मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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सप्तमोऽङ्क
[ तत प्रविशति चण्डाल । ]
चाण्डाल —ओसलध अज्जा ! ओसलध, अवेध माणहे ! अवेध—
( अपसरत आर्या. ! अपसरत, अपेत मान्या ! अपेत—)
जइ लक्खिदु मणद्ध प्पाणे, विहवे, कुल कलत्ते अ ।
परिहरध ता विस विअ लाआपत्थ पअत्तेण ॥१॥
( यदि रक्षितु मन्यध्व प्राण, विभव, कुल, कलत्र च ।
परिहरत तस्माद् विषमिव राजापथ्य प्रयत्नेन ॥१॥)
अन्वय —यदि प्राण विभव कुल कलत्र च रक्षितु मन्यध्वम्, तस्माद प्रयत्नेन विषमिव राजापथ्य परिहरत ॥१॥
व्याख्या—यदि—चेत्, प्राणम्—आत्मान, विभव—धन, कुल—वश, कलत्र च—दाराश्च, रक्षितु—परित्रातु, मन्यध्वम्—इच्छत यूयमिति शेष , तस्मात्—ततो हेतो , प्रयत्नेन—प्रयासेन, विषमिव—गरलमिव, राजापथ्य—नृपाहित, परिहरत—दूरे त्यजत ॥१॥
हिन्दी अनुवाद—[ तदनन्तर चाण्डाल प्रवेश करता है । ]
चाण्डाल—सज्जनो ! हटो, हटो । मान्यो ! हटो, हटो—
यदि प्राण, धन, कुल और स्त्री की रक्षा करना चाहते हो तो विष के समान राज-द्रोह से यत्नपूर्वक बचो ॥१॥
टिप्पणी—छठे अक तक में अमात्य राक्षस को वश मे करने का मुख्य कार्य सम्पन्न हो चुका है, अब अमात्य राक्षस को चन्द्रगुप्त का अमात्य बनाकर उसकी राज्यलक्ष्मी की स्थिरता सम्पादनरूप नाटक के उत्कृष्ट फल को प्राप्त कराने के लिये सातवें अक का प्रारम्भ किया जा रहा है । यदि रक्षितुम् इस पद्य में व्यतिरेक अलकार हे और आर्या छन्द है । आर्या का लक्षण १, १ में देखिये ॥१॥
अविअ—( अपि च— )
होदि पुलिसस्स व्वाहो मलण बा सेविदे अपत्येवि ।
लाआपत्थे उण सेविदे समन्त वि कुल मलदि ॥२॥