मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
महाकवि विशाखदत्त द्वारा
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आकरः सर्वशास्त्राणां रत्नानामिव सागरः ।
गुणैर्न परितुष्यामो यस्य मत्सरिणो वयम् ॥ ७ ॥
अन्वय —रत्नानां सागर इव सर्वशास्त्राणाम् आकरः । यस्य गुणैः—मत्सरिणः वयम् न परितुष्यामः ॥ ७ ॥
व्याख्या—रत्नानाम्—पद्मरागादीनां मणीनां, सागर इव—समुद्र इव, सर्वशास्त्राणाम्—समस्तशास्त्रज्ञानानामित्यर्थः, आकरः—खनिः (अस्ति), यस्य—चाणक्यस्य, गुणैः—चातुर्यादिभिः, मत्सरिणः—मत्सरवन्तः गुणेषु विद्वेषवन्त इत्यर्थः, वयम्, न परितुष्यामः—न परितोषमावहाम ॥ ७ ॥
हिन्दी अनुवाद—चाण्डाल—नीति मे निपुण बुद्धि वाले आर्य ने ही (यह दुष्कर कार्य किया)।
चाणक्य—भद्र ! न, ऐसा न कहो। नन्दवंश के शत्रु भाग्य ने (यह किया)—ऐसा कहो।
राक्षस—[देखकर मन में] अरे ! यह वह दुष्टात्मा, अथवा यह वह महात्मा चाणक्य है। क्योंकि—
यह रत्नों के समुद्र के समान सभी शास्त्रों की खान है। जिसके गुणों से डाह करने वाले हम सन्तुष्ट नहीं होते हैं ॥७॥
टिप्पणी—नीतिनिपुणबुद्धिना—नीतौ राजनीतौ निपुणा कुशला। तादृशी बुद्धिर्यस्य स नीतिनिपुणबुद्धिः, तेन। नन्दकुलद्वेषिणा—नन्दानां कुलम्। तत् द्वेष्टि इति नन्दकुल√द्विष्+णिनि कर्तरि ताच्छील्ये = नन्दकुलद्वेषी, तेन। आकर—खान, उत्पत्ति-स्थान। यहाँ राक्षस ने चाणक्य के गुणों की प्रशंसा की है, अतः चाणक्य के प्रति उसका द्वेषभाव समाप्त-सा समझना चाहिये। इस पद्य में उपमा और रूपक अलंकारों की संसृष्टि है। इसमें अनुष्टुप् छन्द है। अनुष्टुप् का लक्षण १, ३ में देखिए ॥७॥
चाणक्यः—[विलोक्य सहर्षम्] अये ! अयममात्यराक्षसः, येन महात्मना—
गुरुभिः कल्पनाक्लेशैर्दीर्घजागरहेतुभिः ।
चिरमायासिता सेना वृषलस्य मतिश्च मे ॥८॥