विद्यते )। नीतिः—नयः खड्गवारणविषयेत्यर्थः, कालान्तरेण—समयान्तरेण, फलं—सिद्धिं, प्रकटयति—दर्शयति । अत्र—अस्मिन् चन्दनदासमोचनकर्मणि, तया—नीत्या, किं कार्यम्—न किमपीत्यर्थः । प्रियसुहृदि—प्रियमित्रे चन्दनदासे, मत्कृते—मदर्थम्, अतिघोराम्—अतिदारुणां, विपत्तिं—विपदं, गते—प्राप्ते ( सति ), औदासीन्यं च—तटस्थतं-यावस्थानमपि, न युक्तं—नोचितम् । ज्ञातम्—कर्त्तव्यं मया अवधारितम्, अहम्—राक्षसः, इमाम्—एताम्, स्वतनूं—निजशरीरम्, अस्य—चन्दनदासस्य, निष्क्रयं—मूल्यं, कल्पयामि—उपस्थापयामि ॥२१॥
हिन्दी अनुवाद—[ सोचकर ] इसलिए—
यहाँ ( चन्दनदास के छुड़ाने के विषय में ) पहले ( ही ) बधिकों के द्वारा ( चन्दनदास के ) वध कर दिये जाने पर यह तलवार ( उठाने ) का समय नहीं है । नीति का प्रयोग कालान्तर में फल प्रकट करता है । यहाँ उससे क्या प्रयोजन ? प्रिय मित्र ( चन्दनदास ) के मेरे लिए अत्यन्त दारुण विपत्ति को प्राप्त हो जाने पर उदासीन होना भी उचित नहीं है । समझ लिया ( अर्थात् मैंने अपना कर्त्तव्य निश्चित कर लिया ) कि मैं इस अपने शरीर को उस ( चन्दनदास के छुटकारे ) का मूल्य बनाता हूँ ॥२१॥
[ सभी ( पात्र ) चले जाते हैं । ]
॥ छठा अंक समाप्त ॥
टिप्पणी—घातकानाम्—अत्र कृद्योगे कर्तरि षष्ठी । अतएव 'घातकों के द्वारा' ऐसा अर्थ करना चाहिए । कालान्तरेण—अन्तरम् = अवकाशः । कालस्य अन्तरम्, तेन । अपवर्गे तृतीया । मत्कृते—मम कृते = अर्थे । 'कृते' एक अव्यय है । निष्क्रयम्—मूल्य । निष्क्रीयते अनेन इति निर् वा निस्√क्री+अच् करणे = निष्क्रयः । इस पद्य में परिवृत्ति नामक अलंकार तीन काव्यलिंग अलंकारों से उज्जोजित है । इसमें स्रग्धरा छन्द है । स्रग्धरा का लक्षण, १, १ में देखिए ॥२१॥
मु० रा०—२५